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Showing posts from January, 2013
आंकड़े कितने खरे दिल्ली में हुई सामूहिक दुष्कर्म की वारदात को एक माह बीत चुका है। इस अवधि में मध्यप्रदेश की स्याह तस्वीर भी सामने आ गई, जिसने शासन-प्रशासन के साथ  संवेदनशील लोगों को भी शर्मिंदा किया। वहीं, इन वारदातों के खिलाफ पूरा राष्ट्र सड़कों पर आ गया। इसके बाद प्रदेश में दुष्कर्म, सामूहिक दुष्कर्म और छेड़छाड़ के मामले जिस तेजी से सामने आए उससे सभी अचंभित हैं। होना तो यह चाहिए था कि देशभर में उठे विरोधी स्वरों से इन दरिंदों की रूह कांप जाती। ये दुष्कर्म के विचार तक की हिमाकत नहीं कर पाते। लगातार बढ़ते मामले पुराने आंकड़ों पर सवाल उठाते हैं। हालांकि, इसमें भी मप्र देश में नंबर वन पर था। इससे पुलिस निश्चित ही संदेह के घेरे में है। जो नए मामले सामने आ रहे हैं, यह पुलिस प्रशासन पर दबाव का नतीजा तो नहीं है। ऐसा तो नहीं कि इन्हें छिपाने की पुलिस की मंशा नाकाम साबित हो रही है। वरना, क्या बात है जो एक निश्चित समय सीमा में पहले से अधिक मामले दर्ज हो रहे हैं। यह बहस का मुद्दा है। वनांचलों और आदिवासी इलाकों के जानकार समाजविदों की मानें तो वहां पहले भी दुष्कर्म, सामूहिक दुष्कर्म, ट्रैफ...
जहां के तहां यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री में मौजूद ३५० मीट्रिक टन जहरीला कचरा हटाने पर जर्मन कंपनी के इनकार के बाद भोपाल फिर २८ साल पहले की अवस्था में पहुंच गया है। सन २००५ में हाईकोर्ट के निर्देश के बाद सरकार ने कचरा हटाने की पहल की। पहले गुजरात के अंकलेश्वर फिर पीथमपुर और इसके बाद जर्मनी तीनों ही स्थान पर मीडिया ने पर्यावरण के नुकसान को मुद्दा बनाया और मामला टल गया। जर्मनी की जीआईजेड कंपनी ने भी स्थानीय मीडिया के दबाव में आकर हाथ खड़े कर दिए। अब तक की पूरी कवायद विफल रही। हम जहां से चले थे, वहीं खड़े नजर आ रहे हैं। प्रदेश के सामने एक बार फिर वही चिंता और चुनौती है। एक ओर शासन-प्रशासन कचरे के निष्पादन के लिए प्रतिबद्धता जता रहे हैं, लेकिन इसके रास्ते क्या हैं? निष्पादन कहां और कब होगा? इसके कौन से विकल्प हैं। भोपाल की फिजा को जहर से कब मुक्ति मिलेगी? जैसे सवाल भी अहम हैं। भोपाल की अवाम इनका जवाब चाहती है। दरअसल, वह जहरीली हवा और पानी से उपजी बीमारियों से चिंतित है। उसे चिंता है कि आने वाली और कितनी पीढिय़ां विकलांग और विकृत पैदा होंगी? मुक्ति का रास्ता साफ नजर नहीं आता। आलम यह है कि ...
ये आईना हो तो बात बने अब प्रथम श्रेणी से लेकर तृतीय श्रेणी सरकारी कर्मचारी तक कोई भी अपने दो महीने के मूल वेतन से अधिक की संपत्ति खरीदता है तो उच्च अधिकारी को सूचना देनी होगी। मध्यप्रदेश सिविल सेवा आचरण नियम १९६५ में संशोधन का यह प्रस्ताव मंत्रिपरिषद की बैठक में शुक्रवार को लाया गया। भ्रष्टाचार रोकने की मंशा के तहत लाए गए इस प्रयास की सराहना होनी चाहिए, लेकिन इसमें कई सवालों की गुंजाइश भी है। मसलन, अब तक जिन अधिकारियों ने राजधानी की ब्रिटिश पार्क जैसी आलीशान कॉलोनी में आशियाने खरीदे हैं, क्या उनकी पड़ताल होगी? इनके पास इतनी रकम कहां से आई। इस बात में कोई दो राय नहीं कि पड़ताल में कई नए खुलासे हो सकते हैं, जिसका बड़ा पहलू भ्रष्टाचार हो सकता है। दरअसल, सूबे के कई अधिकारियों-कर्मचारियों के यहां समय-समय पर डाले गए छापों में आय से अधिक सम्पत्ति की पुष्टि हो चुकी है। इन धनकुबेरों ने यह संपदा कहां से जुटाई? क्या सरकार यह नहीं जानती कि सम्पत्ति खरीदते वक्त आधी कीमत नकद चुकानी होती है?  यदि कोई अधिकारी-कर्मचारी आधी कीमत नकद देकर संपत्ति खरीदता है तो उसके सेवाकाल के वर्ष भी देखे जाने चाह...
दलदल से सब सने हैं चंद वर्षों में १४ करोड़ से हजारों करोड़ की सम्पत्ति के आसामी बने सुधीर शर्मा और दिलीप सूर्यवंशी की शासन-प्रशासन में गहरी पैठ है। नौकरशाह उनके इशारों पर नाचते हैं। वरना सरकारी महकमों की क्या मजाल कि आयकर विभाग को जानकारी देने में आनाकानी करे। ये समीकरण शर्मा और सूर्यवंशी व उनके आसपास के लोगों के यहां मिले सरकारी दस्तावेज से भी जुड़े हैं। दरअसल, इन्होंने उन सरकारी महकमों में अपने चहेतों को काबिज करवा रखा है, जिनसे इनका लेना-देना है। यह खबर भी मंत्रालय के गलियारों से होकर बाहर आई है। शायद इस बात से किसी को गुरेज न हो कि एक भ्रष्ट के इशारे पर भ्रष्ट अफसरानों को ही पदस्थ किया जा सकता है, जो उसके इशारों पर चलें। उक्त विभागों में निश्चित ही ऐसे लोग होंगे। पूरी व्यवस्था सड़ांध मारता दलदल प्रतीत हो रही है, जिससे कोई अछूता नहीं है। शर्मा और सूर्यवंशी से सत्ता-संगठन की नजदीकियां व शह जगजाहिर हो चुकी है। इसी दौरान विपक्ष से जुड़े जो समीकरण सामने आए, उनमें शर्मा बंधुओं से करीबियों का खुलासा हुआ है। जाहिर सी बात है दोनों प्रमुख राजनीतिक दल और नौकरशाही इस दलदल का हिस्सा है। यदि ...
पेंशन की टेंशन सेवानिवृत्त हुए पांच माह गुजर गए और पेंशन का अब तक कोई अता-पता नहीं है। घर में साग-भाजी खरीदने के लिए भी बच्चों का मुंह ताकना पड़ रहा है। पिछले दिनों किराना वाले अग्रवाल ने भी खाता बंद कर दिया है। अनहद को यूं तो अपने बच्चों से कुछ मांगना अच्छा नहीं लगता, लेकिन पत्नी की बातें सुनकर मांग ही लेते हैं। उनके तीनों बेटे बढिय़ा काम से लगे हैं। इसके बावजूद बाबूजी के रिटायर होने पर मोटी रकम की आस थी। इसी के चलते उन्होंने रिटायर होने के छह महीने पहले से खूब सेवा-संवार की, लेकिन जब कुछ नहीं मिला तो सभी ने मुंह फेर लिया। एक दिन पत्नी की बातों और औलाद की अनदेखी से तंग आकर अनहद जोर से झल्लाया। मानो ज्वालामुखी फट पड़ा हो। अरे, क्या नहीं किया मैंने पेंशन के लिए। पीएफ ऑफिस के कई चक्कर लगा चुका हूं। एडिय़ां घिस गई हैं, बाबुओं के पास जा-जाकर। वहां चपरासी से लेकर बाबू तक हर किसी को घनचक्कर बना देता है। सुनने वाला तो कोई है नहीं। साहब के यहां बिना पर्ची के जा नहीं सकते। दो दिन पहले की बात है। चपरासी गेट पर ऊंघ रहा था, तो मैं सीधा चला गया। अंदर जाते ही विकृत से शरीर वाले एक बाबू ने हिकारत...
'पर्दे' के पीछे का सच कुकुरमुत्तों की तरह खुली शराब की दुकानों और लुभावने व अश्लील विज्ञापनों से अवाम आजिज आ चुकी है। राजधानी का सभ्य और पढ़ा-लिखा समाज इनका विरोध कर रहा है। आबकारी और प्रशासनिक अफसरों के गैरजिम्मेदाराना और बेतुके जवाबों से जाहिर हो चुका है कि उनकी कार्रवाई की इच्छा नहीं है। हालांकि, कई दुकानदारों ने इन विज्ञापनों पर काले पर्दे डाल दिए हैं, लेकिन प्रशासन को यह नहीं भूलना चाहिए कि पर्दा गिरता है, तो उठता भी है। घोर आश्चर्य की बात है कि ज्यादातर अफसरों को यही नहीं मालूम कि शराब दुकानों के विज्ञापन के नियम क्या हैं? कार्रवाई कैसे और क्या हो सकती है? मार्के की बात तो यह भी है कि सत्ता पक्ष के विधायक और जनप्रतिनिधि भी इस बात पर आपत्ति जता चुके हैं। इसके बावजूद अफसरों ने यह हिमाकत कैसे कर दी कि वे हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। इस पर भी बड़ा सवाल है कि आबकारी के नाम पर एक पूरा विभाग है। करोड़ों रुपए तनख्वाह पर खर्च किए जा रहे हैं। इन्हें नियमों तक की जानकारी नहीं है। अफसर इस गफलत में क्यों हैं? स्कूल, कॉलेज और मंदिरों के पास शराब दुकानों की अनुमति कैसे दी जा रही है? खाद्...
सपनि के खात्मे पर सवाल सुदृढ़ राज्य के लिए सुदृढ़ परिवहन व्यवस्था का होना जरूरी है। राज्य का दायित्व बनता है कि वह कल्याणकारी कार्य करे। शायद इस बात में कोई अतिश्योक्ति न हो कि मध्यप्रदेश में सड़क परिवहन निगम का बंद होना इस अवधारणा के अवसान जैसा है। जिसने जनता की सबसे बड़ी जरूरत को निजी हाथों में सौंप दिया। इसके बीज १९९२ में राष्ट्रीयकृत मार्गों पर निजी बसों को अनुमति देकर बो दिए गए थे। इसके बाद १९९६ में राज्य और फिर केंद्र सरकार ने क्षतिपूर्ति के लिए अपना अंश देना बंद कर दिया। सभी ६८१ राष्ट्रीयकृत मार्गों को अराष्ट्रीयकृत कर दिया गया। इन हालातों के बीच कई सवाल उठते हैं। मसलन- जिन मार्गों पर निजी ऑपरेटर लाभ कमा सकते हैं, उनपर राज्य की नो लॉस-नो प्राफिट वाली सेवा विफल क्यों रही? इन मार्गों पर निगम की महज १८०० बसें नहीं चल सकीं और आज निजी ऑपरेटरों की १५ हजार से अधिक बसें लाभ कमा रही हैं। क्या यह सरकारी तंत्र में कुप्रबंधन, भ्रष्टाचार, अकुशल नेतृत्व और अनुचित नियुक्तियों का दुष्परिणाम नहीं है? अगर प्रदेश की सड़कों पर इतना ही नुकसान था तो दूसरे राज्यों की बसें इन पर क्यों दौड़ रही हैं। ...
सफेद जहर का कारोबार राजधानी सहित पूरे प्रदेश में दूध, मावा, घी, पनीर सहित अन्य मिलावटी दुग्ध उत्पादों का कारोबार धड़ल्ले से हो रहा है। यानी प्रदेश की सेहत पर सीधा वार। केवल त्योहारी सीजन में हरकत में आने वाला खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग का अमला मिलावटी दुग्ध उत्पादों के सैंपल लेता है, लेकिन इसकी जांच रिपोर्ट आने तक हजारों टन 'सफेद जहरÓ बाजार में खपाया जा चुका होता है। लोग इसका उपयोग कर चुके होते हैं। रिपोर्ट आने तक तो इनके शरीर में मिलावट के दुष्परिणाम अपना असर दिखाना शुरू कर देते हैं। एक सवाल दिमाग में बार-बार कौंधता है कि यह अमला त्योहारी सीजन में ही हरकत में क्यों आता है? जब फूड इंस्पेक्र्स को नियमित सैंपल लेने का टारगेट दिया जाता है, उसके बावजूद ये मिलावटखोर 'सफेद जहरÓ को बाजार में उतारने में कामयाब कैसे हो जाते हैं? फूड इंस्पेक्टर्स ने कितने सैंपल लिए और उनकी जांच रिपोर्ट क्या रही? यह अलग से पड़ताल का विषय हो सकता है। खाद्य एवं औषधि प्रशासन का अमला त्योहारी सीजन में तो मिलावटी माल की खेप पकड़कर खुद की पीठ थपथपा लेता है, लेकिन बाकी दिनों की जिम्मेदारी किसकी है? वह इसके ...
भूख ने छीनी 'मा' की गोद बंपर पैदावार वाले जिले के सैकड़ों मजदूरों का दूसरे राज्य में पलायन खेती में कम होते काम के अवसर की तस्वीर पेश करने के साथ ही कई सवाल खड़े कर रहा है। खेती में मशीनीकरण को भले ही क्रांति के रूप में लिया जाए, लेकिन मजदूरों के हित में नहीं कहा जा सकता। उपजाऊ जमीन वाले हरदा के रहटगांव, मोहनपुर, खूमी व बड़वानी के खेतीहर और अन्य मजदूरों का दो जून की रोटी के जुगाड़ में पलायन गरीबी उन्मूलन संबंधी सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़े करता है। ये मजदूर तीज-त्योहार पर उत्सव मनाने ही अपनी माटी की गोद में लौट पाते हैं। उनके मन में इसकी टीस तो है, पर पलायन मजबूरी भी बन चुका है। करोड़ों के बजट वाली ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत इन्हें काम क्यों नहीं दिया गया? इनके लिए रोजगार के अवसर मुहैया कराना किसका जिम्मा है? जनप्रतिनिधियों को तो अपने अमूल्य अधिकार का इस्तेमाल कर चुना ही इसलिए जाता है कि वो आमजन की पीड़ा समझें। उनके विकासोन्मुखी कार्य करें। मजूदरों का पलायन केंद्र और राज्य की योजनाओं, नीति नियंताओं, सरकारी अमले और जनप्रतिनिधियों के मुंह पर तमाचा ...
जानलेवा 'सफर भोपाल से इंदौर जा रही निजी बस में आगजनी ने बसों की फिटनेस पर बड़ा सवाल उठाया है। बस में सवार दो दर्जन यात्रियों का बमुश्किल बचाया जा सका। इससे परिवहन विभाग की कार्यशैली भी सवालों के घेरे में है। हालांकि, निजी बसों में सुरक्षा इंतजाम और फिटनेस को लेकर प्रशासनिक स्तर पर कई बार दिशा-निर्देश दिए गए, लेकिन इन पर अमल नहीं हो सका। नतीजा सामने है। वरना क्या बात है जो बड़ी बसों में आज तक दो गेट नहीं हैं। फस्र्ट एड बॉक्स नहीं हैं। अनफिट बसें सरपट दौड़ रही हैं। इस मामले में नीचे से ऊपर तक मिलीभगत की बू आ रही है। वरना किसी निजी बस ऑपरेटर यह हिमाकत कैसे कर सकता है? जिन बसों में हादसे हो रहे हैं, उन्हें फिटनेस सर्टिफिकेट कैसे मिला? यह अलग से पड़ताल का विषय हो सकता है। जिस विभाग में इतना बड़ा अमला है। लाखों रुपए खर्च किए जा रहे हैं। उस विभाग की कार्यशैली इतनी लचर है कि दैत्याकार खटरा बसों को फिटनेस सर्टिफिकेट मिल जाते हैं। यहां उल्लेख करना समीचीन होगा कि ज्यादातर परिवहन कार्यालयों में अनफिट बसों को सीसीटीवी कैमरों के सामने ही नहीं लाया जाता है। इस तथ्य की पुष्टि कई बार हो चुकी है।...
नारी तुम चंडी बनो इंदौर के बेटमा में दो युवतियों के साथ गैंगरेप के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने प्रदेश सरकार और इंदौर पुलिस से जवाब तलब किया है। गैंगरेप में १४ युवक शामिल थे। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड शाखा की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक देश में २०११ में बलात्कार के सबसे ज्यादा १२६२ मामले मध्यप्रदेश में दर्ज हुए हैं। इसमें इंदौर सबसे ऊपर और दूसरे नंबर पर भोपाल है। इधर, विधानसभा में मानसून सत्र के पहले दिन गृहमंत्री ने बताया कि जनवरी से २० जून तक ज्यादती के १५४२ मामले दर्ज हुए। यानी लगभग गुणोत्तर वृद्धि हुई है। महिलाएं कहां सुरक्षित हैं? यह सवाल सभी के लिए है। रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली में बलात्कार के मामलों में २५.४ फीसदी बढ़ोतरी हुई है। यहां हाल ही में एक युवती से पांच लोगों ने गैंगरेप किया। सफदरजंग के अस्पताल में गर्भवती से बलात्कार की कोशिश की गई। गुवाहाटी की घटना ने भी सभी को झकझोर दिया। जाहिर सी बात है, महिलाएं कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं। इन मामलों में स्थानीय स्तर पर देखें तो पुलिस व प्रशासन और राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय महिला आयोग के रवैये से लोगों में नाउम्मीदी बनी है। कई लोग पीडि़ता...
सेवा न गारंटी लोक सेवा गारंटी अधिनियम प्रदेश की अवाम के सामने बड़ी उम्मीद बनकर आया था। उसे उम्मीद थी कि सरकारी मुलाजिम अब समय पर काम कर देंगे। उसे दफ्तरों के चक्कर लगा-लगाकर अपनी एडिय़ां नहीं घिसना पड़ेगा। मजूरी का हर्जा होगा न समय की बर्बादी, लेकिन उसकी इन उम्मीदों पर कुठाराघात हो गया। यह उत्साह तो इसलिए भी था कि समय पर काम नहीं करने वाले अधिकारी-कर्मचारी से जुर्माना वसूला जाएगा। वहीं, पीडि़त को क्षतिपूर्ति दी जाएगी। ५२ सेवाओं के लिए प्रभावी इस अधिनियम का पालन कई अफसरान नहीं कर रहे हैं। आलम यह है कि १६ सरकारी विभाग में ७० हजार से अधिक मामले लंबित हैं। इनमें १२ हजार मामले तो पिछले दो साल से अटके पड़े हैं। इसके बावजूद क्या अफसरों पर जुर्माना हुआ? अव्वल तो यह कि इतनी लापरवाही, अधिनियम की अवहेलना और जनता की फजीहत के बावजूद प्रशासन शुतुरमुर्ग की तरह जमीन में गर्दन दबाए चुपचाप सबकुछ देख रहा है। इतना ही नहीं उसे जब जहां वक्त मिलता है लोक सेवा गारंटी अधिनियम का डंका पीटने लगता है। इसमें कोई दोराय नहीं कि अधिनियम कथित सरकारी अफसरों से परेशान लोगों को बड़ी राहत दे सकता है। इसे मध्यप्रदेश के...
हर दूसरा बच्चा कुपोषित झाबुआ के गांव जुलवानिया छोटा और बड़ा में मिले तीन कुपोषित मासूमों ने फिर बहस छेड़ दी। कुपोषण के मामले लगातार सामने आते रहे हैं। बाल कल्याण की तमाम सरकारी योजनाओं के होने से इनमें कमी की भी उम्मीद बनती रही है, लेकिन यह फलीभूत नहीं होती। राज्य सरकार ने वर्ष-२०१० में हैदराबाद के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूट्रीशियन से सर्वे कराया। इसकी रिपोर्ट के मुताबिक मध्यप्रदेश में ५२ फीसदी बच्चे कुपोषित पाए गए, इनमें आठ फीसदी बच्चे गंभीर कुपोषित हैं। यानी प्रदेश का हर दूसरा बच्चा कुपोषण का शिकार है। जिनकी हड्डियां झुर्रीदार चमड़ी से बाहर झांक रही हैं। इनकी डबडबाई आंखों से निकले आंसू चेहरे की झुर्रियां में कहां समा जाते हैं पता ही नहीं चलता। मौत गिद्ध की तरह नजरें जमाए इनके सिर पर मंडरा रही है। बचपन में बूढ़े हुए इन बच्चों के स्वास्थ्य के लिए एनआरएचएम की ओर से प्रदेश में २७८ पोषाण पुनर्वास केंद्र संचालित हैं। करीब ९० हजार आंगनबाड़ी केंद्र हैं। इसके बावजूद बच्चों की यह दुर्दशा क्यों है? स्वास्थ्य और पौष्टिक भोजन के नाम पर करोड़ों रुपए खर्च होने के बावजूद कुपोषण कम नहीं हो रहा है।...
छूटती जमीन, टूटती सांसें कटनी के डोकरिया बुजबुजा गांव में सुनिया के आत्मदाह की घटना ने मानव मन को झिझोड़कर रख दिया। वहीं, २५ वर्षीय रामप्यारे ने भी जहर खाकर जान देने की कोशिश की। जाहिर सी बात है दो साल से सांकेतिक चिता सजाकर जमीन अधिग्रहण का विरोध कर रहे किसान जाना की बाज लगाकर अपनी पुश्तों की विरासत बचाना चाहते हैं। इस पर पुलिस का अमानवीय चेहरा देखिए, वह विरोध कर रहे किसानों पर लाठियां भांजती है। इस पर भी शर्मनाक यह कि कृषि मंत्री ने किसानों को दलाल करार दिया। दरअसल, किसानों को यह चौतरफा मार हमेशा से पड़ती रही है। अतीत में झांककर देखें तो हरदा के घोगल गांव और खरसाना के २०० किसानों ने ठुड्डी तक पानी में जल सत्याग्रह कर जमीन छिनने का विरोध किया था, तब मछलियां उन्हें भोजन बना रहीं थी, लेकिन प्रशासन की तानाशाही और अमानवीयता में कोई फर्क नहीं आया। यहां भी गिरफ्तारियां हुईं। कफ्र्यू जैसे हालात पैदा कर दिए गए। दूसरी ओर शासन के कपटीपन से दुखी किसान चिता सजाए बैठे हैं। प्रदेशभर में कई जगह आए दिन प्रदर्शन होते रहते हैं। काबिले गौर तो यह भी है कि विकास के नाम पर अधिग्रहित की जा रही जमीन का इ...
जमीन जीमने की जुगत बैतूल के कोसमी जलाशय की ३.१४६ हेक्टेयर जमीन फोरलेन निर्माण कंपनी को देने के मामले में कई सवाल मुंह बाए खड़े हैं। इन सवालों की फेहरिस्त विधानसभा में पूछे गए एक प्रश्न के बाद और लंबी हो गई है, जिसने इस बात की भी पोल खोल दी कि जमीन की बंदरबांट में सरकारी मुलाजिम भी पीछे नहीं हैं। जिले के मुखिया बी. चंद्रशेखर की इस कारस्तानी में भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) की मिलीभगत की बू भी आ रही है। वरना, क्या बात है, जो एक आईएएस अफसर शासन को अंधेरे में रखकर अपने दायरे से बाहर काम कर रहा है? एनएचएआई ने जमीन फोरलेन निर्माण कंपनी ओरिएंटल को दे दी। घालमेल और चोर-चोर मौसेरे भाई की एक और बानगी देखिए, जब जल संसाधन विभाग ने पुलिस को कलेक्टर के खिलाफ एफआईआर का आवेदन दिया, तो उसने सरकारी विभागों का मामला बताकर पल्ला झाड़ लिया। वहीं, एनएचएआई पर ४८ करोड़ का जुर्माना ठोंका है, लेकिन जब तक एफआईआर नहीं होती, यह जुर्माना वसूला जाना मुमकिन नहीं है। यहां यह उल्लेख करना समीचीन होगा कि फोरलेन निर्माण कंपनी जिस तालाब में दो लाख क्यूबिक मीटर मटेरियल से ३०० मीटर लंबी, ६० मीटर चौड़ी सड़...
हेल्पफुल हो 'लाइनÓ मध्यप्रदेश में शुरू की गई महिला हेल्पलाइन १०९० निश्चित ही अच्छा प्रयास है। इसकी शुरुआत के पहले दिन राजधानी में १७ शिकायतें आईं। दरअसल, गैंगरेप के खिलाफ दिल्ली से उठी आवाजों के बीच मप्र में दुष्कर्म के मामलों की स्याह तस्वीर खुलकर सामने आ गई। इस दौरान इसकी परतें खोलती कई रिपोट्र्स सामने आईं। सभी की एक बात कॉमन है 'दुष्कर्म के मामलों में मध्यप्रदेश देशभर में नंबर वन पर हैÓ। इस पर भी नित नए मामले सामने आ रहे हैं। इससे शासन-प्रशासन निश्चित ही चिंता में आया। यहां यह उल्लेख करना समीचीन होगा कि राजधानी के मेट्रो थाना हबीबगंज में वर्ष २०१० में विश्व महिला दिवस पर जिला स्तरीय महिला हेल्पलाइन १०९१ शुरू की गई थी। इसके बावजूद अपराधों में कोई कमी नहीं आई। यहां वर्ष २०१२ में १०४९ शिकायतें दर्ज हुई, इनमें से महज ८ प्रकरण दर्ज किए जा सके। मनचले कई बार यहां तैनात महिला पुलिसकर्मियों से भी फोन पर अश्लील बातें करने लगते हैं और सेल उनकी तह तक नहीं जा पाती है। ऐसे में नई हेल्पलाइन से कितनी उम्मीदें की जाए? इससे दुष्कर्म और छेड़छाड़ के मामलों में कितनी कमी आएगी? दरअसल, ये जघन्य अ...
चलता रहे जुलूस का दौर गुंडाराज के खिलाफ पुलिस के अभियान ने आवाम को थोड़ी राहत दी है। पुलिस ने कुख्यात बदमाश मुख्तार मलिक समेत उसके नौ गुर्गोंं का राजधानी भोपाल में जुलूस निकाला। उधर, ग्वालियर में हुई लाखों की लूट का पर्दाफाश भी पुलिस ने महज तीन दिन में कर दिया। यानी पुलिस दिलेरी से काम ले रही है। यह काबिले तारीफ है, लेकिन संतुष्टिजनक सफलता तभी मिलेगी जब जुलूस का यह दौर अनवरत चले। इंदौर में गुंडाराज के खिलाफ ५०० जवान अलग से दिए गए हैं। यानी बिगड़ैल कानून व्यवस्था से शासन-प्रशासन चिंतित है। वहीं, सत्तारूढ़ दल के कार्यकर्ताओं और बदमाशों के संबंध उजागर होने के बाद पार्टी के पदाधिकारी चेतावनी दे रहे हैं। मसलन, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष प्रभात झा ने खंडवा में प्रदेश कार्यसमिति में कहा कि 'कार्यकर्ता प्रशासन के कार्यों में दखल न दें।Ó इससे पार्टी की छवि खराब होती है। वे अपनी बात विधायक और जनप्रतिनिधियों के माध्यम से प्रशासन तक पहुंचाएं। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने भी कार्यकताओं से दो टूक कहा कि वे ऐसा काम न करें, जिससे पार्टी की छवि खराब हो। वहीं, गुंडों को चेतावनी दी कि प्रदेश में एक भी गुंडा...