रिटेल में एफडीआई का भयानक खेल
एम जे अकबर
रिटेल क्षेत्र को प्रत्यक्ष विदेशी निवेशकों के लिए खोलने का मसला अगर आर्थिक सुधार के चले आ रहे एजेंडे का महज हिस्सा भर होता, तो इस पर फ़ैसला कम से कम दो साल पहले हो गया होता. आज से साढ़े सात साल पहले कामकाज संभालने के समय ही मनमोहन सिंह सरकार इसके पक्ष में थी. लेकिन उनके प्रयासों को वाम दलों ने सफ़ल नहीं होने दिया, जिनके समर्थन के बगैर अपने पहले कार्यकाल में वे लोकसभा में बहुमत नहीं बनाए रख पाते. यह बात समझ में आने वाली है.
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कोई भी समझदार सरकार बहुराष्ट्रीय कंपनियों के फ़ायदे के लिए अपने भविष्य को दावं पर नहीं लगायेगी. लेकिन 2009 के आम चुनावों ने लोकसभा के अंकगणित को नाटकीय तौर पर बदल कर रख दिया. इसके साथ ही नीतिगत बदलाव के रास्तों पर बढ़ने की मनमोहन सरकार की क्षमता भी बढ़ गयी. इसके बावजूद रिटेल क्षेत्र में विदेशी निवेश के मसले पर फ़ैसला लेना सरकार के लिए आसान नहीं था.
वाम मोर्चे के पराजय के बावजूद रिटेल को लेकर हर पक्ष एक सुर से इसका विरोध करता रहा है. कैबिनेट में सरकार का विरोध करने वाला कोई नहीं, लेकिन ऐसी स्थिति लोकसभा में नहीं है. सत्ताधारी गठबंधन भले टूटा न हो, लेकिन उसमें दरार जरूर पड़ चुकी है. आखिर वह कौन सी जरूरत थी, जिसने प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री को इस दरार को अपने फ़ैसले के कारण सबके सामने जाहिर करने पर मजबूर कर दिया, जबकि इस फ़ैसले को आसानी से ठंडे बस्ते में रहने दिया जा सकता था.
दोनों किसी ऐसी वैचारिक प्रतिबद्धता से भी नहीं बंधे हुए हैं, जो उन्हें ऐसा जोखिम उठाने पर मजबूर करे. वे अपनी गद्दी को एक और दिन बचाए रखने को ही तरजीह देंगे बनिस्बत किसी जरूरी नीतिगत बदलाव के मसले पर अपनी कुर्सी दावं पर लगाने के. किसी बड़े बदलाव की मांग करने की जहमत तो वे नहीं ही उठायेंगे. उनको मालूम था कि एंटनी जैसे वरिष्ठ मंत्री भी रिटेल में विदेशी निवेश को शायद ही खुले दिल से समर्थन दें.
कैबिनेट की बैठक में एंटनी ने थोड़ी ना-नुकुर की भी, हालांकि अंतत: उन्होंने कैबिनेट के फ़ैसले को स्वीकार कर लिया. एंटनी इस मामले में अकेले नहीं हैं. कांग्रेस का एक धड़ा अपने आप को मार्क्सवादी विचारधारा के नजदीक पाता है. खासकर अंतरराष्ट्रीय रिटेल चेन के मामले में उनके विचार वामपंथियों से मेल खाते हैं. पार्टी के कई अनुभवी नेताओं को वैसे भी इस बात पर हैरानी हो रही है कि जब उत्तर प्रदेश का अहम चुनाव उनके सामने है तब आखिर ऐसा फ़ैसला लेने की क्या जरूरत थी, जो प्रभावशाली स्थानीय बाजारों, शहरों के छोटे दुकानदारों को कांग्रेस से दूर कर सकता है.
यह फ़ैसला उन लोगों को सुहा सकता है, जो भारतीय बाजार को अंतरराष्ट्रीय बाजार से जोड़ने में लगे हुए हैं, लेकिन घरेलू राजनीति के हिसाब से इस कदम का कोई औचित्य नहीं जान पड़ता. अगर उत्तर प्रदेश के दुकानदार मंडी वालों को यह समझाने में कामयाब हो गये कि विदेशी कंपनियां उनके कारोबार को ठप कर उनका रोजगार छीन सकती हैं, और इसके नतीजे के तौर पर कांग्रेस को दस सीटें भी कम मिलती हैं, तो यह कांग्रेस के लिए बड़ा मनोवैज्ञानिक झटका होगा.
अगर इस फ़ैसले के द्वारा सरकार अपने पुनर्जीवन का संकेत देना चाहती थी, तो कम से कम उसे फ़ैसला लेने से पहले तृणमूल और डीएमके को विश्वास में ले लेना चाहिये था. इन दोनों दलों का एक पांव गंठबंधन के भीतर है तो एक बाहर. रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी ममता बनर्जी की इजाजत के बगैर कैबिनेट बैठक के दौरान प्रणब मुखर्जी का विरोध नहीं कर सकते थे. डीएमके के टीआर बालू ने भी सरकार के इस तर्क की खिल्ली उड़ाई कि इससे रोजगार के अवसर पैदा होंगे. इसके बावजूद सरकार ने सहयोगियों को नाराज करने का फ़ैसला क्यों किया?
राजनीति की एक विरोधाभासी स्थिति वह है, जब कमजोरी कुछ समय के लिए मजबूती बन जाती है. शायद कांग्रेस को यह लग रहा है कि तृणमूल और डीएमके थोड़ा शोर मचा कर शांत हो जायेंगे और मध्यावधि चुनाव का खतरा नहीं उठायेंगे क्योंकि इससे उन्हें नुकसान ही होगा. एक संभावना यह भी है कि चौथे साल में स्थितियां ऐसी बन जाएं कि गठबंधन के सदस्य किसी लोकप्रिय मुद्दे की आड़ में सरकार से हाथ खींच लें.
यहां एक और संभावना है. शायद मनमोहन सिंह और प्रणब मुखर्जी को उलटी गिनती के शुरू होने का एहसास हो गया है. शायद कांग्रेस के भीतर यह आवाज तेज होती जा रही है कि अगले चुनाव का सामना राहुल गांधी के नेतृत्व में किया जा सकता है. लेकिन तैयार नहीं होने के कारण शायद राहुल गांधी यह जिम्मेदारी अगली गर्मियों में ही संभालें. तब तक पुरानी पीढ़ी पार्टी को अपनी आखरी सेवा नये राष्ट्रपति को चुन कर दे सकते हैं. इसके बाद आसानी से नये युग का आगाज किया जा सकता है.
राजनीति में समय का चयन किसी एक कारक पर निर्भर नहीं करता. लेकिन कोई ऐसा कारण जरूर होता है, जिसके आधार पर फ़ैसला लिया जाता है. फ़िलहाल दो कारण समझ में आ रहे हैं. जो सही लगे चुन लें. बहरहाल, 2012 के लिए तैयार हो जायें. यह बेहद रोमांचक होने वाला है.
रविवार. कॉम से साभार
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