छूटती जमीन, टूटती सांसें
कटनी के डोकरिया बुजबुजा गांव में सुनिया के आत्मदाह की घटना ने मानव मन को झिझोड़कर रख दिया। वहीं, २५ वर्षीय रामप्यारे ने भी जहर खाकर जान देने की कोशिश की। जाहिर सी बात है दो साल से सांकेतिक चिता सजाकर जमीन अधिग्रहण का विरोध कर रहे किसान जाना की बाज लगाकर अपनी पुश्तों की विरासत बचाना चाहते हैं। इस पर पुलिस का अमानवीय चेहरा देखिए, वह विरोध कर रहे किसानों पर लाठियां भांजती है। इस पर भी शर्मनाक यह कि कृषि मंत्री ने किसानों को दलाल करार दिया। दरअसल, किसानों को यह चौतरफा मार हमेशा से पड़ती रही है। अतीत में झांककर देखें तो हरदा के घोगल गांव और खरसाना के २०० किसानों ने ठुड्डी तक पानी में जल सत्याग्रह कर जमीन छिनने का विरोध किया था, तब मछलियां उन्हें भोजन बना रहीं थी, लेकिन प्रशासन की तानाशाही और अमानवीयता में कोई फर्क नहीं आया। यहां भी गिरफ्तारियां हुईं। कफ्र्यू जैसे हालात पैदा कर दिए गए। दूसरी ओर शासन के कपटीपन से दुखी किसान चिता सजाए बैठे हैं। प्रदेशभर में कई जगह आए दिन प्रदर्शन होते रहते हैं।
काबिले गौर तो यह भी है कि विकास के नाम पर अधिग्रहित की जा रही जमीन का इतना मुखर और कट्टर विरोध की जड़ें कहां हैं? दरअसल, इन किसानों के सामने हजारों उदाहरण हैं, जिनमें जमीन अधिग्रहण, मुआवजा और पुनर्वास के मामले में लोगों की हुज्जत हुई है। ऐसा नहीं है कि किसानों ने अपनी जमीन कुर्बान नहीं की। बाण सागर, बरगी बांध, तवा परियोजना, पुनासा बांध आदि में किसानों ने जमीन दी है। एक पूरे शहर हरसूद को जल समाधि लेनी पड़ी, लेकिन कहीं के भी विस्थापित को न्यायसंगत मुआवजा या पुनर्वास नहीं मिला। इन कटु अनुभवों के कारण आज किसान जान की बाजी लगा रहे हैं।
अब विकास की अवधारणा, विकास का दायरा, विकास का मतलब, विकास से लाभान्वित लोग आदि में पारदिर्शता नहीं है। ज्यादातर मामलों में निजी कंपनियों को खुश करने के लिए किसानों की जमीन छीनी जा रही है, जिससे मजदूरों, आदिवासियों के परिवार भी बेघर हो रहे हैं। प्रशासन के दोगलेपन का आईना देखिए कि सूखा प्रभावित बुंदेलखंड से सटे बंघेलखंड के सतना में सीमेंट फेक्ट्री को नदियों का पानी देने के इंतजाम कर दिए जाते हैं, लेकिन आठ साल से सूखे के मार झेल रहे बुंदेलखंड के छतरपुर, टीकमगढ़, पन्ना आदि के किसानों को सिंचाई के लिए पानी मुहैया नहीं कराया जाता। इसी बुंदेलखंड की ४२ हेक्टेयर जमीन निजी कंपनियों को सौंपी जाती है, लेकिन यहां के मजदूरों के लिए काम के अवसरों पर बात नहीं की जाती। अदूरदर्शिता का आईना देखिए, सरकार एशिया में सर्वोत्तम दलहन उत्पादक नरसिंहपुर के शाहपुरा की जमीन निजी कंपनी को सौंप देती है, लेकिन हरदा के उन गांवों में कोई उद्योग लगाकर रोजगार के अवसर नहीं बढ़ाती, जहां के मजदूर दिहाड़ी के लिए महाराष्ट्र पलायन कर रहे हैं। यहां गांव के गांव खाली हो रहे हैं। यह निश्चित रूप से शर्मनाक है कि ये मजदूर बिहार के मजदूरों की जगह रिप्लेस हुए हैं। वहीं, बिहार ने अपने यहां रोजगार के अवसर बढ़कर उसके मजदूरों को महाराष्ट्र से वापस बुला लिया है। मार्के की बात यह है कि हमारे यहां निजी पूंजी के दम पर उनकी मर्जी से जमीनें सौंपी जा रही है। यह अलग से पड़ताल का विषय हो सकता है। बहरहाल, विषयांतर न हो इसलिए, किसानों की छिनती जमीन पर बात की जाए। विस्थापन, पुनर्वास, मुआवजा, मिटते गांव, शहरों में बढ़ते ग्रामीण मजदूरों जैसे स्याह पहलुओं की बात की जाए।
मध्यप्रदेश उद्योग निवेश संवर्धन सहायता योजना २०१० में एक उद्योग की जमीन का अर्थ उसके निर्माण क्षेत्र से तीन गुना अधिक माना गया है, लेकिन इससे विस्थापित परिवारों के पुनर्वास के लिए कोई आदर्श मापदंड नहीं है। इतना ही नहीं मध्यप्रदेश में तो कई कंपनियों ने केवल गोदामों के लिए ३००-३०० एकड़ जमीनें हथिया रखी हैं। चौकाने वाला एक और तथ्य देखिए, ८० प्रतिशत कृषि आधारित आबादी के पास कृषि भूमि का केवल १७ प्रतिशत हिस्सा ही है। इस पर भी जमीन मालिकों से अधिक मजदूरों के परिवार निर्भर हैं। इसके बावजूद भूमि अधिग्रहण पर केवल भूस्वामियों को मुआवजा दिया जाता है। इसी जमीन पर आधारित अन्य परिवारों की बात कोई नहीं करता। विस्थापन के वक्त इनसे आजीविका के परंपरागत स्रोत मसलन, नदियां, चारागाह, वन आदि भी छिन जाते हैं, जिनके मुआवजे की कोई बात नहीं होती।
मध्यप्रदेश में इंवेस्टर्स मीट के तहत हुए करारों पर नवम्बर २०१० तक १३० निजी कंपनियों को करीब ४.५० लाख हेक्टेयर जमीन सौंपी जा चुकी है। यह एक लाख २३ हजार एकड़ के बाराबर है। यदि एक परिवार के जीवनयापन के लिए लिए औसत पांच एकड़ जमीन पर्याप्त मानी जाए तो इसमें करीब २४६१० परिवार बसाए जा सकते थे। कंपनियों ने जो ३९८३२५.६५१ हेक्टेयर निजी जमीन हथियाई है, उसमें ज्यादातर वनभूमि है। इसमें आदिवासी बसे थे। वहीं इस जमीन में अकूत खनिज संपदा है, जिसकी बात गाहे बगाहे ही की जाती है। यहां यह बताना भी समीचीन होगा कि प्रदेश सरकार ने ढाई लाख से अधिक आदिवासियों को १.१६६ हेक्टेयर भूमि के जो वनाधिकार पट्टे दिए थे, वे इन कंपनियों के कारण रद्द कर दिए गए। जबकि, एक कंपनी को औसतन १८६९ हेक्टेयर जमीन सौंपी गई है।
नर्मदा पर बने बांधों के मामले में सरकार ने कहा था कि किसानों को जमीन के बदले जमीन दी जाएगी, लेकिन ऐसा अब तक नहीं किया जा सका। दरअसल, सरकार के पास इतनी जमीन ही नहीं है। यह प्रावधान तो केंद्र की २००७ की राष्ट्रीय पुनर्वास नीति में भी था, जिसने २००३ की राष्ट्रीय नीति की जगह ली थी। इसकी घोषणा के वक्त पुराने और अप्रसांगिक हो चुके भूमि अधिग्रहण कानून १८९४ में संशोधन की बात भी कही गई थी, लेकिन इसमें बहुत स्पष्ट कुछ नहीं हुआ। सार्वजनिक उद्देश्य की अस्पष्टता के चलते राजय सरकारें अपने ढंग से इनका इस्तेमाल करती हैं। उन्हें निजी कंपनियों को उनकी शर्तों पर जमीन सौंपने में कोई अड़चन नहीं आती। इस मामले में मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, तमिलनाडु आदि राज्यों की स्थिति एक जैसी है। वहीं, भूमि अधिग्रहण मुआवजा निपटारा प्राधिकरण के फैसले से असंतुष्ट होने पर हाईकोर्ट में अपील का हक तो किसानों को है, लेकिन अस्पष्ट और अपर्याप्त मुआवजे व पुनर्वास के मामले में जवाबदेही तय नहीं है। होना तो यह चाहिए कि विकास के लिए अपनी पुश्तों की जमीनें कुर्बान करने वालों की अगली कई पुश्तों के जीवनयापन और रोजगार के माकूल इंतजाम किए जाएं। वरना, किसानों का यह विरोध और वीभत्स रूप ले ले तो हमें आश्चर्य नहीं करना चाहिए। क्योंकि, वे शासन की दमनकारी नीति, दोगले और कांइयापन से आजिज आ चुके हैं।
काबिले गौर तो यह भी है कि विकास के नाम पर अधिग्रहित की जा रही जमीन का इतना मुखर और कट्टर विरोध की जड़ें कहां हैं? दरअसल, इन किसानों के सामने हजारों उदाहरण हैं, जिनमें जमीन अधिग्रहण, मुआवजा और पुनर्वास के मामले में लोगों की हुज्जत हुई है। ऐसा नहीं है कि किसानों ने अपनी जमीन कुर्बान नहीं की। बाण सागर, बरगी बांध, तवा परियोजना, पुनासा बांध आदि में किसानों ने जमीन दी है। एक पूरे शहर हरसूद को जल समाधि लेनी पड़ी, लेकिन कहीं के भी विस्थापित को न्यायसंगत मुआवजा या पुनर्वास नहीं मिला। इन कटु अनुभवों के कारण आज किसान जान की बाजी लगा रहे हैं।
अब विकास की अवधारणा, विकास का दायरा, विकास का मतलब, विकास से लाभान्वित लोग आदि में पारदिर्शता नहीं है। ज्यादातर मामलों में निजी कंपनियों को खुश करने के लिए किसानों की जमीन छीनी जा रही है, जिससे मजदूरों, आदिवासियों के परिवार भी बेघर हो रहे हैं। प्रशासन के दोगलेपन का आईना देखिए कि सूखा प्रभावित बुंदेलखंड से सटे बंघेलखंड के सतना में सीमेंट फेक्ट्री को नदियों का पानी देने के इंतजाम कर दिए जाते हैं, लेकिन आठ साल से सूखे के मार झेल रहे बुंदेलखंड के छतरपुर, टीकमगढ़, पन्ना आदि के किसानों को सिंचाई के लिए पानी मुहैया नहीं कराया जाता। इसी बुंदेलखंड की ४२ हेक्टेयर जमीन निजी कंपनियों को सौंपी जाती है, लेकिन यहां के मजदूरों के लिए काम के अवसरों पर बात नहीं की जाती। अदूरदर्शिता का आईना देखिए, सरकार एशिया में सर्वोत्तम दलहन उत्पादक नरसिंहपुर के शाहपुरा की जमीन निजी कंपनी को सौंप देती है, लेकिन हरदा के उन गांवों में कोई उद्योग लगाकर रोजगार के अवसर नहीं बढ़ाती, जहां के मजदूर दिहाड़ी के लिए महाराष्ट्र पलायन कर रहे हैं। यहां गांव के गांव खाली हो रहे हैं। यह निश्चित रूप से शर्मनाक है कि ये मजदूर बिहार के मजदूरों की जगह रिप्लेस हुए हैं। वहीं, बिहार ने अपने यहां रोजगार के अवसर बढ़कर उसके मजदूरों को महाराष्ट्र से वापस बुला लिया है। मार्के की बात यह है कि हमारे यहां निजी पूंजी के दम पर उनकी मर्जी से जमीनें सौंपी जा रही है। यह अलग से पड़ताल का विषय हो सकता है। बहरहाल, विषयांतर न हो इसलिए, किसानों की छिनती जमीन पर बात की जाए। विस्थापन, पुनर्वास, मुआवजा, मिटते गांव, शहरों में बढ़ते ग्रामीण मजदूरों जैसे स्याह पहलुओं की बात की जाए।
मध्यप्रदेश उद्योग निवेश संवर्धन सहायता योजना २०१० में एक उद्योग की जमीन का अर्थ उसके निर्माण क्षेत्र से तीन गुना अधिक माना गया है, लेकिन इससे विस्थापित परिवारों के पुनर्वास के लिए कोई आदर्श मापदंड नहीं है। इतना ही नहीं मध्यप्रदेश में तो कई कंपनियों ने केवल गोदामों के लिए ३००-३०० एकड़ जमीनें हथिया रखी हैं। चौकाने वाला एक और तथ्य देखिए, ८० प्रतिशत कृषि आधारित आबादी के पास कृषि भूमि का केवल १७ प्रतिशत हिस्सा ही है। इस पर भी जमीन मालिकों से अधिक मजदूरों के परिवार निर्भर हैं। इसके बावजूद भूमि अधिग्रहण पर केवल भूस्वामियों को मुआवजा दिया जाता है। इसी जमीन पर आधारित अन्य परिवारों की बात कोई नहीं करता। विस्थापन के वक्त इनसे आजीविका के परंपरागत स्रोत मसलन, नदियां, चारागाह, वन आदि भी छिन जाते हैं, जिनके मुआवजे की कोई बात नहीं होती।
मध्यप्रदेश में इंवेस्टर्स मीट के तहत हुए करारों पर नवम्बर २०१० तक १३० निजी कंपनियों को करीब ४.५० लाख हेक्टेयर जमीन सौंपी जा चुकी है। यह एक लाख २३ हजार एकड़ के बाराबर है। यदि एक परिवार के जीवनयापन के लिए लिए औसत पांच एकड़ जमीन पर्याप्त मानी जाए तो इसमें करीब २४६१० परिवार बसाए जा सकते थे। कंपनियों ने जो ३९८३२५.६५१ हेक्टेयर निजी जमीन हथियाई है, उसमें ज्यादातर वनभूमि है। इसमें आदिवासी बसे थे। वहीं इस जमीन में अकूत खनिज संपदा है, जिसकी बात गाहे बगाहे ही की जाती है। यहां यह बताना भी समीचीन होगा कि प्रदेश सरकार ने ढाई लाख से अधिक आदिवासियों को १.१६६ हेक्टेयर भूमि के जो वनाधिकार पट्टे दिए थे, वे इन कंपनियों के कारण रद्द कर दिए गए। जबकि, एक कंपनी को औसतन १८६९ हेक्टेयर जमीन सौंपी गई है।
नर्मदा पर बने बांधों के मामले में सरकार ने कहा था कि किसानों को जमीन के बदले जमीन दी जाएगी, लेकिन ऐसा अब तक नहीं किया जा सका। दरअसल, सरकार के पास इतनी जमीन ही नहीं है। यह प्रावधान तो केंद्र की २००७ की राष्ट्रीय पुनर्वास नीति में भी था, जिसने २००३ की राष्ट्रीय नीति की जगह ली थी। इसकी घोषणा के वक्त पुराने और अप्रसांगिक हो चुके भूमि अधिग्रहण कानून १८९४ में संशोधन की बात भी कही गई थी, लेकिन इसमें बहुत स्पष्ट कुछ नहीं हुआ। सार्वजनिक उद्देश्य की अस्पष्टता के चलते राजय सरकारें अपने ढंग से इनका इस्तेमाल करती हैं। उन्हें निजी कंपनियों को उनकी शर्तों पर जमीन सौंपने में कोई अड़चन नहीं आती। इस मामले में मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, तमिलनाडु आदि राज्यों की स्थिति एक जैसी है। वहीं, भूमि अधिग्रहण मुआवजा निपटारा प्राधिकरण के फैसले से असंतुष्ट होने पर हाईकोर्ट में अपील का हक तो किसानों को है, लेकिन अस्पष्ट और अपर्याप्त मुआवजे व पुनर्वास के मामले में जवाबदेही तय नहीं है। होना तो यह चाहिए कि विकास के लिए अपनी पुश्तों की जमीनें कुर्बान करने वालों की अगली कई पुश्तों के जीवनयापन और रोजगार के माकूल इंतजाम किए जाएं। वरना, किसानों का यह विरोध और वीभत्स रूप ले ले तो हमें आश्चर्य नहीं करना चाहिए। क्योंकि, वे शासन की दमनकारी नीति, दोगले और कांइयापन से आजिज आ चुके हैं।
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