ये कैसे  'भगवान
गांधी मेडिकल कॉलेज भोपाल के कमला नेहरू अस्पताल में इंजेक्शन के रिएक्शन से हुई दो बच्चों की मौत ने डॉक्टरों की लापरवाही को एक बार फिर उजागर कर दिया है। ये एंटीबायोटिक इंजेक्शन शिशु रोग इकाई में दो दर्जन बच्चों को लगाए गए थे, जो कुछ देर बाद गंभीर रूप से बीमार हो गए। परिजनों ने इसकी शिकायत की तो डॉक्टरों ने दुत्कार दिया। डॉक्टरों की झिड़की और दुत्कार उनकी परिजनों की चीत्कार में बदल गई। क्राइम ब्रांच की टीम ने इंदौर में इंजेक्शन बनाने वाली फैक्टरी पर छापा मारा, लेकिन नतीजा सिफर रहा। इस बैच की नार्मल सलाइन पर प्रदेशभर में रोक लगा दी गई है। यह पहला मामला नहीं है जब डॉक्टरों की लापरवाही मरीजों की जान पर भारी पड़ी हो, लेकिन कानून का लचीलापन और जांच में देरी के चलते वे बच निकलते हैं। ये घटनाएं पीडि़त परिजनों को जिंदगीभर का दर्द दे जाती हैं। यहां गौर करने वाली बात है कि समाज जिस डॉक्टर को सौम्य, शालीन, सहनशील और समझदार की छवि में देखता है, वे इतने गैरगंभीर और अमानवीय कैसे हो गए? संक्रमित या खराब दवाएं मरीजों को कैसे दे दी जाती हैं? यहां सीनियर डॉक्टरों ने अमानवीयता की हदें तो तब लांघीं जब मामला प्रकाश में आने के बावजूद बच्चों को देखने नहीं पहुंचे। बच्चे तड़पते रहे। इस पर जिम्मेदार अधिकारियों का कमजोर बयान 'जांच की जाएगीÓ। माना कि एक विरामहीन जांच के बाद दोषियों पर कार्रवाई की अनुशंसा होगी, लेकिन उन परिवारों के हिस्से की खुशियां कौन लौटाएगा, जिनके चिराग बुझ गए। कमला नेहरू अस्पताल का मामला बच्चों के सामूहिक रूप से बीमार होने के कारण उजागर हुआ। वरना इसे आसानी से दबाया जा सकता था। दरअसल, ज्यादातर मामलों में पेशेंट और उनके परिजन मेडिकल साइंस की जानकारी नहीं होने के कारण हकीकत नहीं जान पाते हैं। ऐसे में कठोर कानून और डॉक्टरों को मानवों के प्रति संवेदनशील होने की बेहद जरूरत है।
- अनिल चौधरी

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