सपनि के खात्मे पर सवाल
सुदृढ़ राज्य के लिए सुदृढ़ परिवहन व्यवस्था का होना जरूरी है। राज्य का दायित्व बनता है कि वह कल्याणकारी कार्य करे। शायद इस बात में कोई अतिश्योक्ति न हो कि मध्यप्रदेश में सड़क परिवहन निगम का बंद होना इस अवधारणा के अवसान जैसा है। जिसने जनता की सबसे बड़ी जरूरत को निजी हाथों में सौंप दिया। इसके बीज १९९२ में राष्ट्रीयकृत मार्गों पर निजी बसों को अनुमति देकर बो दिए गए थे। इसके बाद १९९६ में राज्य और फिर केंद्र सरकार ने क्षतिपूर्ति के लिए अपना अंश देना बंद कर दिया। सभी ६८१ राष्ट्रीयकृत मार्गों को अराष्ट्रीयकृत कर दिया गया। इन हालातों के बीच कई सवाल उठते हैं। मसलन- जिन मार्गों पर निजी ऑपरेटर लाभ कमा सकते हैं, उनपर राज्य की नो लॉस-नो प्राफिट वाली सेवा विफल क्यों रही? इन मार्गों पर निगम की महज १८०० बसें नहीं चल सकीं और आज निजी ऑपरेटरों की १५ हजार से अधिक बसें लाभ कमा रही हैं। क्या यह सरकारी तंत्र में कुप्रबंधन, भ्रष्टाचार, अकुशल नेतृत्व और अनुचित नियुक्तियों का दुष्परिणाम नहीं है? अगर प्रदेश की सड़कों पर इतना ही नुकसान था तो दूसरे राज्यों की बसें इन पर क्यों दौड़ रही हैं। सपनि के कर्मचारियों का चार से ३० माह तक का वेतन रोका जा चुका था। १०७१९ कर्मचारियों में से ९३ फीसदी ने मजबूरी में वीआरएस लिया था। सपनि के खात्मे पर राज्य ने जो ६०० करोड़ और केंद्र ने ४४.९१ करोड़ रुपए खर्च किए उससे उसे वापस खड़ा करने के प्रयास क्यों नहीं हुए? यह पूरा खेल २००५ में हुआ और २००९ में केंद्रीय मंत्रालय ने अनुमोदन वापस ले लिया। इस पूरे मामले में भ्रष्टाचार और स्वार्थ की बू हा रही है। कथित जनप्रतिनिधियों ने अपने पिछलग्गुओं की बसों के मार्ग खोल दिए। अगला सवाल यह कि जिस निगम की निगरानी राज्य व्यवस्था के लोग कर रहे हों, वह घाटे में कैसे गया? जनता के पैसों से जनता की सुविधा के लिए चलने वाली बसों से घाटे और मुनाफे का आकलन कर जो विफलता उजागर की गई वह किसकी है? आज जनता निजी बसों की असुरक्षा और अभद्रता के बीच सफर कर रही है। इनकी सघन जांच हो तो कई बसों के लाइसेंस, बीमा और फिटनेस में खामियां मिलेंगी, जो दुर्घटनाओं के वक्त यात्रियों की जान पर भारी पड़ सकती है। इन जिल्लतों से निजात दिलाने के लिए सपनि का शुरू होना जरूरी है, ताकि हर आदमी का सफर सुहाना हो सके। सपनि से बेरोजगार हुए हजारों लोगों का जीवन फिर पटरी पर आ सके।anil choudhary
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