लाइफ लाइन का संकट
राजधानी की जीवनरेखा पर भीषण संकट है। संकट है कैचमेंट एरिया से मिल रही गंदगी, प्रदूषण और अतिक्रमण से सिमटते दायरे का। संकट के ये तमाम पहलू दिखाई सभी को देते हैं, लेकिन जुबान बंद हैं। दुर्दशा की शिकार लाइफलाइन इस सिस्टम में सुधार और जीवन मांग रही है। आलाम यह है कि बड़ी झील के ३६१ वर्ग किमी कैचमेंट एरिया में बड़े पैमाने पर कब्जा है। खेती में पेस्टीसाइड का धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है। इस क्षेत्र में सीहोर और भोपाल जिले के करीब ८५ गांव हैं, जिनकी गंदगी भी बड़ी झील में समा रही है। कैचमेंट में कॉलोनियां बसाई गईं। प्लॉट काटे गए। लो-डेंसिटी के नाम पर लैंडयूज बदला और मनमाफिक भूउपयोग हुआ। यह खेल करीब २००० एकड़ जमीन में किया गया। इसमें भूमाफिया भी सक्रिय हैं, जो सरपंचों और चंद अफसरों की मिलीभगत से झील का गला घोंट रहे हैं। कैचमेंट एरिया का जो १० फीसदी हिस्सा भोपाल शहर में आता है उसका सीवेज भी बड़ी झील में मिल रहा है। इस गंदगी के चलते पानी में ऑक्सीजन कम हो गई है। बिसनखेड़ी, खानूगांव से लेकर बैरागढ़ तक अतिक्रमण है। सबसे बड़ा माध्यम कोलांस नदी भी अतिक्रमण की चपेट में है। इस पूरे गड़बड़झाले के बीच यह सवाल भी अचंभित कर रहा है कि झील से जुड़े राजस्व विभाग, नगर निगम, टीएंडसीपी, झील विकास प्राधिकरण आदि विभाग मौन क्यों हैं? यह मौन और विभागों गी आंखों पर बंधी पट्टी ने भी झील का संकट बढ़ाया है। मास्टर प्लान ड्रॉफ्ट-२०३१ में झील के कैचमेंट एरिया का जिक्र क्यों नहीं किया गया? जाहिर सी बात है, जहां इतने गड़बड़झाले होंगे उसका जिक्र करके कोई सिस्टम खुद क्यों परेशानी मोल लेगा। अब 'पत्रिकाÓ में लगातार प्रकाशित खबरों के बाद राज्य मानवाधिकार आयोग ने संज्ञान लिया है, जिससे उम्मीदें बंधी हैं। आयोग ने नगरीय प्रशासन, नगर एवं ग्राम निवेश, झील संरक्षण प्राधिकरण, नगर निगम और कलेक्टर से जवाब तलब किया है। यह भी कहा है कि कैचमेंट एरिया में प्लॉट काटना पाया गया तो आयोग हाईकोर्ट में रिट दायर करेगा। इसी के साथ मुख्य सचिव ने तमाम विभागों को अल्पकालिक एक्शन प्लान तैयार करने के निर्देश दिए हैं। इससे झील के संरक्षण की उम्मीदें बंधी हैं।
- अनिल चौधरी, पत्रिका में प्रकाशित

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