हर दूसरा बच्चा कुपोषित

झाबुआ के गांव जुलवानिया छोटा और बड़ा में मिले तीन कुपोषित मासूमों ने फिर बहस छेड़ दी। कुपोषण के मामले लगातार सामने आते रहे हैं। बाल कल्याण की तमाम सरकारी योजनाओं के होने से इनमें कमी की भी उम्मीद बनती रही है, लेकिन यह फलीभूत नहीं होती। राज्य सरकार ने वर्ष-२०१० में हैदराबाद के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूट्रीशियन से सर्वे कराया। इसकी रिपोर्ट के मुताबिक मध्यप्रदेश में ५२ फीसदी बच्चे कुपोषित पाए गए, इनमें आठ फीसदी बच्चे गंभीर कुपोषित हैं। यानी प्रदेश का हर दूसरा बच्चा कुपोषण का शिकार है। जिनकी हड्डियां झुर्रीदार चमड़ी से बाहर झांक रही हैं। इनकी डबडबाई आंखों से निकले आंसू चेहरे की झुर्रियां में कहां समा जाते हैं पता ही नहीं चलता। मौत गिद्ध की तरह नजरें जमाए इनके सिर पर मंडरा रही है। बचपन में बूढ़े हुए इन बच्चों के स्वास्थ्य के लिए एनआरएचएम की ओर से प्रदेश में २७८ पोषाण पुनर्वास केंद्र संचालित हैं। करीब ९० हजार आंगनबाड़ी केंद्र हैं। इसके बावजूद बच्चों की यह दुर्दशा क्यों है? स्वास्थ्य और पौष्टिक भोजन के नाम पर करोड़ों रुपए खर्च होने के बावजूद कुपोषण कम नहीं हो रहा है। इसके पीछे गरीबी, भुखमरी, स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव, पोषण की सही जानकारी का अभाव, मां के दूध की कमी आदि मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं। व्यवस्थागत देखें तो एनआरसी और आंगनबाडिय़ों की ईमानदार कार्यशैली भी जरूरी है। हालांकि, फिलहाल ये केस हमारे सामने एनआरसी में दर्ज होने पर मीडिया के जरिए आ रहे हैं। निश्चित ही ऐसे भी कई मामले होंगे जो एनआरसी तक नहीं पहुंच पाते हैं और बच्चे दम तोड़ देते हैं। दरअसल, इन योजनाओं में भी भ्रष्टाचार के कई मामले उजागर हो चुके हैं। जाहिर सी बात है कि व्यवस्था में खोट भी कुपोषण का बड़ा कारण है। देश और प्रदेश के बेहतर भविष्य के लिए कुपोषण को खत्म करने की महती आवश्यकता है। इसके लिए मां के दूध से लेकर पौष्टिक आहार और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच सुलभ करानी होगी। हमारे नीति नियंताओं को कुपोषण की जटिल परिभाषाओं से बाहर निकलकर काम करना होगा। कुपोषण वाले इलाकों में जनजागरूकता अभियान चलाना होगा।

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