पेंशन की टेंशन
सेवानिवृत्त हुए पांच माह गुजर गए और पेंशन का अब तक कोई अता-पता नहीं है। घर में साग-भाजी खरीदने के लिए भी बच्चों का मुंह ताकना पड़ रहा है। पिछले दिनों किराना वाले अग्रवाल ने भी खाता बंद कर दिया है। अनहद को यूं तो अपने बच्चों से कुछ मांगना अच्छा नहीं लगता, लेकिन पत्नी की बातें सुनकर मांग ही लेते हैं। उनके तीनों बेटे बढिय़ा काम से लगे हैं। इसके बावजूद बाबूजी के रिटायर होने पर मोटी रकम की आस थी। इसी के चलते उन्होंने रिटायर होने के छह महीने पहले से खूब सेवा-संवार की, लेकिन जब कुछ नहीं मिला तो सभी ने मुंह फेर लिया। एक दिन पत्नी की बातों और औलाद की अनदेखी से तंग आकर अनहद जोर से झल्लाया। मानो ज्वालामुखी फट पड़ा हो। अरे, क्या नहीं किया मैंने पेंशन के लिए। पीएफ ऑफिस के कई चक्कर लगा चुका हूं। एडिय़ां घिस गई हैं, बाबुओं के पास जा-जाकर। वहां चपरासी से लेकर बाबू तक हर किसी को घनचक्कर बना देता है। सुनने वाला तो कोई है नहीं। साहब के यहां बिना पर्ची के जा नहीं सकते। दो दिन पहले की बात है। चपरासी गेट पर ऊंघ रहा था, तो मैं सीधा चला गया। अंदर जाते ही विकृत से शरीर वाले एक बाबू ने हिकारत की नजर से देखा। पूछा- कैसे आए हो? मैंने कहा पेंशन का आवेदन दिया था, अब तक कुछ नहीं हुआ। कोई हल तो निकालिए। सामने से कुटिल मुस्कान के साथ जवाब आया, हूं..। अरे, आपने इतने साल सरकारी नौकरी की है और तौर-तरीके मालूम ही नहीं है। हैरत की बात है! आप जैसे लोग ही हमारी बिरादरी को खराब कर रहे हैं। ईमानदारी का भूत अब तक नहीं उतरा। अरे, पीएफ का ऑफिस और पेंशन का मामला हो तो आवेदन पर वजन होना चाहिए या फिर कोई आदमी 'वजनदारÓ हो। इन दोनों कंडीशन में काम आसान हो जाता है। वरना तो कई आवेदन चार सालों से अटके पड़े हैं। बाबू के मुंह में भरे गुटखे के पीक में उसकी जीभ तैरते हुए इसी तरह कई सबक देती रही। अनहद अपनी ईमानदारी को मथता रहा। बाबू जब ज्यादा ही कहलाने लगा तो पास के कोने में मुंह खाली कर लिया। अनहद को 'वजनÓ वाली बात खटक रही थी। अंतत: उसने पूछ ही लिया, कैसा वजन होना चाहिए? फिर क्या था? बाबू चिल्लाया, इतनी देर से क्या सुने जा रहे हो। लाखों लेने की हसरत रखते हो तो हजारों तो देना ही पड़ेगा। अरे, ये देखो एक फॉर्म मिल गया, इसमें हस्ताक्षर मेल नहीं खा रहे हैं। बाबू ने फिर हिकारत से देखा। अरे न फॉर्म भर सकते हो, न सरकारी दफ्तर के रीति-रिवाज जानते हो फिर पेंशन कैसे बन जाएगी। जाओ अभी लंच टाइम हो गया है। अनहद के अंतर्मन में उसकी ईमानदारी के हजारों द्वंद्वों ने कुरूक्षेत्र से माहौल बना दिया। उसे तो बड़ी उम्मीद थी। बड़ा खुश था, कि ईमानदारी से नौकरी करो। किसी पचड़े में मत फंसो। बाकी लाइफ टेंशनमुक्त रहेगी। पर, यहां तो उल्टा हो गया। जो पचड़े में पड़कर सस्पेंड होते हैं, जो आय से अधिक संपत्ति के मामलों में फंसते हैं, उनका हर काम जल्दी होता है। वे पुरस्कृत भी किए जाते हैं। अनहद को वह दिन भी याद आ गया, जब रिटायर हुआ था। उस दिन स्टॉफ के चंद लोग ही विदाई देने आए थे। कोई पार्टी न दिखावा। अनहद लगातार पीएफ ऑफिस के चक्कर काट रहा है।
Anil choudhary
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