हर सांस, हर घूंट में जहर

भोपाल का दर्द। वर्षों से जहरीला पानी पी रही बड़ी आबादी। जहरीले रसायनों के दुष्प्रभावों से उपजी भयंकर बीमारियों से जूझ रहे ६० हजार से अधिक लोग। इनकी १८ गैस पीडि़त बस्तियों के भूजल में कई हानिकारक रसायन हैं। इसकी पुष्टि १९८९ से लेकर २००६ तक १४ वैज्ञानिक जांचों में भी हो चुकी है। गैस पीडि़तों ने जब-जब साफ पानी मांगा उन्हें हिकारत की नजर से देखा गया। मार्के की बात तो यह भी है कि गैस पीडि़तों के लिए एक अलग विभाग, एक मंत्री, अलग अमला, बजट में विशेष प्रावधान और निगरानी समिति है। इसके बावजूद गैस पीडि़तों को साफ पानी के लिए सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ा। यह सिस्टम की खामी और नाकामी ही है। अब सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश से उन्हें उम्मीद बंधी है। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को इन बस्तियों में तीन माह के भीतर साफ पानी पहुंचाने का आदेश दिया है। इससे सरकार की चुनौती भी बढ़ी है। जो काम २८ सालों में नहीं किया जा सका, वह तीन माह में करना है। गैस पीडि़त बस्तियों का पानी हर साल बारिश में और अधिक जहरीला हो रहा है। जहरीले रसायनों के तत्व भूजल में मिल रहे हैं। वहीं, इन बस्तियों के भूजल की जांच इंडियन टोक्सोलॉजिकल रिसर्च सेंटर से करवाने को कहा गया है। केंद्रीय नियंत्रण प्रदूषण बोर्ड, मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वाली संस्था नीरी आदि के अध्ययन में पुष्टि होने के बाद भी स्थानीय स्तर पर साफ पानी मुहैया कराने के कारगर प्रयास नहीं किए गए। प्रशासन नर्मदा का पानी भोपाल तक लाने में सफल हो सकता है, तो १८ बस्तियों को साफ पानी देने में क्यों नहीं? जाहिर सी बात है, ईमानदार प्रयास ही नहीं किए गए। ५० करोड़ रुपए खर्च करने के बाद भी नतीजा सिफर रहा। गैस पीडि़त आज जलजनित कई ज्ञात-अज्ञात बीमारियों से जूझ रहे हैं। गैस त्रासदी के बाद उन्होंने कई त्रासदियां देखीं हैं। मुआवजे में गड़बडिय़ां, ड्रग ट्रायल, जहरीला पानी और उनकी साफ पानी की मांग की अनदेखी भी तो त्रासदी ही है। उनकी नई पीढिय़ां भी बीमार और  विकृत पैदा हो रही हैं। अब कोर्ट के आदेश के पालन में सरकार और नगर निगम को यहां साफ पानी की व्यवस्था करना है। ऐसे में एक और सवाल दिमाग में बार-बार कौंधता है। यह कि गोदाम से बाहर पड़े २० हजार मीट्रिक टन से अधिक जहरीले कचरे को ही खत्म करने के प्रयास क्यों नहीं किए जाते? क्या इसके लिए भी कोर्ट के आदेश का इंतजार है? कारखाने के बाहर तीन तालाबों में भी ८-१० मीट्रिक टन कचरा दबाया गया था। फिलहाल जिस ३५० मीट्रिक टन कचरे के निष्पादन की बात की जा रही है, उसमें कई अड़चनें भी हैं। यूनियन कार्बाइड कारखाना के कचरे में भारी धातुएं और क्लोरीनेटेड बाय फिनाइल जैसे रसायन हैं। जमीन की ऊपरी सतह पर मौजूद ये रसायन हवा में उड़कर दूसरे स्थानों पर पहुंच रहे हैं। इसका असर उन लोगों तक होने लगा है, जिनका सीधा संपर्क गैस रिसाव से नहीं हुआ था। सरकार को इसका भी निपटान कराना चाहिए, तभी उस स्याह रात की काली छाया का असर कम होगा।
- अनिल चौधरी, पत्रिका में प्रकाशित

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