जमीन की बंदरबांट
गैमन इंडिया को भोपाल में दी गई जमीन फ्री होल्ड कर सरकारी खजाने को करीब ५२५० करोड़ रुपए की चपत लगाने की तैयारी थी। वहीं, स्टाम्प ड्यूटी चोरी करने की भी बात सामने आई है। इस मामले में कंपनी और सरकार के बीच हुए करार पर गंभीर आरोप लगे हैं। मामला उजागर होने के बाद निजी कंपनियों को जमीन की बंदरबांट पर बहस गर्म है। यह केवल एक करार में गड़बड़झाले का मसला नहीं, वरन जमीन के तमाम करारों के पीछे निहितार्थ की पड़ताल का वक्त है। जिन लोगों के हित इन कंपनियों और घपलों से सधे हैं, उन्हें पकडऩे का वक्त है। दरअसल, सरकार ने कई मामलों में निजी पूंजी निवेश को उसकी शर्तों पर जमीनें सौंपी हैं। कंपनियों के हित साधकर गदगदायमान राज्य को यह भी गौर करना चाहिए कि इससे हजारों किसान और आदिवासी भूमिहीन हो चुके हैं। जमीनें बांटने और इसके सदुपयोग पर ध्यान नहीं देने की भी कई बानगी हैं। मसलन, सरकार ने मुंबई की सौरेश डेयरी प्रोडक्ट्स को मालवा के शाजापुर जिले में जेट्रोफा की खेती और बायो डीजल प्लांट के लिए एक लाख हेक्टेयर जमीन दी थी। तब जेट्रोफा की खेती करने वाली दुनियाभर की कंपनियां घाटे के कारण उत्पादन बंद कर चुकी थीं। इसके बावजूद सौरेश कंपनी को मालवा जैसे उपजाऊ इलाके में इतनी जमीन सौंपना कितनी बुद्धिमत्ता का काम है। इसका भी उत्पादन उल्लेखनीय नहीं रहा। यहां यह बताना समीचीन होगा कि मध्यप्रदेश उद्योग निवेश संवर्धन सहायता योजना २०१० में एक उद्योग की जमीन का अर्थ उसके निर्माण क्षेत्र से तीन गुना अधिक माना गया है। वहीं, कई कंपनियों ने तो अपने गोडाउन के नाम पर ही ३००-३०० एकड़ जमीनें हथिया रखी हैं। इसके बावजूद इनके लीज रेंट, उत्पादन, रोजगार के अवसर आदि मामलों में यह उदासीनता ईमानदार राजधर्म का द्योतक तो कतई नहीं कहा जा सकता। होना तो यह चाहिए कि लीज रेंट नहीं देने, रोजगार के अवसर नहीं बढ़ाने और उत्पादन नहीं करने वाली कंपनियों की जमीनें छीन ली जाएं। इन पर उद्योग लगाकर रोजगार के अवसर बढ़ाए जाएं। इतना ही नहीं यह जमीन हमारे युवाओं को लघु उद्योगों के लिए भी दी जा सकती है, जिससे वे उत्पादक और रोजगार मुहैया कराने वाले बन सकते हैं।
- अनिल चौधरी, पत्रिका में प्रकाशित
गैमन इंडिया को भोपाल में दी गई जमीन फ्री होल्ड कर सरकारी खजाने को करीब ५२५० करोड़ रुपए की चपत लगाने की तैयारी थी। वहीं, स्टाम्प ड्यूटी चोरी करने की भी बात सामने आई है। इस मामले में कंपनी और सरकार के बीच हुए करार पर गंभीर आरोप लगे हैं। मामला उजागर होने के बाद निजी कंपनियों को जमीन की बंदरबांट पर बहस गर्म है। यह केवल एक करार में गड़बड़झाले का मसला नहीं, वरन जमीन के तमाम करारों के पीछे निहितार्थ की पड़ताल का वक्त है। जिन लोगों के हित इन कंपनियों और घपलों से सधे हैं, उन्हें पकडऩे का वक्त है। दरअसल, सरकार ने कई मामलों में निजी पूंजी निवेश को उसकी शर्तों पर जमीनें सौंपी हैं। कंपनियों के हित साधकर गदगदायमान राज्य को यह भी गौर करना चाहिए कि इससे हजारों किसान और आदिवासी भूमिहीन हो चुके हैं। जमीनें बांटने और इसके सदुपयोग पर ध्यान नहीं देने की भी कई बानगी हैं। मसलन, सरकार ने मुंबई की सौरेश डेयरी प्रोडक्ट्स को मालवा के शाजापुर जिले में जेट्रोफा की खेती और बायो डीजल प्लांट के लिए एक लाख हेक्टेयर जमीन दी थी। तब जेट्रोफा की खेती करने वाली दुनियाभर की कंपनियां घाटे के कारण उत्पादन बंद कर चुकी थीं। इसके बावजूद सौरेश कंपनी को मालवा जैसे उपजाऊ इलाके में इतनी जमीन सौंपना कितनी बुद्धिमत्ता का काम है। इसका भी उत्पादन उल्लेखनीय नहीं रहा। यहां यह बताना समीचीन होगा कि मध्यप्रदेश उद्योग निवेश संवर्धन सहायता योजना २०१० में एक उद्योग की जमीन का अर्थ उसके निर्माण क्षेत्र से तीन गुना अधिक माना गया है। वहीं, कई कंपनियों ने तो अपने गोडाउन के नाम पर ही ३००-३०० एकड़ जमीनें हथिया रखी हैं। इसके बावजूद इनके लीज रेंट, उत्पादन, रोजगार के अवसर आदि मामलों में यह उदासीनता ईमानदार राजधर्म का द्योतक तो कतई नहीं कहा जा सकता। होना तो यह चाहिए कि लीज रेंट नहीं देने, रोजगार के अवसर नहीं बढ़ाने और उत्पादन नहीं करने वाली कंपनियों की जमीनें छीन ली जाएं। इन पर उद्योग लगाकर रोजगार के अवसर बढ़ाए जाएं। इतना ही नहीं यह जमीन हमारे युवाओं को लघु उद्योगों के लिए भी दी जा सकती है, जिससे वे उत्पादक और रोजगार मुहैया कराने वाले बन सकते हैं।
- अनिल चौधरी, पत्रिका में प्रकाशित
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