आंकड़े कितने खरे
दिल्ली में हुई सामूहिक दुष्कर्म की वारदात को एक माह बीत चुका है। इस अवधि में मध्यप्रदेश की स्याह तस्वीर भी सामने आ गई, जिसने शासन-प्रशासन के साथ संवेदनशील लोगों को भी शर्मिंदा किया। वहीं, इन वारदातों के खिलाफ पूरा राष्ट्र सड़कों पर आ गया। इसके बाद प्रदेश में दुष्कर्म, सामूहिक दुष्कर्म और छेड़छाड़ के मामले जिस तेजी से सामने आए उससे सभी अचंभित हैं। होना तो यह चाहिए था कि देशभर में उठे विरोधी स्वरों से इन दरिंदों की रूह कांप जाती। ये दुष्कर्म के विचार तक की हिमाकत नहीं कर पाते। लगातार बढ़ते मामले पुराने आंकड़ों पर सवाल उठाते हैं। हालांकि, इसमें भी मप्र देश में नंबर वन पर था। इससे पुलिस निश्चित ही संदेह के घेरे में है। जो नए मामले सामने आ रहे हैं, यह पुलिस प्रशासन पर दबाव का नतीजा तो नहीं है। ऐसा तो नहीं कि इन्हें छिपाने की पुलिस की मंशा नाकाम साबित हो रही है। वरना, क्या बात है जो एक निश्चित समय सीमा में पहले से अधिक मामले दर्ज हो रहे हैं। यह बहस का मुद्दा है। वनांचलों और आदिवासी इलाकों के जानकार समाजविदों की मानें तो वहां पहले भी दुष्कर्म, सामूहिक दुष्कर्म, ट्रैफिकिंग आदि जघन्य अपराध होते रहे हैं, लेकिन पुलिस मामला दर्ज करने में कोताही करती रही है। ऐसे कुछ मामले मीडिया ने भी उजागर किए हैं। कुछ दिन पूर्व आरटीआई के तहत पुलिस ने जानकारी दी थी कि डिंडोरी, बालाघाट, शहडोल, अनूपपुर आदि जिलों के कई गावों की आदिवासी लड़कियां दिल्ली व राजस्थान में बेची गईं। उनके साथ दुष्कर्म हुआ। लड़कियों के परिजनों से बात की तब पुलिस का चेहरा सामने आया। महीनों चक्कर काटने के बावजूद रिपोर्ट दर्ज नहीं की जाती है। जो मामले सामने आए थे वे दबाव के बाद दर्ज हुए थे। अब वनांचलों से लेकर मेट्रो सिटी की दौड़ में शामिल शहरों में लगातार मामले दर्ज हो रहे हैं। ये वहशियाना वारदातें अब से ज्यादा न सही तो इतनी तो पहले भी होती रही हैं। फर्क पुलिस की नीयत का है। यदि ऐसा नहीं है तो इतने विरोध प्रदर्शन और जनजागरुकता के बावजूद इन वारदातों में कमी क्यों नहीं आई?
- अनिल चौधरी
- अनिल चौधरी
मोहन भागवत से यह पूछा जाना चाहिये कि भाजपा द्वारा शासित यह राज्य इंडिया मे आता है या भारत में.
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