रहम करो भगवान
बालाघाट के जिला अस्पताल के ओटी में जिस वक्त सुखवंती को ले जाया गया, यकीनन वह सोच रही होगी कि एक सीजर की बात है फिर गोद भर जाएगी। नवजात के साथ सुख का दौर शुरू होगा, लेकिन डॉक्टर की लापरवाही उसे जिंदगीभर का दर्द दे गई। ऑपरेशन के दौरान नवजात की मौत हो गई। उसके सिर और चेहरे पर कैची के निशान मिले। उसके आंख और मुंह से खून बह निकला। 'भगवानÓ की यह लापरवाही डॉक्टर्स डे की ही है। इसी दिन एक और मामला सामने आया जिसमें महाराष्ट्र अकोला के तीन डॉक्टर्स पर गैर इरादतन हत्या का मुकदमा दर्ज हुआ। यह नवजात की पीएम रिपोर्ट के आधार पर दर्ज हुआ। इलाज में लापरवाही के ऐसे कई मामले हमारे सामने आते हैं, लेकिन पोस्टमार्टम तक कम ही पहुंच पाते हैं। परिजन शव को दफना देते हैं, और इसी के साथ दफन हो जाते हैं लापरवाही के राज। दरअसल, हमारे कानून का लचीलापन और ओटी की कमियां भी इसके लिए जिम्मेदार हैं। पहला तो यह कि कानून को सबूत चाहिए। दूसरा यह कि ओटी में डॉक्टर्स, स्टाफ और बेसुध पेशेंट के अलावा कोई होता नहीं है। ऐसे में ओटी के अंदर का घटनाक्रम बाहर कैसे आए? यह बड़ा सवाल और खुली बहस का मुद्दा है, जिस पर जिम्मेदारों और नीति नियंताओं को चर्चा कर समाधान निकालने चाहिए। गिने-चुने मामलों को छोड़ दें तो ऐसे वक्त में ज्यादातर पेशेंट के साथ मेडिकल साइंस को कोई जानकार नहीं रहता है, जो इन बातों को पकड़ सके। हालांकि, कानूनी प्रावधान यह है कि डॉक्टर की लापरवाही साबित होने पर पीडि़तों को अदालत से मुआवजा दिया जाए, लेकिन ऐसे सबूत बाहर कैसे आएं। केंद्र सरकार ने चिकित्सा प्रणाली में सुधार के लिए क्लिनिकल एस्टिेब्लिशमेंट एक्ट-2010 और नेशनल कमीशन फॉर ह्यूमन रिसोर्स फॉर हेल्थ बिल-२०११ लोकसभा में पारित कराया, लेकिन ये डॉक्टर्स को रास नहीं आया। और जरूरत ऐसे ही सख्त कानून की है, जिससे चिकित्सा व्यवस्था में सुधार हों।
- अनिल चौधरी

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