तकनीकी अभिशाप और पुरुषवादी विज्ञापन
विज्ञापन किसी भी संदेश को विशाल जनसमुदाय तक पहुंचाने का नफीस तरीका है। यह आपकी बात चित्रों और शब्दों के साथ लोगों तक पहुंचाता है, लेकिन यह चिंताजनक तब हो जाता है जब सही समझ के साथ नहीं किया गया हो। इन दिनों परिवार नियोजन के लिए दिए जा रहे विज्ञापनों में पुरुषवादी मानसिकता साफ झलकती है। इसमें पचास से अधिक लड़कियों को पानी ढोते कतारबध्द दिखाया गया है। 'संदेश है एक अरब चौदह करोड़ में यह हाल है तो आगे क्या होगा?' इसमें परिवार नियोजन की अपील भी की गई है। लड़कियों की इस कतार से लगता है कि हमारे यहां इनकी संख्या ज्यादा है। कुछ वर्ष पूर्व एक विज्ञापन और आया था 'बेटी नहीं बचाओगे तो बहू कहां से लाओगे।' इससे लगता है कि हम सिर्फ बहू लाने ओर वंश बढ़ाने के लिए बेटियां बचाने चाहते हैं। होना तो यह चाहिए कि हम बढ़ती आबादी रोकने के साथ ही घटते लिंगानुपात पर भी लोगों का जागरूक करें, ताकि दोहरा और प्रथमदृष्टया सही संदेश जा सके। तेजी से घटता लिंगानुपात राष्ट्रीय चुनौती बन चुकी है।
गुजरात-राजस्थान की सीमा के दांग जिले में एक लड़की से आठ भाइयों की शादी कर दी गई। राजस्थान के देवरा गांव में 110 साल बाद बारात आई। वहीं के बाड़मेर के राजपूत बहुल्य गांव के दो सौ परिवारों में 2001 में औसतन दो से चार बच्चों थे। अफसोस कि करीब चार सौ बच्चों में केवल दो बालिकाएं थीं। मध्यप्रदेश के आदिवासी बहुल्य जिलों को छोड़ दें तो पढ़े-लिखे और समृध्द जिलों में भी स्त्री-पुरुष और किशोर लिंगानुपात बेहद चिंताजनक है। ये दुष्परिणाम गर्भस्थ शिशु के लिंग परीक्षण तकनीक के हैं। जिस दौर में लिंग परीक्षण तकनीक का विकास हुआ, उसमें 1984 से 85 के बीच मध्यप्रदेश में 78 हजार कन्याओं की हत्या और गर्भपात किए गए।
इस तकनीक का बढ़ता दुरुपयोग दांग और बाड़मेर जैसे हालात मध्यप्रदेश में पैदा कर दे तो हमें आश्चर्य नहीं करना चाहिए। इतना ही नहीं देश की राजधानी दिल्ली के नौ जिलों में 762 से 850 महिलाओं पर एक हजार पुरुष हैं।
भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान नई दिल्ली ने 1975 में एम्नीओसेंटिस पध्दति उपलब्ध कराई थी। इसका मकसद गर्भस्थ शिशुओं की जन्मजात बीमारियों और विकृतियों का परीक्षण करना था। लेकिन, 1980 के दशक में जब इस तकनीक के क्लीनिक खुले उसके बाद लोगों ने इसका मकसद बदल दिया। पंजाब, हरियाणा, गुजरात, उत्तरप्रदेश, दिल्ली और हिमाचल प्रदेश में सबसे पहले जन्म पूर्व लिंग परीक्षण तकनीक वाले क्लीनिक खुले। नतीजतन इन प्रदेशों में लिंगानुपात बेहद चिंताजनक है। हालिया जनगणना के आंकड़े क्या होंगे? अंदाजा लगाया जा सकता है। 2001 की जनगणना के मुताबिक भारत में 0-6 आयु वर्ग के बच्चों का लिंगानुपात 927: 1000 है। यह 1991 में 945 था। ये देश के 16 जिलों में 800 से कम है। वहीं स्त्री-पुरुष लिंगानुपात 933:1000 है। गुजरात और हरियाणा में किए गए अध्ययन के मुताबिक मेहसाणा और कुरुक्षेत्र जिले में 100 लड़कियों पर 240 लड़के हैं। यह अध्ययन सवर्ण और पढे-लिखे लोगों के बीच हुआ था। पूरे हरियाणा में 820 महिलाओं पर एक हजार पुरुष हैं। पंजाब में 798 महिलाओं पर एक हजार पुरुष हैं, यह और भी अफसोसजनक है। पूरे देश में सबसे कम लिंगानुपात तमिलनाडु के सलेम जिले में है, जो प्रदेश का पांचवा समृध्द जिला है। महाराष्ट्र में 1991 में स्त्री-पुरुष लिंगानुपात 946 था, जो 2001 में 917 तक गिर गया। यहां के आठ जिलों में यह 900:1000 है। दमन और दीप में लिंगानुपात तेजी से गिरा है। यहां 1981 में 1062 महिलाओं पर एक हजार पुरुष थे, जो 2001 में 709:1000 हो गया। इतनी ही नहीं चंडीगढ़ जैसे समृध्द प्रदेश में 773 महिलाओं पर एक हजार पुरुष हैं।
मध्यप्रदेश में 920 महिलाओं पर एक हजार पुरुष हैं। यह आंकड़ा 1981 में 941 था। शिशुओं का लिंगानुपात 989:1000 था, जो 2001 में 932 हो गया। आदिवासी बहुल इलाकों में अच्छी स्थिति है। डिण्डौरी में 990 और मण्डला में 981 महिलाओं पर एक हजार पुरुष हैं। यह प्रदेश में सबसे अच्छी स्थिति है। इसके साथ ही शाजापुर, विदिशा और खरगौन को छोड़ दें तो सभी जिलों में लिंगानुपात में भारी गिरावट आई है। भोपाल में 13, इंदौर में 37, जबलुपर में 34, ग्वालियर में 43 और उज्जैन में 27 की गिरावट 1991 से 2001 के बीच आई है। जाहिर सी बात है कि पढ़े-लिखे और समृध्द इलाकों में लिंग परीक्षण तकनीक का दुरुपयोग धड़ल्ले से हुआ है। हस्तक्षेप किए बिना देखा जाए तो मध्यप्रदेश में 103 बालिकाओं पर 105 बच्चों का जन्म होता है। इसके बावजूद प्रदेश में प्रतिवर्ष लगभग 36 हजार गर्भपात कन्या भूण के किए जाते हैं। वहीं प्रदेश में 18 से 20 गर्भवती महिलाएं प्रतिदिन दम तोड़ती हैं।
हालांकि गिरते लिंगानुपात और लिंग परीक्षण जांच तकनीक का दुरुपयोग रोकने के लिए पीसीपीएनडीटी अधिनियम-2003 (संशोधित) लागू है। सबसे पहले महाराष्ट्र में पीएनडीटी एक्ट लागू हुआ था। इसके बावजूद गिरते लिंगानुपात पर नियंत्रण नहीं हुआ तो संशोधन किया गया। इस तकनीक के लगातार दुरुपयोग और अधिनियम के उल्लंघन के दुष्परिणाम हमारे सामने है। इसके बावजूद कोई राष्ट्रीय जांच अभियान नहीं चलता। एक रिपोर्ट के मुताबिक 2001 से 2006 तक 28422 अल्ट्रासाउण्ड परीक्षण करने वाली सुविधाओं का पूरे देश में पंजीकरण हुआ था। लिंगानुपात तेजी से गिर रहा है, फिर भी इस अधिनियम के उल्लंघन के करीब 400 मामले अब तक सामने आए हैं। इसके बावजूद सरकार ऐसे विज्ञापन और पहल कम ही करती है, जिनमें बालिका शिशुओं को बचाने का संदेश और अपराध करने का भय हो। उस पानी भरने वाले विज्ञापन में, जहां ज्यादा आबादी का हवाला दिया गया है, पानी भरने वाले बालक भी तो हो सकते थे। ये तो लड़कियों से काफी ज्यादा हैं। तब पूरी नफासत के साथ संदेश जा सकता है।
अंश बाबा
achha hua tumne blog ka pata bata diya, badhiya peace tha, bahut dinon baad kisi ka blog padh paya, fir se aadat lagwane ka shukriya
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