शिकार से फिर शर्मसार
कान्हा नेशनल पार्क की टीम रातापानी डिवीजन के मैदानी अमले को प्रशिक्षण दे रही है। भोपाल, सीहोर और रायसेन वन मंडल में तीन-तीन गश्ती दल बनाए गए हैं, जो बाघों की निगरानी करेंगे। यह कवायद राजधानी से महज २० किलोमीटर दूर तीन माह के भीतर दो बाघों की मौत से उपजी चिंता और शर्म का परिणाम है। लेकिन, सवाल यह उठता है कि शासन-प्रशासन ने पहले ऐसे पुख्ता इंतजाम क्यों नहीं किए जो बाघों को बचाने में कारगर साबित होते? काबिले गौर तो यह भी है कि राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) के तमाम प्रयास और हिदायतों के बावजूद मध्यप्रदेश बाघों को बचाने में विफल क्यों है? इतना ही नहीं राजधानी के पास जिस इलाके में बाघों का शिकार हो रहा है, वह राज्य वन्यप्राणी मुख्यालय से महज दस किलोमीटर दूर है। इस बात में कोई अतिश्योक्ति नहीं है कि टाइगर स्टेट का दर्जा छिन जाने से प्रदेश का एक आकर्षण कम हुआ है। प्रदेश में दस सालों में करीब ४६० बाघों की मौत हुई, इनमें से १८६ से अधिक के शिकार होने की भी पुष्टि हो चुकी है। एनटीसीए की ओर से गठित डॉ. पीके सेन की अध्यक्षता वाली जांच कमेटी की रिपोर्ट ने २००९ में यह साफ कर दिया था कि सूबे में कम हो रहे बाघों की मुख्य वजह शिकार है। पन्ना और शिवपुरी तो बाघों से पूरी तरह खाली हो गए। दरअसल, प्रदेश का वन अमला कुख्यात शिकारियों के मुकाबले निहत्था है। शिकारियों के पास अत्याधुनिक हथियार हैं। वन विभाग के कर्मचारी सिर्फ डंडा लिए घूम रहे हैं। बाघों के शिकार का एक बड़ा कारण यह भी है। यह बात भी शर्मसार करने वाली है कि जो प्रदेश टाइगर स्टेट के नाम से ख्यात था, टाइगर बचाने के इंतजाम नहीं कर पाया। दरअसल, बाघों के शिकार में खाल तस्कर की बड़ी भूमिका है। दिल्ली में बैठे कुख्यात खाल तस्कर संसार चंद और उसके गुर्गों की करतूतें भी इसका बड़ा कारण है। काबिले गौर तो यह भी है कि भारत विश्व के उन १३ देशों में से एक है, जहां बाघों के लिए तमाम अनुकूल प्राकृतिक संसाधन मौजूद हैं। इसमें भी देश का दिल मध्यप्रदेश टाइगर स्टेट था। यह गौरव शासन-प्रशासन की कमजोर इच्छाशक्ति के कारण ही छिना है। बाघ अब भी लगातार मारे जा रहे हैं।
- अनिल चौधरी, पत्रिका में प्रकाशित

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