लाड़ली की आंखों में आंसू
आ धी शिक्षा, आधी सेहत और आधे पोषण के बीच संघर्ष कर रही लाड़लियों के हिस्से में सुरक्षा नाम मात्र की भी नहीं है। वे कहीं भी किसी भी वक्त दरिंदगी का शिकार हो सकती हैं। दिलों में खौफ, खरोचों भरी देह और आंखों में आंसू लिए ये बेटियां कहां जाएं, क्या करें? प्रदेश के ७० फीसदी सरकारी और निजी स्कूलों में छात्राओं की सुरक्षा के इंतजाम नहीं हैं। प्रदेशभर में तीन साल में करीब २५० मामले दर्ज हुए हैं। इनकी तह में जाएं तो हर साल बढ़ोतरी हुई है। ये वो मामले हैं जो पुलिस और अखबारों के माध्यम से उजागर हुए हैं। यानी ऐसे भी कई मामले हो सकते हैं, जिनका खुलासा लोकलाज या अन्य कारणों से नहीं हो सका। छात्राओं के साथ घटित हो रहे अपराध तो इसी ओर इशारा करते हैं। मानव मन को झिझोड़ देने वाले इन अपराधों के बावजूद न स्कूल शिक्षा विभाग, स्कूल प्रबंधन, स्थानीय प्रशासन सभी मौन साधे हुए हैं। इतना बड़ा अमला संवेदनहीन बना बैठा है। अब इन अपराधों पर बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने संज्ञान लिया है। आयोग ने प्रदेशभर के कलेक्टर्स को पत्र चिंता जताई है, लेकिन चिंता जताने से क्या ये अपराध रुक जाएंगे? चिंता तो विधानसभा में भी जताई जाती है। कई सार्वजनिक कार्यक्रमों में जनप्रतिनिधि चिंता जता चुके हैं। इनकी चिंता और पत्रों के नतीजे ज्यादातर मामलों में सिफर रहे हैं। नतीजतन हवसी, मनचलों और शरारती तत्वों के हौसले बुलंद हैं। छात्राएं इन अपराधों के साथ ही कई संघर्षों से जूझ रही हैं। मसलन, छेडख़ानी की बात घर में बताई तो पढ़ाई बंद हो सकती है। आसपास के लोग क्या कहेंगे? इनके लिए न हेल्पलाइन नंबर है न शिकायत पेटी। पुलिस, प्रशासन और स्कूल प्रबंधनों से बनी नाउम्मीदी का जवाब अच्छे संस्कार ही हो सकते हैं। इनके लिए स्कूलों में अलग से पाठ पढ़ाया जाए। वहीं, छात्राओं के लिए आत्मरक्षा संबंधी कोर्स और ट्रेनिंग दी जाए। उन्हें जूडो, कराते, बॉक्सिंग आदि में पारंगत किया जाए, जिससे उनका आत्मविश्वास बढ़े और वे अपराधियों का मुकाबला कर सकें। हेल्पलाइन नंबर और शिकायत पेटी लगाई जाए। इनकी सतत जांच और कार्रवाई होती रहे, तभी अपराधों पर अंकुश और अपराधियों पर नकेल कसी जा सकती है।
- अनिल चौधरी, पत्रिका में प्रकाशित
आ धी शिक्षा, आधी सेहत और आधे पोषण के बीच संघर्ष कर रही लाड़लियों के हिस्से में सुरक्षा नाम मात्र की भी नहीं है। वे कहीं भी किसी भी वक्त दरिंदगी का शिकार हो सकती हैं। दिलों में खौफ, खरोचों भरी देह और आंखों में आंसू लिए ये बेटियां कहां जाएं, क्या करें? प्रदेश के ७० फीसदी सरकारी और निजी स्कूलों में छात्राओं की सुरक्षा के इंतजाम नहीं हैं। प्रदेशभर में तीन साल में करीब २५० मामले दर्ज हुए हैं। इनकी तह में जाएं तो हर साल बढ़ोतरी हुई है। ये वो मामले हैं जो पुलिस और अखबारों के माध्यम से उजागर हुए हैं। यानी ऐसे भी कई मामले हो सकते हैं, जिनका खुलासा लोकलाज या अन्य कारणों से नहीं हो सका। छात्राओं के साथ घटित हो रहे अपराध तो इसी ओर इशारा करते हैं। मानव मन को झिझोड़ देने वाले इन अपराधों के बावजूद न स्कूल शिक्षा विभाग, स्कूल प्रबंधन, स्थानीय प्रशासन सभी मौन साधे हुए हैं। इतना बड़ा अमला संवेदनहीन बना बैठा है। अब इन अपराधों पर बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने संज्ञान लिया है। आयोग ने प्रदेशभर के कलेक्टर्स को पत्र चिंता जताई है, लेकिन चिंता जताने से क्या ये अपराध रुक जाएंगे? चिंता तो विधानसभा में भी जताई जाती है। कई सार्वजनिक कार्यक्रमों में जनप्रतिनिधि चिंता जता चुके हैं। इनकी चिंता और पत्रों के नतीजे ज्यादातर मामलों में सिफर रहे हैं। नतीजतन हवसी, मनचलों और शरारती तत्वों के हौसले बुलंद हैं। छात्राएं इन अपराधों के साथ ही कई संघर्षों से जूझ रही हैं। मसलन, छेडख़ानी की बात घर में बताई तो पढ़ाई बंद हो सकती है। आसपास के लोग क्या कहेंगे? इनके लिए न हेल्पलाइन नंबर है न शिकायत पेटी। पुलिस, प्रशासन और स्कूल प्रबंधनों से बनी नाउम्मीदी का जवाब अच्छे संस्कार ही हो सकते हैं। इनके लिए स्कूलों में अलग से पाठ पढ़ाया जाए। वहीं, छात्राओं के लिए आत्मरक्षा संबंधी कोर्स और ट्रेनिंग दी जाए। उन्हें जूडो, कराते, बॉक्सिंग आदि में पारंगत किया जाए, जिससे उनका आत्मविश्वास बढ़े और वे अपराधियों का मुकाबला कर सकें। हेल्पलाइन नंबर और शिकायत पेटी लगाई जाए। इनकी सतत जांच और कार्रवाई होती रहे, तभी अपराधों पर अंकुश और अपराधियों पर नकेल कसी जा सकती है।
- अनिल चौधरी, पत्रिका में प्रकाशित
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