यह कानून पुष्ट होगा न सरकार
मध्यप्रदेश में तीन दिनों में 17 फीसदी कुपोषण कम हो गया। है न हैरत में डालने वाली बात। जब मलेरिया से होने वाली मौतों का आंकड़ा बढ़ता हैए तब स्वास्थ्य मंत्री इस पर नियंत्रण की हिदायत सीएमएचओ को देते हैं। और दूसरे ही दिन की रिपोर्ट में मलेरिया से होने वाली मौत का एक भी मामला नहीं रहता है। यह बात और है कि तेज बुखार से मरने वालों की संख्या यकायक बढ़ जाती है। प्रदेश की राजधानी में सवा तीन हजार बच्चे कुपोषित हैं। ये सभी चमत्कार हमारे यहीं हो सकते हैं। इस बीच पेट भरने का दावा करने वाले भोजन का अधिकार कानून के आने की घोषणा केंद्र सरकार के प्रतिनिधि न्यूयार्क में सोशलिस्ट इंटरनेशनल बैठक में करते हैं। यानी हम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अन्नदाता होने की बात कहकर खुद की पीठ थपथपाने से नहीं चूकते हैं। बहरहाल देशए प्रदेश के गरीबों की बदहाल तस्वीर और कानून से उम्मीदों की बात हो जाए।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के तीसरे चरण के रिपोर्ट के मुताबिक मध्यप्रदेश में 60 फीसदी बच्चे कुपोषित हैं। इतना ही नहींए इनमें से लगभग 13 लाख बच्चे गंभीर रूप से कुपोषित हैंए जिनकी जीवनलीला का पर्दा किसी भी वक्त गिर सकता है। इनकी हड्डियां चमड़ी से झांक रहीं हैं। चमड़ी अपना धर्म निभाते हुए इन भुरभुरी हड्डियों को दबाए सिकुड़ा पड़ा है। कुछ माह पूर्व झाबुआ और खण्डवा जिले में कुपोषण और भूख से बच्चों का मौत का मामला सामने आया था। इसके बावजूद सरकार ने कोई ठोस प्रयास नहीं किएए जिससे कुपोषण से निपटा जा सके। इन दिनों मीडिया टेनिस सनसना सानिया मिर्जा के निकाह का खबरों में मशगूल था। यह स्थिति तब है जब गरीबी और कुपोषण से निपटने के लिए 22 योजनाएं और कार्यक्रम चल रहे हैं। फिर भी देश का 77 फीसदी जनसंख्या प्रतिदिन 20 रुपए से अधिक खर्च करने का स्थिति में नहीं हैं। वहीं महंगाई 16 फीसदी से अधिक बढ़ गई हैए ऐसे में 20 रुपए में दो वक्त का भोजन कैसे मिलेगाघ् इन तमाम विडम्बनाओं के बीच ही गरीबों का पेट भरने वाले कानून का वैधानिक आवरण और मिलने वाला है।
तीन दिनों में कुपोषण कम होने का यह गले नहीं उतरने वाला आंकड़ेबाजी इसी वर्ष विधानसभा में हुई। आठ मार्च को स्वास्थ्य मंत्री ने स्वीकार किया कि प्रदेश में 60 फीसदी बच्चे कुपोषित हैं। वहीं 11 मार्च को एक सवाल के जवाब में महिला एवं बाल विकास मंत्री रंजना बघेल ने कहा कि प्रदेश में 43 फीसदी बच्चे कुपोषित हैं। दरअसल गरीबों की गणना का यह गणित प्रदेश नहीं राष्ट्रीय स्तर पर बिगड़ा है। हमारे यहां गरीबों की पहचान के कई मानक तय कर दिए गए हैं। इससे इनकी सही पहचान हो पाना मुश्किल हो गया है। वहीं इनकी संख्या में भी मतभेद है। मसलन विश्व बैंक के आकलन के मुताबिक 5ण्3 करोड़ लोग गरीबी के चक्रव्यूह में फंसे हैं। योजना आयोग के मुताबिक देश में 18करोड़ लोग बीपीएल और एपीएल श्रेणी में हैं। वहीं तेंदुलकर समिति की रिपोर्ट के मुताबिक देश में 22 करोड़ गरीब हैं। अर्थशास्त्री अर्जुनसेन गुप्ता की रिपोर्ट इनका खंडन करता है। इसके मुताबिक देश में 21ण्75 करोड़ गरीब हैं। विश्व बैंक के आंकलन के मुताबिक 5ण्3 करोड़ लोग गरीबी के चक्रव्यूह में फंसे हैं। इन तमाम आंकड़ों में वे बच्चे भी शामिल हैंए जो भुखमरी और कुपोषण से दम तोड़ रहे हैं। कोहरे की धुंध से लिपटाए बारिश से नहाई सुबह ऊंघते हुए मन बेमन से शहरों की नालियोंए कचरा घरों में आने काम की चीजें तलाशते हैं। यहां से समेटा गया कबाड़ दोपहर चार बजे तक कबाड़खाने तक पहुंचा पाते हैं। इस तरह ज्यादातर बच्चे और शहरी गरीब एक वक्त ही खाना खा पाते हैं। ये भी इसी संख्या में शामिल हैं। बच्चे भी शामिल हैंए जो असंगठित क्षेत्रों में अपने मां.बाप के साथ काम करते हैं और मेहनताना कुछ नहीं मिलता।
यह जाहिर सी बात है कि इतने लोगों का पेट भरने के लिए खाद्यान्न की जरूरत होगी। भारत में विश्व की तीन प्रतिशत कृषि भूमि है और कुल गरीब के 18 फीसदी गरीब यहां हैं। दूसरी ओर हम बढ़ती आबादी के मुताबिक खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने का स्थिति में भी नहीं हैं। इससे निपटने के लिए न्यूनतम भूमि में अधिकतम उत्पादन का नीति अपनानी होगी। अर्जुनसेन गुप्ता की रिपोर्ट के आंकड़े मानें तो 21ण्75 करोड़ गरीब देश में हैं। मौजूदा वितरण प्रणाली के हिसाब से इनके लिए 777 लाख टन खाद्यान्न का जरूरत हैए जो 2008.09 के कुल उत्पादन का 45 फीसदी है। देश का करीब 22 फीसदी आबादी का पेट भरने के लिए 45 फीसदी खाद्यान्न वितरित कर दिया जाएगाए तो बाकी 78 फीसदी लोग क्या खाएंगेघ् फिर तो ये 78 फीसदी के कुपोषित होने का खतरा है। तब भोजन का अधिकार कानून बिना खाद्यान्न के भूख कैसे मिटाएगाघ् इसके लिए राज्यों को भी आगे आना होगा। कानून का पालन और योजनाओं के उचित क्रियांन्वयन से ही कुछ पार पाया जा सकता है। वरना आज गराबोन्मुखी योजनाओं की जो स्थिति हैए उसके आधर पर तो सुधार का उम्मीद करना बेमानी और गरीबों से मजाक होगा। इतना ही नहीं कुपोषण से निपटना और पेट भर भोजन उपलब्ध कराना दो अलग.अलग सच हैं। यह कानून पेट भरेगा या पोषणयुक्त भोजन उपलब्ध कराने में कारगर साबित होगा।
राज्यों को भी आगे आना होगा। वरना तीन दिनों में 17 फीसदी कुपोषण कम करने जैसे आंकड़ों से जाहिर है कि हमारे जनप्रतिनिधि प्रदेश की वस्तु स्थिति से वाकिफ नहीं हैं। या फिर जानबूझकर लोगों को अंधेरे में रखना चाहते हैं। जो भी हो हमें नहीं भूलना चाहिए कि इतिहास दोहराने के लिए किसी सीमा का पालन नहीं करता है। रसिया में अकाल के दौर में भोजन की मांग कर लोग प्रदर्शन कर रहे थे। तब महारानी मेरा अंतोनेत ने कहा थाए रोटी नहीं है तो केक और ब्रेड खाओ। जनता की पीड़ा और परिस्थितियों से शासक का बेखबर रहने का दुष्परिणाम था रूस की क्रांतिए जो आज भी विश्व की सबसे बड़ी क्रांति में शुमार है। नतीजतन सत्ता पलट दी गई थी। हमारी सरकारों को भी सबक लेने की जरूरत है।
- अंश बाबा
लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं
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