ईमानदार मंशा गुंडाराज के खिलाफ शासन-प्रशासन के अभियान ने आवाम को थोड़ी राहत दी है। इंदौर में मौजूदा कानून व्यवस्था काबिले तारीफ है, जहां गुंडों पर नकेल कसने के लिए ५०० जवान अलग से दिए गए हैं। यहां गुंडा अभियान के तहत गणेशोत्सव समितियों के सदस्यों का पुलिस वेरिफिकेशन भी किया जाएगा। कानून व्यवस्था में यह सुधार तब आया जब इंदौर में गुंडाराज चरम पर था। यानी बिगड़ैल व्यवस्था से शासन-प्रशासन चिंतित है। वहीं, सत्तारूढ़ दल के कार्यकर्ताओं और बदमाशों के संबंध उजागर होने के बाद पार्टी के पदाधिकारी चेतावनी दे रहे हैं। मसलन, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष प्रभात झा ने खंडवा में प्रदेश कार्यसमिति में कहा कि 'कार्यकर्ता प्रशासन के कार्यों में दखल न दें।Ó इससे पार्टी की छवि खराब होती है। वे अपनी बात विधायक और जनप्रतिनिधियों के माध्यम से प्रशासन तक पहुंचाएं। वहीं, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने भी कार्यकताओं से दो टूक कहा कि वे ऐसा काम न करें, जिससे पार्टी की छवि खराब हो। वहीं, गुंडों को चेतावनी दी कि प्रदेश में एक भी गुंडा नहीं रहेगा। उन्होंने अफसरों से कहा 'जहां दिखें गुंडे, वहां चलाओ डंडे।Ó भाजपा अध्यक्ष...
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ये कैसे 'भगवान गांधी मेडिकल कॉलेज भोपाल के कमला नेहरू अस्पताल में इंजेक्शन के रिएक्शन से हुई दो बच्चों की मौत ने डॉक्टरों की लापरवाही को एक बार फिर उजागर कर दिया है। ये एंटीबायोटिक इंजेक्शन शिशु रोग इकाई में दो दर्जन बच्चों को लगाए गए थे, जो कुछ देर बाद गंभीर रूप से बीमार हो गए। परिजनों ने इसकी शिकायत की तो डॉक्टरों ने दुत्कार दिया। डॉक्टरों की झिड़की और दुत्कार उनकी परिजनों की चीत्कार में बदल गई। क्राइम ब्रांच की टीम ने इंदौर में इंजेक्शन बनाने वाली फैक्टरी पर छापा मारा, लेकिन नतीजा सिफर रहा। इस बैच की नार्मल सलाइन पर प्रदेशभर में रोक लगा दी गई है। यह पहला मामला नहीं है जब डॉक्टरों की लापरवाही मरीजों की जान पर भारी पड़ी हो, लेकिन कानून का लचीलापन और जांच में देरी के चलते वे बच निकलते हैं। ये घटनाएं पीडि़त परिजनों को जिंदगीभर का दर्द दे जाती हैं। यहां गौर करने वाली बात है कि समाज जिस डॉक्टर को सौम्य, शालीन, सहनशील और समझदार की छवि में देखता है, वे इतने गैरगंभीर और अमानवीय कैसे हो गए? संक्रमित या खराब दवाएं मरीजों को कैसे दे दी जाती हैं? यहां सीनियर डॉक्टरों ने अमा...
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रहम करो भगवान बालाघाट के जिला अस्पताल के ओटी में जिस वक्त सुखवंती को ले जाया गया, यकीनन वह सोच रही होगी कि एक सीजर की बात है फिर गोद भर जाएगी। नवजात के साथ सुख का दौर शुरू होगा, लेकिन डॉक्टर की लापरवाही उसे जिंदगीभर का दर्द दे गई। ऑपरेशन के दौरान नवजात की मौत हो गई। उसके सिर और चेहरे पर कैची के निशान मिले। उसके आंख और मुंह से खून बह निकला। 'भगवानÓ की यह लापरवाही डॉक्टर्स डे की ही है। इसी दिन एक और मामला सामने आया जिसमें महाराष्ट्र अकोला के तीन डॉक्टर्स पर गैर इरादतन हत्या का मुकदमा दर्ज हुआ। यह नवजात की पीएम रिपोर्ट के आधार पर दर्ज हुआ। इलाज में लापरवाही के ऐसे कई मामले हमारे सामने आते हैं, लेकिन पोस्टमार्टम तक कम ही पहुंच पाते हैं। परिजन शव को दफना देते हैं, और इसी के साथ दफन हो जाते हैं लापरवाही के राज। दरअसल, हमारे कानून का लचीलापन और ओटी की कमियां भी इसके लिए जिम्मेदार हैं। पहला तो यह कि कानून को सबूत चाहिए। दूसरा यह कि ओटी में डॉक्टर्स, स्टाफ और बेसुध पेशेंट के अलावा कोई होता नहीं है। ऐसे में ओटी के अंदर का घटनाक्रम बाहर कैसे आए? यह बड़ा सवाल और खुली बहस का मुद्दा है, जिस पर ...
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दलदल में सब सने दौड़ते-दौड़ते कीचड़ से सना राइटिस्ट यकायक रुक गया। इसी से कुछ और ज्यादा अंदर धंसा कीचड़ से लथपथ लेफ्टिस्ट भी बदहवास सा उसके पास आ रुका। दम में दम आया तो राइटिस्ट ने पूछा, हम कहां हैं? सपाट जवाब मिला 'मचमचाते और विभिन्न तरह की संड़ांध मारते दलदल में धंसे हैं हम लोग। अब तो शरीर में दम है न इस दलदल की चिपचिपाहट हमें यहां से हिलने देगी। चारों ओर सन्नाट पसरा है।Ó तभी इस भयानक सन्नाटे को चीरते हुए एक आवाज आई, सुनो... एक आदमी के यहां छापा पड़ा है। उसके यहां हजारों करोड़ की संपत्ति निकली है। मुआ चंद सालों पहले तक तो चंद रुपयों का सरकारी मुलाजिम था। इसी बीच एक और आवाज आई- अरे उसके पिछलग्गु भी करोड़पति निकले। अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे। यह सब सुनकर भौचक्का राइटिस्ट बोला 'ये आवाजें कहां से आ रही हैं। कौन नामुराद ये परतें खोल रहा है।Ó जनता का दरबार लगा है। मालूम होता है भ्रष्टाचार से जोड़ी अकूत संपदा का पंचनामा करेगा। लेफ्टिस्ट ने सहज भाव से कहा। राइटिस्ट गुर्राया। लेफ्टिस्ट चुप हो गया। हजारों द्वंद्वों को ढककर छाई शांति को चीरती आवाजें फिर आने लगीं। अरे याद है? गए बरस तो एक...
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हर सांस, हर घूंट में जहर भोपाल का दर्द। वर्षों से जहरीला पानी पी रही बड़ी आबादी। जहरीले रसायनों के दुष्प्रभावों से उपजी भयंकर बीमारियों से जूझ रहे ६० हजार से अधिक लोग। इनकी १८ गैस पीडि़त बस्तियों के भूजल में कई हानिकारक रसायन हैं। इसकी पुष्टि १९८९ से लेकर २००६ तक १४ वैज्ञानिक जांचों में भी हो चुकी है। गैस पीडि़तों ने जब-जब साफ पानी मांगा उन्हें हिकारत की नजर से देखा गया। मार्के की बात तो यह भी है कि गैस पीडि़तों के लिए एक अलग विभाग, एक मंत्री, अलग अमला, बजट में विशेष प्रावधान और निगरानी समिति है। इसके बावजूद गैस पीडि़तों को साफ पानी के लिए सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ा। यह सिस्टम की खामी और नाकामी ही है। अब सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश से उन्हें उम्मीद बंधी है। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को इन बस्तियों में तीन माह के भीतर साफ पानी पहुंचाने का आदेश दिया है। इससे सरकार की चुनौती भी बढ़ी है। जो काम २८ सालों में नहीं किया जा सका, वह तीन माह में करना है। गैस पीडि़त बस्तियों का पानी हर साल बारिश में और अधिक जहरीला हो रहा है। जहरीले रसायनों के तत्व भूजल में मिल रहे हैं। वहीं, इन बस्तियों के भूजल की ...
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जमीन की बंदरबांट गैमन इंडिया को भोपाल में दी गई जमीन फ्री होल्ड कर सरकारी खजाने को करीब ५२५० करोड़ रुपए की चपत लगाने की तैयारी थी। वहीं, स्टाम्प ड्यूटी चोरी करने की भी बात सामने आई है। इस मामले में कंपनी और सरकार के बीच हुए करार पर गंभीर आरोप लगे हैं। मामला उजागर होने के बाद निजी कंपनियों को जमीन की बंदरबांट पर बहस गर्म है। यह केवल एक करार में गड़बड़झाले का मसला नहीं, वरन जमीन के तमाम करारों के पीछे निहितार्थ की पड़ताल का वक्त है। जिन लोगों के हित इन कंपनियों और घपलों से सधे हैं, उन्हें पकडऩे का वक्त है। दरअसल, सरकार ने कई मामलों में निजी पूंजी निवेश को उसकी शर्तों पर जमीनें सौंपी हैं। कंपनियों के हित साधकर गदगदायमान राज्य को यह भी गौर करना चाहिए कि इससे हजारों किसान और आदिवासी भूमिहीन हो चुके हैं। जमीनें बांटने और इसके सदुपयोग पर ध्यान नहीं देने की भी कई बानगी हैं। मसलन, सरकार ने मुंबई की सौरेश डेयरी प्रोडक्ट्स को मालवा के शाजापुर जिले में जेट्रोफा की खेती और बायो डीजल प्लांट के लिए एक लाख हेक्टेयर जमीन दी थी। तब जेट्रोफा की खेती करने वाली दुनियाभर की कंपनियां घाटे के कारण उत्पादन बं...
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शिकार से फिर शर्मसार कान्हा नेशनल पार्क की टीम रातापानी डिवीजन के मैदानी अमले को प्रशिक्षण दे रही है। भोपाल, सीहोर और रायसेन वन मंडल में तीन-तीन गश्ती दल बनाए गए हैं, जो बाघों की निगरानी करेंगे। यह कवायद राजधानी से महज २० किलोमीटर दूर तीन माह के भीतर दो बाघों की मौत से उपजी चिंता और शर्म का परिणाम है। लेकिन, सवाल यह उठता है कि शासन-प्रशासन ने पहले ऐसे पुख्ता इंतजाम क्यों नहीं किए जो बाघों को बचाने में कारगर साबित होते? काबिले गौर तो यह भी है कि राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) के तमाम प्रयास और हिदायतों के बावजूद मध्यप्रदेश बाघों को बचाने में विफल क्यों है? इतना ही नहीं राजधानी के पास जिस इलाके में बाघों का शिकार हो रहा है, वह राज्य वन्यप्राणी मुख्यालय से महज दस किलोमीटर दूर है। इस बात में कोई अतिश्योक्ति नहीं है कि टाइगर स्टेट का दर्जा छिन जाने से प्रदेश का एक आकर्षण कम हुआ है। प्रदेश में दस सालों में करीब ४६० बाघों की मौत हुई, इनमें से १८६ से अधिक के शिकार होने की भी पुष्टि हो चुकी है। एनटीसीए की ओर से गठित डॉ. पीके सेन की अध्यक्षता वाली जांच कमेटी की रिपोर्ट ने २००९ में यह...
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लाइफ लाइन का संकट राजधानी की जीवनरेखा पर भीषण संकट है। संकट है कैचमेंट एरिया से मिल रही गंदगी, प्रदूषण और अतिक्रमण से सिमटते दायरे का। संकट के ये तमाम पहलू दिखाई सभी को देते हैं, लेकिन जुबान बंद हैं। दुर्दशा की शिकार लाइफलाइन इस सिस्टम में सुधार और जीवन मांग रही है। आलाम यह है कि बड़ी झील के ३६१ वर्ग किमी कैचमेंट एरिया में बड़े पैमाने पर कब्जा है। खेती में पेस्टीसाइड का धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है। इस क्षेत्र में सीहोर और भोपाल जिले के करीब ८५ गांव हैं, जिनकी गंदगी भी बड़ी झील में समा रही है। कैचमेंट में कॉलोनियां बसाई गईं। प्लॉट काटे गए। लो-डेंसिटी के नाम पर लैंडयूज बदला और मनमाफिक भूउपयोग हुआ। यह खेल करीब २००० एकड़ जमीन में किया गया। इसमें भूमाफिया भी सक्रिय हैं, जो सरपंचों और चंद अफसरों की मिलीभगत से झील का गला घोंट रहे हैं। कैचमेंट एरिया का जो १० फीसदी हिस्सा भोपाल शहर में आता है उसका सीवेज भी बड़ी झील में मिल रहा है। इस गंदगी के चलते पानी में ऑक्सीजन कम हो गई है। बिसनखेड़ी, खानूगांव से लेकर बैरागढ़ तक अतिक्रमण है। सबसे बड़ा माध्यम कोलांस नदी भी अतिक्रमण की चपेट में है। इस पूरे ...
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लाड़ली की आंखों में आंसू आ धी शिक्षा, आधी सेहत और आधे पोषण के बीच संघर्ष कर रही लाड़लियों के हिस्से में सुरक्षा नाम मात्र की भी नहीं है। वे कहीं भी किसी भी वक्त दरिंदगी का शिकार हो सकती हैं। दिलों में खौफ, खरोचों भरी देह और आंखों में आंसू लिए ये बेटियां कहां जाएं, क्या करें? प्रदेश के ७० फीसदी सरकारी और निजी स्कूलों में छात्राओं की सुरक्षा के इंतजाम नहीं हैं। प्रदेशभर में तीन साल में करीब २५० मामले दर्ज हुए हैं। इनकी तह में जाएं तो हर साल बढ़ोतरी हुई है। ये वो मामले हैं जो पुलिस और अखबारों के माध्यम से उजागर हुए हैं। यानी ऐसे भी कई मामले हो सकते हैं, जिनका खुलासा लोकलाज या अन्य कारणों से नहीं हो सका। छात्राओं के साथ घटित हो रहे अपराध तो इसी ओर इशारा करते हैं। मानव मन को झिझोड़ देने वाले इन अपराधों के बावजूद न स्कूल शिक्षा विभाग, स्कूल प्रबंधन, स्थानीय प्रशासन सभी मौन साधे हुए हैं। इतना बड़ा अमला संवेदनहीन बना बैठा है। अब इन अपराधों पर बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने संज्ञान लिया है। आयोग ने प्रदेशभर के कलेक्टर्स को पत्र चिंता जताई है, लेकिन चिंता जताने से क्या ये अपराध रुक जाएंगे? चिं...
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नारी तुम चंडी बनो इंदौर के बेटमा में दो युवतियों के साथ गैंगरेप के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने प्रदेश सरकार और इंदौर पुलिस से जवाब तलब किया है। गैंगरेप में १४ युवक शामिल थे। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड शाखा की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक देश में २०११ में बलात्कार के सबसे ज्यादा १२६२ मामले मध्यप्रदेश में दर्ज हुए हैं। इसमें इंदौर सबसे ऊपर और दूसरे नंबर पर भोपाल है। इधर, विधानसभा में मानसून सत्र के पहले दिन गृहमंत्री ने बताया कि जनवरी से २० जून तक ज्यादती के १५४२ मामले दर्ज हुए। यानी लगभग गुणोत्तर वृद्धि हुई है। महिलाएं कहां सुरक्षित हैं? यह सवाल सभी के लिए है। रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली में बलात्कार के मामलों में २५.४ फीसदी बढ़ोतरी हुई है। यहां हाल ही में एक युवती से पांच लोगों ने गैंगरेप किया। सफदरजंग के अस्पताल में गर्भवती से बलात्कार की कोशिश की गई। गुवाहाटी की घटना ने भी सभी को झकझोर दिया। जाहिर सी बात है, महिलाएं कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं। इन मामलों में स्थानीय स्तर पर देखें तो पुलिस व प्रशासन और राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय महिला आयोग के रवैये से लोगों में नाउम्मीदी बनी है। कई लोग पीडि़ताओं...
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जमीन जीमने की जुगत बैतूल के कोसमी जलाशय की ३.१४६ हेक्टेयर जमीन फोरलेन निर्माण कंपनी ओरिएंटल को देने के मामले में कई सवाल मुंह बाए खड़े हैं। इन सवालों की फेहरिस्त विधानसभा में पूछे गए एक प्रश्न के बाद और लंबी हो गई है, जिसने इस बात की पोल खोल दी कि जमीन की बंदरबांट में कुछ सरकारी मुलाजिम भी पीछे नहीं हैं। जिले के मुखिया बी. चंद्रशेखर की इस कारस्तानी में भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) की मिलीभगत की बू भी आ रही है। वरना, क्या बात है, जो एक आईएएस अफसर शासन को अंधेरे में रखकर अपने दायरे से बाहर काम कर दे? एनएचएआई ने जमीन फोरलेन निर्माण कंपनी ओरिएंटल को दे दी। घालमेल और चोर-चोर मौसेरे भाई की एक और बानगी देखिए, जब जल संसाधन विभाग ने पुलिस को एनएचएआई के खिलाफ एफआईआर का आवेदन दिया, तो पुलिस ने सरकारी विभागों का मामला बताकर पल्ला झाड़ लिया। वहीं, ४८ करोड़ रुपए का जुर्माना ठोंका है, लेकिन जब तक एफआईआर नहीं होती, यह जुर्माना वसूला जाना मुमकिन नहीं है। यहां यह उल्लेख करना समीचीन होगा कि फोरलेन निर्माण कंपनी ओरिएंटल जिस तालाब में दो लाख क्यूबिक मीटर मटेरियल से ३०० मीटर लंबी, ६० मीटर ...