सेवा न गारंटी लोक सेवा गारंटी अधिनियम प्रदेश की अवाम के सामने बड़ी उम्मीद बनकर आया था। उसे उम्मीद थी कि सरकारी मुलाजिम अब समय पर काम कर देंगे। उसे दफ्तरों के चक्कर लगा-लगाकर अपनी एडिय़ां नहीं घिसना पड़ेगा। मजूरी का हर्जा होगा न समय की बर्बादी, लेकिन उसकी इन उम्मीदों पर कुठाराघात हो गया। यह उत्साह तो इसलिए भी था कि समय पर काम नहीं करने वाले अधिकारी-कर्मचारी से जुर्माना वसूला जाएगा। वहीं, पीडि़त को क्षतिपूर्ति दी जाएगी। ५२ सेवाओं के लिए प्रभावी इस अधिनियम का पालन कई अफसरान नहीं कर रहे हैं। आलम यह है कि १६ सरकारी विभाग में ७० हजार से अधिक मामले लंबित हैं। इनमें १२ हजार मामले तो पिछले दो साल से अटके पड़े हैं। इसके बावजूद क्या अफसरों पर जुर्माना हुआ? अव्वल तो यह कि इतनी लापरवाही, अधिनियम की अवहेलना और जनता की फजीहत के बावजूद प्रशासन शुतुरमुर्ग की तरह जमीन में गर्दन दबाए चुपचाप सबकुछ देख रहा है। इतना ही नहीं उसे जब जहां वक्त मिलता है लोक सेवा गारंटी अधिनियम का डंका पीटने लगता है। इसमें कोई दोराय नहीं कि अधिनियम कथित सरकारी अफसरों से परेशान लोगों को बड़ी राहत दे सकता है। इसे मध्यप्रदेश के...
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तकनीकी अभिशाप और पुरुषवादी विज्ञापन
विज्ञापन किसी भी संदेश को विशाल जनसमुदाय तक पहुंचाने का नफीस तरीका है। यह आपकी बात चित्रों और शब्दों के साथ लोगों तक पहुंचाता है, लेकिन यह चिंताजनक तब हो जाता है जब सही समझ के साथ नहीं किया गया हो। इन दिनों परिवार नियोजन के लिए दिए जा रहे विज्ञापनों में पुरुषवादी मानसिकता साफ झलकती है। इसमें पचास से अधिक लड़कियों को पानी ढोते कतारबध्द दिखाया गया है। 'संदेश है एक अरब चौदह करोड़ में यह हाल है तो आगे क्या होगा?' इसमें परिवार नियोजन की अपील भी की गई है। लड़कियों की इस कतार से लगता है कि हमारे यहां इनकी संख्या ज्यादा है। कुछ वर्ष पूर्व एक विज्ञापन और आया था 'बेटी नहीं बचाओगे तो बहू कहां से लाओगे।' इससे लगता है कि हम सिर्फ बहू लाने ओर वंश बढ़ाने के लिए बेटियां बचाने चाहते हैं। होना तो यह चाहिए कि हम बढ़ती आबादी रोकने के साथ ही घटते लिंगानुपात पर भी लोगों का जागरूक करें, ताकि दोहरा और प्रथमदृष्टया सही संदेश जा सके। तेजी से घटता लिंगानुपात राष्ट्रीय चुनौती बन चुकी है। गुजरात-राजस्थान की सीमा के दांग जिले में एक लड़की से आठ भाइयों की शादी कर दी गई। राजस्थान के...
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