दलदल में सब सने
दौड़ते-दौड़ते कीचड़ से सना राइटिस्ट यकायक रुक गया। इसी से कुछ और ज्यादा अंदर धंसा कीचड़ से लथपथ लेफ्टिस्ट भी बदहवास सा उसके पास आ रुका। दम में दम आया तो राइटिस्ट ने पूछा, हम कहां हैं? सपाट जवाब मिला 'मचमचाते और विभिन्न तरह की संड़ांध मारते दलदल में धंसे हैं हम लोग। अब तो शरीर में दम है न इस दलदल की चिपचिपाहट हमें यहां से हिलने देगी। चारों ओर सन्नाट पसरा है।Ó तभी इस भयानक सन्नाटे को चीरते हुए एक आवाज आई, सुनो... एक आदमी के यहां छापा पड़ा है। उसके यहां हजारों करोड़ की संपत्ति निकली है। मुआ चंद सालों पहले तक तो चंद रुपयों का सरकारी मुलाजिम था। इसी बीच एक और आवाज आई- अरे उसके पिछलग्गु भी करोड़पति निकले। अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे। यह सब सुनकर भौचक्का राइटिस्ट बोला 'ये आवाजें कहां से आ रही हैं। कौन नामुराद ये परतें खोल रहा है।Ó जनता का दरबार लगा है। मालूम होता है भ्रष्टाचार से जोड़ी अकूत संपदा का पंचनामा करेगा। लेफ्टिस्ट ने सहज भाव से कहा। राइटिस्ट गुर्राया। लेफ्टिस्ट चुप हो गया। हजारों द्वंद्वों को ढककर छाई शांति को चीरती आवाजें फिर आने लगीं। अरे याद है? गए बरस तो एक अफसर दंपती के मखमली बिस्तर ने करोड़ों रुपए उगले थे। एक ख्यात नगरी का भ्रष्ट करोड़पति बाबू कई महलों का मालिक है। तो उनका किसने क्या बिगाड़ लिया। एक निलंबन ही तो दिया। सो उनकी बला से, ये संपत्ति ऐसे भी तनख्वाह की होगी। वरना जिस मुल्क में लोगों को तन से लपेटने को कपड़ा, एक वक्त के लिए भरपेट रोटी, सोने के लिए फटी चटाई, सिर छुपाने को सूखी जगह भी न हो उसके कुछ बिस्तर इतने मालामाल कैसे हो सकते हैं? जरा-जरा से बाबू करोड़पति निकल रहे हैं भाई। इसी बीच पिचके गाल वाला एक दडिय़ल आदमी बोला, अरे अब तो प्रेमचंद, शरतचंद, फणीश्वर या परसाई भी नहीं हैं जो गरीब, कुपोषितों पर कलम चलाकर आईना पेश करें या भ्रष्टाचार पर चोट करते व्यंग्य लिखें। जो हैं वे वो लिखते हैं जो बेंचा जा सके। अब लेफ्टिस्ट ने माहौल को भांप लिया और तपाक से बोला, यार ये दरबार तो सबकुछ जानता है। एक दूसरी और तेज आवाज आई, अरे नाउम्मीदी का आलम है। राजकाज में विरोधी भी होते हैं, लेकिन यहां सभी का मजहब एक ही है। इनके मजहब में शामिल होने की पहली शर्त ही यह है कि नवागत को भ्रष्टाचार के कुंड में तपाया जाए। भ्रष्टाचारियों में एकता की शुरुआत यहीं से होती है। उनके कुतर्क, सोच, क्रियाकलाप एक जैसे होते हैं। जुबान एक जैसी होती है। बयानों, आश्वासनों और दलालों में एकता होती है। हजारों मुंह से एक जैसी बातें निकलती हैं। कोई एक-दूसरे पर सवाल करे तो गिरमिट से बर्खास्त कर दिया जाता है। कितनी एकता है इनमें। तभी एक कांपती सी आवाज आई, हुजूर एकता तो हमारे यहां भी है। हमारी गरीबी, भूख, कुपोषण और मौत में। चारों की घनिष्टता ही तो परलोक ले जाती है। बड़ी आबादी इस बात से त्रस्त है। यह सब सुन रहे लेफ्टिस्ट और राइटिस्ट के छक्के छूट गए। जनता दरबार की आवाजों के बीच उन्हें होश ही नहीं रहा कि वे दलदल में गले-गले तक धंस चुके हैं। हाथ-पैर फडफ़ड़ाकर जैसे-तैसे इधर-उधर हुए। लेकिन, दोनों को ताज्जुब हुआ कि उनके शरीर से पसीने का सैलाब बह निकला। राइटिस्ट बोला, अरे चलो थोड़ा सा नीचे चलेंगे तो अपने चमचों के महल मिल जाएंगे। पर, पूरी उठापटक वहीं से तो शुरू हुई है। फिर एक-दूसरे की ओर सवालिया निगाहों से देखा। यकायक एक साथ बोले, ये तो हमारी कुंडली खोलकर बैठे हैं। अब क्या होगा? कुछ देर दोनों सोच में डूब गए फिर अजीब सी शांति छा गई। 'शामÓ भी होने को थी। इसी बीच एक कराहती हुई आवाज आई, देख लेंगे। अबकी बार कौन क्या बनता है। अरे हमें पसंद-नापसंद की छूट है। इस पर राइटिस्ट और लेफ्टिस्ट ने हाथ मिलाया। राइटिस्ट बोला, खूब से खूब यही हो सकता है कि हम विपरीत स्थिति में नजर आएं।
- अनिल चौधरी

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