जमीन जीमने की जुगत

बैतूल के कोसमी जलाशय की ३.१४६ हेक्टेयर जमीन फोरलेन निर्माण कंपनी को देने के मामले में कई सवाल मुंह बाए खड़े हैं। इन सवालों की फेहरिस्त विधानसभा में पूछे गए एक प्रश्न के बाद और लंबी हो गई है, जिसने इस बात की भी पोल खोल दी कि जमीन की बंदरबांट में सरकारी मुलाजिम भी पीछे नहीं हैं। जिले के मुखिया बी. चंद्रशेखर की इस कारस्तानी में भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) की मिलीभगत की बू भी आ रही है। वरना, क्या बात है, जो एक आईएएस अफसर शासन को अंधेरे में रखकर अपने दायरे से बाहर काम कर रहा है? एनएचएआई ने जमीन फोरलेन निर्माण कंपनी ओरिएंटल को दे दी। घालमेल और चोर-चोर मौसेरे भाई की एक और बानगी देखिए, जब जल संसाधन विभाग ने पुलिस को कलेक्टर के खिलाफ एफआईआर का आवेदन दिया, तो उसने सरकारी विभागों का मामला बताकर पल्ला झाड़ लिया। वहीं, एनएचएआई पर ४८ करोड़ का जुर्माना ठोंका है, लेकिन जब तक एफआईआर नहीं होती, यह जुर्माना वसूला जाना मुमकिन नहीं है। यहां यह उल्लेख करना समीचीन होगा कि फोरलेन निर्माण कंपनी जिस तालाब में दो लाख क्यूबिक मीटर मटेरियल से ३०० मीटर लंबी, ६० मीटर चौड़ी सड़क बना चुकी है, उससे ३४८ हेक्टेयर कृषि भूमि की सिंचाई होती है। जलाशय का दायरा कम होने से किसानों के सामने भी संकट खड़ा हो जाएगा। कंपनी इससे पहले सापना की नहरें और सीपेज ड्रेन भी तोड़ चुकी है, जिसका खामियाजा किसानों को उठाना पड़ा। 'पत्रिकाÓ इन मामलों को प्राथमिकता से उठाता रहा है। कलेक्टर का यह बयान भी हास्यास्पद है कि वे डिटेल देखने के बाद ही कुछ बता पाएंगे, लेकिन यह बात साफ है कि आज एक बुद्धिवादी वर्ग इन कारस्तानियों पर नजर रखे हुए है। और मामला जब विधानसभा में गूंजा है, तो इस वर्ग को 'विशिष्टजनोंÓ से यह उम्मीद है कि उनके हाथ दोषियों की गिरेबान तक जरूर पहुंचेंगे। यह पड़ताल का विषय है कि कलेक्टर ने अधिकारी सीमा लांघने की हिमाकत कैसे की? नहरें और सीपेज ड्रेन तोडऩे पर मौन क्यों साधा? कंपनी बिना अनुमति के बोर कर जमीन किसके दम पर उलीच रही है? देखना यह भी है कि जब मंत्री ने यह हस्तांतरण कलेक्टर के अधिकार क्षेत्र से बाहर का बताया है तो कार्रवाई क्या होती है?

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