भूख ने छीनी 'मा' की गोद
बंपर पैदावार वाले जिले के सैकड़ों मजदूरों का दूसरे राज्य में पलायन खेती में कम होते काम के अवसर की तस्वीर पेश करने के साथ ही कई सवाल खड़े कर रहा है। खेती में मशीनीकरण को भले ही क्रांति के रूप में लिया जाए, लेकिन मजदूरों के हित में नहीं कहा जा सकता। उपजाऊ जमीन वाले हरदा के रहटगांव, मोहनपुर, खूमी व बड़वानी के खेतीहर और अन्य मजदूरों का दो जून की रोटी के जुगाड़ में पलायन गरीबी उन्मूलन संबंधी सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़े करता है। ये मजदूर तीज-त्योहार पर उत्सव मनाने ही अपनी माटी की गोद में लौट पाते हैं। उनके मन में इसकी टीस तो है, पर पलायन मजबूरी भी बन चुका है। करोड़ों के बजट वाली ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत इन्हें काम क्यों नहीं दिया गया? इनके लिए रोजगार के अवसर मुहैया कराना किसका जिम्मा है? जनप्रतिनिधियों को तो अपने अमूल्य अधिकार का इस्तेमाल कर चुना ही इसलिए जाता है कि वो आमजन की पीड़ा समझें। उनके विकासोन्मुखी कार्य करें। मजूदरों का पलायन केंद्र और राज्य की योजनाओं, नीति नियंताओं, सरकारी अमले और जनप्रतिनिधियों के मुंह पर तमाचा नहीं तो और क्या है? कमोबेश यह परिस्थिति प्रदेश के कई इलाकों में है। वरना क्या बात है जो आज भी ५२ फीसदी बच्चे कुपोषित हैं। यह संख्या राष्ट्रीय पोषण संस्थान हैदराबाद की पिछले वर्ष जारी रिपोर्ट का है। यानी राज्य अपने बच्चों को पोषण तक मुहैया नहीं करा पा रहा है। निश्चित ही इन बच्चों के परिवारों की माली हालत खराब होगी। मतलब साफ है एक बड़ी आबादी के पास भरपेट भोजन नहीं है। माना कि एपीएल और बीपीएल कार्डधारी परिवारों को कुछ अनाज सस्ते में मिल जाता है, लेकिन उसमें पोषणयुक्त भोजन की बात कहां है? उस पर एक जनप्रतिनिधि का यह बयान कि मजदूर ज्यादा रुपए के लालच में पलायन कर रहे हैं, बेहद हास्यास्पद है। हम इंवेस्टर्स मीट करते हैं। जमीन और जंगलों को उद्योगों की भेंट चढ़ा रहे हैं, तो इसका खाका ऐसा क्यों नहीं बनाते कि पिछड़े इलाकों में रोजगार के अवसर बढ़ें? यह हमारे सिस्टम की कमजोर इच्छाशक्ति का द्योतक है। एक और सवाल जो दिमाग में बार-बार कौंधता है, यह कि जो परिवार पलायन कर रहे हैं उनके बच्चे शिक्षा से कैसे जुड़ेंगे? जब वे परिवार के साथ दूसरे प्रांतों में जा रहे हैं तो पढ़ कैसे पाएंगे? जाहिर सी बात है कि गरीब तबके के लिए संचालित तमाम योजनाओं के बजट में उनका हिस्सा है, लेकिन उनपर खर्च कहां हो रहा है? और यदि इसका लाभ उन्हें नहीं मिला तो उनके हिस्से के बजट का क्या हुआ? हालांकि, यहां यह कहना भी समीचीन होगा कि कई योजनाओं के बजट का बड़ा हिस्सा हर साल लैप्स हो जाता है। क्योंकि, ये सिस्टम उसका समय पर और सही इस्तेमाल ही नहीं कर पाता है। बहरहाल, पलायन कर रहे मजदूरों की बात करें। इन बदतर हालातों में मजबूत नई पीढ़ी की कल्पना बेमानी होगी। यदि इन गांवों में रोजगार मिले तो वे बाहर क्यों जाएंगे? निश्चित ही उन्हें अपनी उस माटी से प्रेम है, जहां वे जन्मे। उन गलियों से प्रेम है, जिनमें खेलकर बचपन गुजरा। अपने बच्चों से अगाध प्रेम है, जिनकी शिक्षा और स्वास्थ्य पलायन के कारण मारे जा रहे हैं। ऐसी असीम यादें उनके अंतर्मन में गहरे बैठी है, तभी तो वे तीज-त्योहार पर उत्सव मनाने अपनी माटी की गोद में आ जाते हैं।
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