हेल्पफुल हो 'लाइनÓ
मध्यप्रदेश में शुरू की गई महिला हेल्पलाइन १०९० निश्चित ही अच्छा प्रयास है। इसकी शुरुआत के पहले दिन राजधानी में १७ शिकायतें आईं। दरअसल, गैंगरेप के खिलाफ दिल्ली से उठी आवाजों के बीच मप्र में दुष्कर्म के मामलों की स्याह तस्वीर खुलकर सामने आ गई। इस दौरान इसकी परतें खोलती कई रिपोट्र्स सामने आईं। सभी की एक बात कॉमन है 'दुष्कर्म के मामलों में मध्यप्रदेश देशभर में नंबर वन पर हैÓ। इस पर भी नित नए मामले सामने आ रहे हैं। इससे शासन-प्रशासन निश्चित ही चिंता में आया। यहां यह उल्लेख करना समीचीन होगा कि राजधानी के मेट्रो थाना हबीबगंज में वर्ष २०१० में विश्व महिला दिवस पर जिला स्तरीय महिला हेल्पलाइन १०९१ शुरू की गई थी। इसके बावजूद अपराधों में कोई कमी नहीं आई। यहां वर्ष २०१२ में १०४९ शिकायतें दर्ज हुई, इनमें से महज ८ प्रकरण दर्ज किए जा सके। मनचले कई बार यहां तैनात महिला पुलिसकर्मियों से भी फोन पर अश्लील बातें करने लगते हैं और सेल उनकी तह तक नहीं जा पाती है। ऐसे में नई हेल्पलाइन से कितनी उम्मीदें की जाए? इससे दुष्कर्म और छेड़छाड़ के मामलों में कितनी कमी आएगी? दरअसल, ये जघन्य अपराध तो उन महिलाओं के साथ भी हो रहे हैं, जिनके पास शिकायत करने के लिए मोबाइल या फोन नहीं है। दरिंदों की हवश का शिकार तो अबोध बच्चियां और जीवन में अंतिम पड़ाव में चल रहीं वृद्धाएं भी हो रही हैं। जहां नेताओं और मंत्रियों की सेवा सुश्रुषा में भारी पुलिस बल लगा हो और दूसरी ओर बल की कमी का रोना रोया जा रहा हो वहां हेल्पलाइन से कितनी उम्मीदें की जाए? इस बात से शायद किसी को गुरेज न हो कि यहां आने वाली शिकायतों पर कार्रवाई के मामले में कुछ समय बाद पुलिस बल की कमी का जिक्र किया जाएगा। होना तो यह चाहिए कि शिकायत पर पुलिस तुरंत हरकत में आए और कार्रवाई करे। प्रदेशभर में थाना स्तर पर पर्याप्त बल के साथ कार्रवाई की जाए। हेल्पलाइन १०९१ में ऐसा नहीं हो पाया। वरना, महिला पुलिसकर्मियों को कॉल कर अश्लील संवाद कायम करने की हिमाकत ये मनचले कैसे कर पाते? और, यदि उन्होंने ऐसा किया तो पुलिस उन्हें सींखचों के पीछे क्यों नहीं पहुंचा पाई?

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