जानलेवा 'सफर

भोपाल से इंदौर जा रही निजी बस में आगजनी ने बसों की फिटनेस पर बड़ा सवाल उठाया है। बस में सवार दो दर्जन यात्रियों का बमुश्किल बचाया जा सका। इससे परिवहन विभाग की कार्यशैली भी सवालों के घेरे में है। हालांकि, निजी बसों में सुरक्षा इंतजाम और फिटनेस को लेकर प्रशासनिक स्तर पर कई बार दिशा-निर्देश दिए गए, लेकिन इन पर अमल नहीं हो सका। नतीजा सामने है। वरना क्या बात है जो बड़ी बसों में आज तक दो गेट नहीं हैं। फस्र्ट एड बॉक्स नहीं हैं। अनफिट बसें सरपट दौड़ रही हैं। इस मामले में नीचे से ऊपर तक मिलीभगत की बू आ रही है। वरना किसी निजी बस ऑपरेटर यह हिमाकत कैसे कर सकता है? जिन बसों में हादसे हो रहे हैं, उन्हें फिटनेस सर्टिफिकेट कैसे मिला? यह अलग से पड़ताल का विषय हो सकता है। जिस विभाग में इतना बड़ा अमला है। लाखों रुपए खर्च किए जा रहे हैं। उस विभाग की कार्यशैली इतनी लचर है कि दैत्याकार खटरा बसों को फिटनेस सर्टिफिकेट मिल जाते हैं। यहां उल्लेख करना समीचीन होगा कि ज्यादातर परिवहन कार्यालयों में अनफिट बसों को सीसीटीवी कैमरों के सामने ही नहीं लाया जाता है। इस तथ्य की पुष्टि कई बार हो चुकी है। वहीं, इन बसों की जांच की जाए तो ज्यादातर बसें अनफिट निकलेंगी। प्रदेशभर में चल रही १५ हजार से अधिक निजी बसों में से ज्यादातर में तो टिकट भी नहीं दिया जाता है। ऐसे में कोई हादसा होता है तो यात्री क्लेम करने तक की स्थिति में नहीं रह जाता है। कई रूटों पर निजी बस ऑपरेटरों का एकाधिकार है, जहां इनका रवैया किसी दादागीरी से कम नहीं। इन बसों में धड़ल्ले से ओवरलोडिंग हो रही है। लोगों को छतों पर बैठाकर ढोया जा रहा है। यात्रियों के साथ धक्का-मुक्की आम बात हो गई है। दरअसल, निजी बस ऑपरेटरों के सामने नतमस्तक परिवहन विभाग को भी यात्रियों की जान की परवाह नहीं है। इस बात में कोई दोराय नहीं कि प्रदेश की सड़कें और परिवहन व्यवस्था निजी हाथों में सौंपने के लिए ही मध्यप्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम को साजिशन खत्म किया गया। इसके बाद से ही यात्रियों की हुज्जत बढ़ी है। निजी बस ऑपरेटरों का मकसद रुपए कमाने और अपने 'आकाओंÓ को खुश करने तक सीमित है। देखा जाए तो ज्यादातर निजी बसें कथित जनप्रतिनिधियों के पिछलग्गुओं और रिश्तेदारों की हैं। ऐसे में भला वे कोई कार्रवाई कैसे करें? वहीं, यात्री कई दिक्कतों के बीच 'सफरÓ कर रहे हैं।

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