केंद्र के फैसले पर प्रदेश की हवाई आंकड़ेबाजी
महेश्वर बांध के निर्माण कार्य पर केंद्र के रोक लगाने से मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान नाराज हैं। वे इसे केंद्र का गरीब और विकास विरोधी निर्णय बता रहे हैं। इससे रोक हटाने की मांग करते हुए उन्होंने खर्च के तमाम आंकड़े गिना दिए। लेकिन उन लोगों की संख्या और उनकी खेती के रकबे की बात नहीं कीए जो इस बांध के पानी की जद में आने वाले हैं। जिन्हें बेकवाटर सर्वे किए बिना ही अधिग्रहण अधिनियम की धारा.चार के तहत नोटिस थमाए जा रहे हैं। यानी उन्हें चेतावनी दी जा रही है कि जमीन और गांव से बेदखल कर दिए जाएंगे। यदि मुख्यमंत्री को खर्च के आंकड़े याद हैंए तो इस जन पशुधन और जमीन के आंकड़ों की जानकारी भी होगी तो फिर उनकी बात क्यों नहीं करते।
महेश्वर परियोजना सरकार की बहुप्रतीक्षित है। सिंह की मानें तो नवंबर से 7ण्2 लाख यूनिट प्रतिदिन बिजली उत्पादन और इंदौर व देवास को 36 करोड़ लीटर पानी मुहैया कराना था। यह लक्ष्य पिछड़ जाएगा। बिजली घर पर 2500 और इंदौर व देवास को पानी देने के लिए 517 करोड़ रुपए खर्च किए जा चुके हैं। यानी सरकार को तमाम आंकड़ों की जानकारी है। तो फिर यह भी मालूम होगा कि महेश्वर बांध की जद में आने वाले 61 में से 40 गांवों का बेकवाटर सर्वे अब तक नहीं किया गया है। और ग्रामीणों को लगातार नोटिस थमाए जा रहे हैं। इन गांवों में ऐसे कास्तकार हैंए जिनकी 85 फीसदी जरूरतें उनकी खेती ही पूरी कर देती है। इसके अलावा हजारों परिवार केवटए कहार और मछुआरों के हैंए जो रेत निकालनेए कछार में सब्जी उगाने से लेकर मछली पकड़ने का काम करते थे। इनकी जीवन स्थिति का आकलन भी तो किया जाना चाहिए। इन्हें मकान या झोपड़ी का मुआवजा दे भी दियाए तो जीवनयापन के साधनों का क्या होगा।
सीएम ने 21 गांवों का गणित भी मीडिया के माध्यम से सामने रख दिया। उनके मुताबिक बांध की जद में केवल 22 गांव आ रहे हैंए जिनमें से 15 गांवों के पुनर्वास पैकेज से वह सहमत है। एक गांव में पैकेज लागू हो चुका है। बाकी पांच गांवों में भी सहमति दे दी है और एक गांव के लोगों से बात चल रही है। लेकिनए इसकी जमीन हकीकत कुछ और है। जिन कुछ लोगों को मुआवजा दिया हैए जिसका आधार 1999 में कराया गया सर्वे है। जाहिर सी बात है दस सालों में लोगों की जीवन स्थितियां और जरूरतें बदल चुकी हैं। वे अपनी बयानबाजी में इस सच को भी पचा जाते हैं। वे बांध प्रभावित 61 में से 40 गांवों की बात ही नहीं करते हैं।
मुख्यमंत्री केंद्र के फैसले को गरीब विरोधी कहकर परियोजनाकर्ता का पक्ष ले रहे हैं। होना तो यह चाहिए कि वे पूरे 61 गांवों के अंतिम आदमी तक का पुनर्वास करें। इसके बाद बांध का कार्य पूरा हो। इन गांवों के 70 हजार लोग प्रभावित होंगे। इनकी खेती और रोजगार के साधन भी छिन जाएंगे। सैकड़ों बच्चों के स्कूलों का कोई ठिकाना नहीं होगा। गत नवंबर में सीएम ने कहा था कि 291 परिवारों का पुनर्वास हुआ हैए तो इतनी जल्दी बाकी का कैसे हो गयाए जिन्हें वे अभी गिना रहे हैं। वहीं वे जिस बिजली का ढोल पीट रहे हैंए वह प्रदेश की जरूरत का एक फीसदी भी नहीं है।
बांध से प्रभावित परिवारों के साथ कई तरह के छलावे किए जा रहे हैं। मसलन गांव को डूब में बताकर मुआवजा देने की बात की जा रही है। वहीं उसी गांव की खेती को डूब से अलग बता रहे हैं। यह संकट कई गांवों के सामने है। खेती ज्यादातर गांवों के चारों ओर फैली होती है। फिर गांव डूब में आएगा तो खेत कैसे बचेंगेघ् इसके अलावा उनके पशुधन की क्या व्यवस्था होगीघ् बच्चों के स्कूलों का क्या होगाघ् पुनर्वास स्थल पर मजदूरों के लिए क्या होगाघ् ऐसे कई सवाल हैंए जो वर्षों से जवाब मांगते हैं। दूसरे तरह के जो नुकसान ये भोग रहे हैंए उसका क्या मूल्य दिया जाएगा। मसलन कई गांवों में पिछले डेढ़ दशक से विकास कार्य नहीं हुए। कुछ गांवों में लोग लड़कियां नहीं दे रहे हेंए जिससे युवा वर्ग कंवारा है। या फिर दूसरी जातियों में शादी करना पड़ रहा है। महेश्वर के पास सूलगांव में ऐसे 75 से अधिक मामले हैं। यहां ग्रामीणों की सोसाइटी से दसवीं तक स्कूल संचालित हैए जिसमें करीब 450 बच्चे पढ़ते हैं।
अप्रेल में नर्मदा बचाओ आंदोलन के साथ सैकड़ों बांध प्रभावितों ने बड़वानी से इंदौर तक जीवन अधिकार यात्रा निकाली। इसमें शामिल ज्यादातर आदिवासी व अन्य लोग भले ही पढ़।लिखे नहीं थेए लेकिन वे उनके साथ हो रहे छलावे को बेहतर जानते हैं। इनमें किशोर से लेकर वृध्द तक सभी थे। इंदौर में नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण पर डेरा जमाए ये लोग जमीन के बदले जमीन की मांग कर रहे थे। एक वृध्द ने कहा कि सरकार हमें विकास विरोधी बताकर बात सुनने को तैयार नहीं होती है। जबकिए हम ऐसा कुछ नहीं कर रहे हैं। हम चाहते हैं कि बांध बन जाए। सभी को पानी और बिजली मिले। लेकिनए हमारे परिवार उजड़ रहे हैंए तो हमें न्यायोचित पुनर्वास और जमीन के बदले जमीन भी मिले। मछुआरों को मछली पकड़ने का अधिकार मिले। 70 वर्षीय जगदीश ने कहा कि हम शांतिपूर्ण ढंग से बात करके अपनी मांग सरकार के सामने रखना चाहते हैं। सरकार सुनने को तैयार नहीं है। दूसरी और उपेक्षितए वंचित और हाशिए में डाल दिए गए लोगों ने हथियार थामकर नक्सलवाद अपना लियाए तो उनसे बात करने के लिए सरकार परेशान है। जो नक्सली आज आंतरिक असुरक्षा का कारण माने जा रहे हैंए वे हमारी तरह नकार दिए गए लोग हैं। महेश्वर बांध के पानी की जद में आने वालों ने इंदिरा सागर बांध प्रभावित हरसूद और आसपास के गांवों के लोगों की दुर्दशा भी देखी है। इसलिए वे किसी वादे पर भरोसा करने की स्थिति में नहीं हैं।
- अंश बाबा, लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं
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