जहां के तहां

यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री में मौजूद ३५० मीट्रिक टन जहरीला कचरा हटाने पर जर्मन कंपनी के इनकार के बाद भोपाल फिर २८ साल पहले की अवस्था में पहुंच गया है। सन २००५ में हाईकोर्ट के निर्देश के बाद सरकार ने कचरा हटाने की पहल की। पहले गुजरात के अंकलेश्वर फिर पीथमपुर और इसके बाद जर्मनी तीनों ही स्थान पर मीडिया ने पर्यावरण के नुकसान को मुद्दा बनाया और मामला टल गया। जर्मनी की जीआईजेड कंपनी ने भी स्थानीय मीडिया के दबाव में आकर हाथ खड़े कर दिए। अब तक की पूरी कवायद विफल रही। हम जहां से चले थे, वहीं खड़े नजर आ रहे हैं। प्रदेश के सामने एक बार फिर वही चिंता और चुनौती है। एक ओर शासन-प्रशासन कचरे के निष्पादन के लिए प्रतिबद्धता जता रहे हैं, लेकिन इसके रास्ते क्या हैं? निष्पादन कहां और कब होगा? इसके कौन से विकल्प हैं। भोपाल की फिजा को जहर से कब मुक्ति मिलेगी? जैसे सवाल भी अहम हैं। भोपाल की अवाम इनका जवाब चाहती है। दरअसल, वह जहरीली हवा और पानी से उपजी बीमारियों से चिंतित है। उसे चिंता है कि आने वाली और कितनी पीढिय़ां विकलांग और विकृत पैदा होंगी? मुक्ति का रास्ता साफ नजर नहीं आता। आलम यह है कि यूका के रासायनिक कचरे ने जिन बस्तियों के पानी में विष घोला है उनकी संख्या बढ़कर १८ हो गई है। जाहिर सी बात है जो बस्तियां हादसे के समय प्रभावित नहीं हुईं थीं वे अब यह दंश भोग रही हैं। पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वाले संगठन इस जहर के और बढऩे की आशंका जता रहे हैं। हालांकि, प्रशासन का कहना है कि देश में २७ ऐसे स्थान हैं, जहां कचरे का निष्पादन किया जा सकता है। ऐसे में यह सवाल दिमाग में बार-बार कौंधता है कि इस बात की क्या गारंटी है कि इन स्थानों पर निष्पादन हो ही जाएगा। दरअसल, वहां के रहवासियों को विश्वास में लेना भी तो बड़ी चुनौती है। होना तो यह चाहिए कि शासन मजबूत और ईमानदार इच्छाशक्ति से काम ले। वरना तो पिछले तमाम अनुभव निराशाजनक रहे हैं। मसलन ५० करोड़ रुपए खर्च करने के बावजूद इन बस्तियों को साफ पानी मुहैया नहीं कराया जा सका। जो सिस्टम गोदाम में भरे ३५० मीट्रिक टन कचरे का ही निष्पादन नहीं करवा पा रहा है, वह यूका परिसर में बिखरे और तालाबों में दबे करीब २१ हजार मीट्रिक टन कचरे का निष्पादन कैसे करेगा? होना तो यह चाहिए कि जिन राज्यों में कचरा निपटान के इंतजाम हैं, शीघ्र ही व्यवस्था की जाए।
Anil choudhary

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