सफेद जहर का कारोबार

राजधानी सहित पूरे प्रदेश में दूध, मावा, घी, पनीर सहित अन्य मिलावटी दुग्ध उत्पादों का कारोबार धड़ल्ले से हो रहा है। यानी प्रदेश की सेहत पर सीधा वार। केवल त्योहारी सीजन में हरकत में आने वाला खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग का अमला मिलावटी दुग्ध उत्पादों के सैंपल लेता है, लेकिन इसकी जांच रिपोर्ट आने तक हजारों टन 'सफेद जहरÓ बाजार में खपाया जा चुका होता है। लोग इसका उपयोग कर चुके होते हैं। रिपोर्ट आने तक तो इनके शरीर में मिलावट के दुष्परिणाम अपना असर दिखाना शुरू कर देते हैं। एक सवाल दिमाग में बार-बार कौंधता है कि यह अमला त्योहारी सीजन में ही हरकत में क्यों आता है? जब फूड इंस्पेक्र्स को नियमित सैंपल लेने का टारगेट दिया जाता है, उसके बावजूद ये मिलावटखोर 'सफेद जहरÓ को बाजार में उतारने में कामयाब कैसे हो जाते हैं? फूड इंस्पेक्टर्स ने कितने सैंपल लिए और उनकी जांच रिपोर्ट क्या रही? यह अलग से पड़ताल का विषय हो सकता है। खाद्य एवं औषधि प्रशासन का अमला त्योहारी सीजन में तो मिलावटी माल की खेप पकड़कर खुद की पीठ थपथपा लेता है, लेकिन बाकी दिनों की जिम्मेदारी किसकी है? वह इसके उत्पादन के अड्डों पर दबिश क्यों नहीं देता? यदि ऐसा हो जाए तो न माल बाजार में आएगा, न उपभोक्ताओं के घरों में जाएगा। भारत सरकार के खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण की रिपोर्ट ने हाल ही में एक और चौकाने वाला खुलासा किया है, जिसमें मध्यप्रदेश से लिए गए दूध के ४८ फीसदी सैंपल अमानक पाए गए। यानी जिस दूध को सेहत बनाने के लिए पीया जा रहा है, वह सेहत बिगाड़ सकता है। सफेद जहर के इस काले कारोबार में मार्के की एक बात यह भी है कि जो लोग इन्हें खाने-पीने में इस्तेमाल कर चुके होते हैं, उनकी सेहत के लिए हर्जाना कौन देगा? एक पूरा विभाग, करोड़ों रुपए का खर्च, फूड इंस्पेक्र्स के टारगेट और जांच के लिए प्रयोगशाला को कितना कारगर माना जाए? यह सवाल जनप्रतिनिधियों और प्रशासन के सभी मुखिया के सामने मुंह फाड़े खड़ा है। होना तो यह चाहिए कि सालभर सघन जांच की जाए। मिलावटी माल बनाने के स्थानों पर छापेमारी हो। मिलावटखोरों को सख्त सजा दी जाए, ताकि फिर कोई ऐसी हिमाकत न करे।..

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