Posts

Showing posts from 2010

कचरे में जिंदगी की तलाश

रुपए से दवाएं खरीद सकते हैं, सेहत नहीं। यह बात लगभग सभी जानते हैं। इसके बावजूद देश-प्रदेश में लाखों लोग रोजी-रोटी के जुगाड़ में ऐसे काम कर रहे हैं, जिनका हासिल शरीर को बीमारियों का घर बनाना है। शहरों में असंगठित क्षेत्रों में काम कर रहे लोग और कचरा बीनने वालों की यही दास्तान है। इतना ही नहीं, इनमें से करीब 80 फीसदी लोग एक वक्त का भोजन ही खा पाते हैं। ये प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से शहरों की सफाई कर रहे हैं, लेकिन इनकी सेहत के लिए कोई सरकारी प्रावधान नहीं है। भारत की 2006 की पर्यावरण नीति में इनकी सराहना जरूर की गई है। भारत में ठोस कचरा प्रबंधन को लेकर प्रावधान हैं, लेकिन इन पर अमल नहीं होता है। कचरा उठाने का काम नगरीय निकाय करते हैं। इसके बावजूद बड़ी मात्रा में बचने वाला कचरा गरीब बस्तियों के लोग उठाते हैं। एक अध्ययन के मुताबिक ठोस कचरे का संग्रहण घरों, दुकानों, उद्योगों आदि में होता है। लोग इसे कचरा बीनने वालों को व्यवस्थित ढंग से दे सकते हैं। भारत ठोस कचरे से उपजे संकट का सामना कर रहा है। इस राष्ट्रीय संकट से निपटने के लिए व्यापक तैयारी ओर जागरुकता की जरूरत है। हमारे यहां कचर...

पानी पकाती माँ बेचारी

मैंने देखी भूख बहुत है, मैंने देखी बहुत लाचारी बच्चों को सुलाने के खातिर, पानी पकाती माँ बेचारी बच्चे जो सो गए हैं उनको, घेर रही है बीमारी आंतें गल रहीं, आंखें धंस रही, फिर भी खुश माँ प्यारी गोदामों में अन्न साद रहा, है वो पूरा सरकारी सरकार ओछे बयान दे रही, देख रही दुनिया सारी

विकास की कितनी कीमत चुकाएंगे हम

झान्सीघाट का गिरन आदिवासी अब जिंदा नहीं हो सकता। गिरन की दोनों बेटियों को किसी भी कीमत पर (हालांकि वे कोई भी कीमत चुकाने की स्थिति में नहीं हैं।) भी पिता नहीं मिल सकते। और उसकी विधवा अब कभी सुहागिन नहीं बन सकती। ये तीनों नरसिंहपुर जिले के गाडरवाड़ा ब्लाक में झांसीघाट में नर्मदा किनारे बनने वाले थर्मल पॉवर प्लांट का दंश झेलने को अभिशप्त हैं। इतना ही नहीं आसपास के कई गांवों के हरिजन आदिवासी और किसान इस मुसीबत का सामना कर रहे हैं। ये अपनी जमीन बचाने चाहते हैं, तो पॉवर प्लांट निर्माता कंपनी के अफसर और सरकारी मुलाजिम इनकी जमीन अधिग्रहित कर इन्हें भूमिहीन करने पर आमादा हैं। इसके लिए कई हथकंडे अपना रहे हैं। गिरन आदिवासी की मौत इस सदमे में हो गई कि पॉवर प्लांट के लिए उसकी जमीन किसी भी तरह और किसी भी कीमत पर ले ली जाएगी। उस दिन मैसर्स टुडे एनर्जी के अफसरों ने गिरन से उसके घर के सामने ही कहा कि उसकी जमीन पॉवर प्लांट की जद में है। थोड़ी सी जमीन में दो बेटियों की जिम्मेदारी और दो जून की रोटी की जुगाड़ करने वाले गिरन को भूमिहीन हो जाने की खबर ही असहनीय हो चली और अफसरों के सामने ही चंद मिनटों में ही...

तकनीकी अभिशाप और पुरुषवादी विज्ञापन

विज्ञापन किसी भी संदेश को विशाल जनसमुदाय तक पहुंचाने का नफीस तरीका है। यह आपकी बात चित्रों और शब्दों के साथ लोगों तक पहुंचाता है, लेकिन यह चिंताजनक तब हो जाता है जब सही समझ के साथ नहीं किया गया हो। इन दिनों परिवार नियोजन के लिए दिए जा रहे विज्ञापनों में पुरुषवादी मानसिकता साफ झलकती है। इसमें पचास से अधिक लड़कियों को पानी ढोते कतारबध्द दिखाया गया है। 'संदेश है एक अरब चौदह करोड़ में यह हाल है तो आगे क्या होगा?' इसमें परिवार नियोजन की अपील भी की गई है। लड़कियों की इस कतार से लगता है कि हमारे यहां इनकी संख्या ज्यादा है। कुछ वर्ष पूर्व एक विज्ञापन और आया था 'बेटी नहीं बचाओगे तो बहू कहां से लाओगे।' इससे लगता है कि हम सिर्फ बहू लाने ओर वंश बढ़ाने के लिए बेटियां बचाने चाहते हैं। होना तो यह चाहिए कि हम बढ़ती आबादी रोकने के साथ ही घटते लिंगानुपात पर भी लोगों का जागरूक करें, ताकि दोहरा और प्रथमदृष्टया सही संदेश जा सके। तेजी से घटता लिंगानुपात राष्ट्रीय चुनौती बन चुकी है। गुजरात-राजस्थान की सीमा के दांग जिले में एक लड़की से आठ भाइयों की शादी कर दी गई। राजस्थान के...

केंद्र के फैसले पर प्रदेश की हवाई आंकड़ेबाजी

महेश्वर बांध के निर्माण कार्य पर केंद्र के रोक लगाने से मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान नाराज हैं। वे इसे केंद्र का गरीब और विकास विरोधी निर्णय बता रहे हैं। इससे रोक हटाने की मांग करते हुए उन्होंने खर्च के तमाम आंकड़े गिना दिए। लेकिन उन लोगों की संख्या और उनकी खेती के रकबे की बात नहीं कीए जो इस बांध के पानी की जद में आने वाले हैं। जिन्हें बेकवाटर सर्वे किए बिना ही अधिग्रहण अधिनियम की धारा.चार के तहत नोटिस थमाए जा रहे हैं। यानी उन्हें चेतावनी दी जा रही है कि जमीन और गांव से बेदखल कर दिए जाएंगे। यदि मुख्यमंत्री को खर्च के आंकड़े याद हैंए तो इस जन पशुधन और जमीन के आंकड़ों की जानकारी भी होगी तो फिर उनकी बात क्यों नहीं करते। महेश्वर परियोजना सरकार की बहुप्रतीक्षित है। सिंह की मानें तो नवंबर से 7ण्2 लाख यूनिट प्रतिदिन बिजली उत्पादन और इंदौर व देवास को 36 करोड़ लीटर पानी मुहैया कराना था। यह लक्ष्य पिछड़ जाएगा। बिजली घर पर 2500 और इंदौर व देवास को पानी देने के लिए 517 करोड़ रुपए खर्च किए जा चुके हैं। यानी सरकार को तमाम आंकड़ों की जानकारी है। तो फिर यह भी मालूम होगा कि महेश्वर बांध की जद म...

यह कानून पुष्ट होगा न सरकार

मध्यप्रदेश में तीन दिनों में 17 फीसदी कुपोषण कम हो गया। है न हैरत में डालने वाली बात। जब मलेरिया से होने वाली मौतों का आंकड़ा बढ़ता हैए तब स्वास्थ्य मंत्री इस पर नियंत्रण की हिदायत सीएमएचओ को देते हैं। और दूसरे ही दिन की रिपोर्ट में मलेरिया से होने वाली मौत का एक भी मामला नहीं रहता है। यह बात और है कि तेज बुखार से मरने वालों की संख्या यकायक बढ़ जाती है। प्रदेश की राजधानी में सवा तीन हजार बच्चे कुपोषित हैं। ये सभी चमत्कार हमारे यहीं हो सकते हैं। इस बीच पेट भरने का दावा करने वाले भोजन का अधिकार कानून के आने की घोषणा केंद्र सरकार के प्रतिनिधि न्यूयार्क में सोशलिस्ट इंटरनेशनल बैठक में करते हैं। यानी हम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अन्नदाता होने की बात कहकर खुद की पीठ थपथपाने से नहीं चूकते हैं। बहरहाल देशए प्रदेश के गरीबों की बदहाल तस्वीर और कानून से उम्मीदों की बात हो जाए। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के तीसरे चरण के रिपोर्ट के मुताबिक मध्यप्रदेश में 60 फीसदी बच्चे कुपोषित हैं। इतना ही नहींए इनमें से लगभग 13 लाख बच्चे गंभीर रूप से कुपोषित हैंए जिनकी जीवनलीला का पर्दा किसी भी वक्त गिर सकता...

तुम राग पुराना लिखना।

बादल, बिजली, चांद ओ तारे, तुम हर जगह दिखना, अमलताश के पत्तों पर फिर तुम गीत पुराना लिखना। जितना भी हो प्रेम हो निश्छल रगों में दौड़े वो फिर हर पल एक ही हों हम न हो दल-दल अदाओं पर दिल जाए मचल रात, चांदनी, खुशबू, चंदन, कुंदन, तुम हर जगह दिखना, गुलमोहर की पंखुडिय़ों पर फिर गीत सुहाना लिखना। आकर फिर तुम मुझे दे दो बल शाम सुहानी कर उड़ाके आँचल आज की हो चिंता न याद रहे कल कर दे मुझको तू ऐसा पागल कल -कल करती मचलती नदी सी उन्मुक्त तुम दिखना, उछलती लहरों से रेत पर फिर तुम राग दिवाना लिखना। दिनभर भागूं तुझको ढूंढू जैसे कोई हिरणी पागल शाम सुहानी कर दे अब तू फिर कहता हूं मत करना छल सितार, संतूर, घुंघरू, मांदल, तुम सभी के स्वर में बसना, फूल पलाश की पंखुडिय़ों पर फिर तुम राग पुराना लिखना।

tamanna

वो आज भी बैठी होगी निशब्द रेत के ढेर की मानिंद मै आज भी आज भी उछलता हुआ समंदर हूँ गहरे उतर जाऊंगा .......

पापा तुम भी आ जाओ न. .. .

पापा आज तो फादर्स डे है। लाखों बेटियां अपने माता-पिता की गोद में इठला रही होंगी। उनकी तमाम मांगे कम से कम आज तो पूरी की जा रही होंगी। और मैं... मैं क्या बताऊं? जब मैं ट्रेन में अकेली थी, तब से मेरा नाम और पहचान खो गई। अब मुझे मेरे नाम से कोई नहीं पुकारता। पापा, भला हो उस सफाई वाली आंटी को जिसने मुझे पुलिस अंकल तक पहुंचाया। मुझे याद है, अमरकंटक एक्सप्रेस की बोगी नंबर एस-3 का बर्थ नंबर 67, जहां मैं यह सोच रही थी कि कोई अपना आएगा और मुझे ले जाएगा। लेकिन । . .कहानी कुछ और ही बन बैठी? उस वक्त मैं काफी डरी सहमी भी थी। पापा यह सच है न दरिन्दों और हबसियों की आंखों में उम्र, मासूमियत और अपरिपक्वता नापने का कोई पैमाना नहीं होता है। हां पापा मैंने अपनी अब तक की उम्र में ऐसा कई बार सुना है। फिर यह बताओ न कि रेलवे स्टेशन पर किस तरह के लोग नहीं होते हैं। बस उस दिन मेरी लज्जा तो बच गई, लेकिन मैं जिस प्रक्रिया से चैरिटी होम तक पहुंची उसमें भी भटकाव था। अरे पापा! मुझे भोपाल की मातृछाया, एसओएस बालग्राम और कुछ और गैस सरकारी संस्थाओं ने लेने से इनकार कर दिया। मैं विक्षिप्त और विकलांग हूं न इसलिए। अच्छा ...

शहरी गरीबी की आंकड़ेबाजी और आवास

शहरों की आधी से अधिक आबादी बिना किसी आवास सुविधा के निवास कर रही है। ये लोग भवन निर्माण से लेकर घरों और होटलों में झाड़ू पोछे तक का काम करते हैं। विभिन्न क्षेत्रों में इनकी मेहनत अहम स्थान है। इसके बावजूद प्रदेश सरकार की आवास नीति में इनके लिए स्पष्ट प्रावधान नहीं है। नतीजतन भोपाल, इंदौर और जबलपुर जैसे बड़े शहरों की 56 फीसदी आबादी बिना किसी आवास सुरक्षा के बसर कर रही है। हालांकि सरकारिया आंकड़े हकीकत से कोसों दूर और भ्रमित करने वाले हैं। वहीं सरकार ने इनके आवास संबंधी जो प्रावधान किए हैं, उनमें स्वयं को बड़ी चतुराई से अलग कर लिया है। अब तक की आवास नीतियों में इनके लिए स्थान कम होता गया और शहरी गरीब बढ़ते गए।गरीबों के कार्यों का अवलोकन किया जाए तो यह साफ हो जाएगा कि ये एक दिन काम बंद रखें, तो शहर की रफ्तार थम जाए। बाकी 40 फीसदी आबादी के सुबह से शाम तक के कई कार्य समय पर नहीं हो सकेंगे, तो कुई पूरी तरह ठप हो जाएंगे। इसके बावजूद उनके पास सुरक्षित आवास नहीं है। शहरों के विकास की जरूरत इन्हें गांवों से खींचकर लाती है। एक समय के बाद शहर की अधिक मुनाफा और विकास की चाह इन्हें बेघर कर देती है।...

कहना तो होगा...

चुप रहने से छिन जाते हैं राजा से सब सुखन ज़ुल्म सहने से भी जुल्मी की मदद होती है...