ये आईना हो तो बात बने अब प्रथम श्रेणी से लेकर तृतीय श्रेणी सरकारी कर्मचारी तक कोई भी अपने दो महीने के मूल वेतन से अधिक की संपत्ति खरीदता है तो उच्च अधिकारी को सूचना देनी होगी। मध्यप्रदेश सिविल सेवा आचरण नियम १९६५ में संशोधन का यह प्रस्ताव मंत्रिपरिषद की बैठक में शुक्रवार को लाया गया। भ्रष्टाचार रोकने की मंशा के तहत लाए गए इस प्रयास की सराहना होनी चाहिए, लेकिन इसमें कई सवालों की गुंजाइश भी है। मसलन, अब तक जिन अधिकारियों ने राजधानी की ब्रिटिश पार्क जैसी आलीशान कॉलोनी में आशियाने खरीदे हैं, क्या उनकी पड़ताल होगी? इनके पास इतनी रकम कहां से आई। इस बात में कोई दो राय नहीं कि पड़ताल में कई नए खुलासे हो सकते हैं, जिसका बड़ा पहलू भ्रष्टाचार हो सकता है। दरअसल, सूबे के कई अधिकारियों-कर्मचारियों के यहां समय-समय पर डाले गए छापों में आय से अधिक सम्पत्ति की पुष्टि हो चुकी है। इन धनकुबेरों ने यह संपदा कहां से जुटाई? क्या सरकार यह नहीं जानती कि सम्पत्ति खरीदते वक्त आधी कीमत नकद चुकानी होती है? यदि कोई अधिकारी-कर्मचारी आधी कीमत नकद देकर संपत्ति खरीदता है तो उसके सेवाकाल के वर्ष भी देखे जाने चाह...
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रिटेल में एफडीआई का भयानक खेल
एम जे अकबर रिटेल क्षेत्र को प्रत्यक्ष विदेशी निवेशकों के लिए खोलने का मसला अगर आर्थिक सुधार के चले आ रहे एजेंडे का महज हिस्सा भर होता, तो इस पर फ़ैसला कम से कम दो साल पहले हो गया होता. आज से साढ़े सात साल पहले कामकाज संभालने के समय ही मनमोहन सिंह सरकार इसके पक्ष में थी. लेकिन उनके प्रयासों को वाम दलों ने सफ़ल नहीं होने दिया, जिनके समर्थन के बगैर अपने पहले कार्यकाल में वे लोकसभा में बहुमत नहीं बनाए रख पाते. यह बात समझ में आने वाली है. कोई भी समझदार सरकार बहुराष्ट्रीय कंपनियों के फ़ायदे के लिए अपने भविष्य को दावं पर नहीं लगायेगी. लेकिन 2009 के आम चुनावों ने लोकसभा के अंकगणित को नाटकीय तौर पर बदल कर रख दिया. इसके साथ ही नीतिगत बदलाव के रास्तों पर बढ़ने की मनमोहन सरकार की क्षमता भी बढ़ गयी. इसके बावजूद रिटेल क्षेत्र में विदेशी निवेश के मसले पर फ़ैसला लेना सरकार के लिए आसान नहीं था. वाम मोर्चे के पराजय के बावजूद रिटेल को लेकर हर पक्ष एक सुर से इसका विरोध करता रहा है. कैबिनेट में सरकार का विरोध करने वाला कोई नहीं, लेकिन ऐसी स्थिति लोकसभा में नहीं है. सत्ताधा...
ये तंद्रा तोड़ो
ये तंद्रा तोड़ो नगर निगम अपर आयुक्त के मामले पर राज्य सरकार के दो मंत्री पर्दा डाल रहे हैं। मंत्रियों की चुप्पी भ्रष्ट अफसरों को बढ़ावा दे रही है। पांच दिन का मौन तोड़ते हुए प्रदेश कांग्रेस ने अपने होने का अहसास कराया। देर से ही सही, लेकिन विपक्ष ने प्रशासन में अंगद की तरह पैर जमाए डटे भ्रष्ट आला अफसरों पर बड़े सवाल उठाए हैं। वहीं, भोपाल ननि अपर आयुक्त जीपी माली और अतिक्रमण निरीक्षक सुभाष बाथम के मामले में 'राज्य सरकार और 'शहर सरकार कुंभकर्णी नींद से नहीं जागी। जबकि, कुछ संगठनों ने प्रदर्शन की दोनों आला अधिकारियों के निलंबन की मांग भी की है। इसके बावजूद बेअसर प्रशासन के कानों में जूं तक नहीं रेंगी। मानो कानों में बर्फ जमी हो, लेकिन उसे यह नहीं भूलना चाहिए कि जनता का हक मारने वाले भ्रष्टों की पैरवी करने से आवाम के मन में नाउम्मीदी उपजी है। उसे यह शाश्वत सत्य भी अपने दिमाग में बैठाकर रखना चाहिए कि आवाम के हितार्थ राजनियमों और हकों की अवहेलना करने वालों का हिसाब आवाम ही करती है। घोर ताज्जुव की बात है कि जिस शहर सरकार के तमाम बड़े कार्यों का क्रियान्वयन इन आला अफसरों के हाथों होत...
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