'पर्दे' के पीछे का सच
कुकुरमुत्तों की तरह खुली शराब की दुकानों और लुभावने व अश्लील विज्ञापनों से अवाम आजिज आ चुकी है। राजधानी का सभ्य और पढ़ा-लिखा समाज इनका विरोध कर रहा है। आबकारी और प्रशासनिक अफसरों के गैरजिम्मेदाराना और बेतुके जवाबों से जाहिर हो चुका है कि उनकी कार्रवाई की इच्छा नहीं है। हालांकि, कई दुकानदारों ने इन विज्ञापनों पर काले पर्दे डाल दिए हैं, लेकिन प्रशासन को यह नहीं भूलना चाहिए कि पर्दा गिरता है, तो उठता भी है। घोर आश्चर्य की बात है कि ज्यादातर अफसरों को यही नहीं मालूम कि शराब दुकानों के विज्ञापन के नियम क्या हैं? कार्रवाई कैसे और क्या हो सकती है? मार्के की बात तो यह भी है कि सत्ता पक्ष के विधायक और जनप्रतिनिधि भी इस बात पर आपत्ति जता चुके हैं। इसके बावजूद अफसरों ने यह हिमाकत कैसे कर दी कि वे हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। इस पर भी बड़ा सवाल है कि आबकारी के नाम पर एक पूरा विभाग है। करोड़ों रुपए तनख्वाह पर खर्च किए जा रहे हैं। इन्हें नियमों तक की जानकारी नहीं है। अफसर इस गफलत में क्यों हैं? स्कूल, कॉलेज और मंदिरों के पास शराब दुकानों की अनुमति कैसे दी जा रही है? खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम को तिलांजलि किसने दी? इतने प्रतिकार के बावजूद सख्ती और ईमानदारी, इच्छाशक्ति नजर नहीं आती। इस विभाग के मानव संसाधन और खर्च को फिजूल कहा जाए, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। शायद इस बात में भी किसी को गुरेज नहीं होगा कि शराब के अधनंगे होर्डिंग्स समाज में गलत संदेश प्रसारित कर रहे हैं। इन विशालकाय कामुक विज्ञापनों से विचलित युवा वर्ग तेजी से मयखानों का रुख कर रहा है। जो युवा शक्ति राष्ट्र निर्माण में लगनी चाहिए, शराब दुकानों और आहातों में खत्म हो रही है। शराब दुकानों से प्रशासन को राजस्व मिल रहा है, लेकिन इन विज्ञापनों से क्या फायदा है? यह भी अलग से जांच का विषय हो सकता है। जांच होगी तो निश्चित ही कई 'काले पर्देÓ हट जाएंगे। इससे अफसरों के निठल्लेपन, स्वार्थ, पद के दुरुपयोग, पद लोलुपता आदि का खुलासा हो सकता है। कार्रवाई तो उन शराब कंपनियों पर भी होनी चाहिए, जिनके विज्ञापन लगे हैं। दरअसल, इनमें से ज्यादातर विज्ञापन कंपनी विशेष के हैं।Anil choudhary
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