विकास की कितनी कीमत चुकाएंगे हम

झान्सीघाट का गिरन आदिवासी अब जिंदा नहीं हो सकता। गिरन की दोनों बेटियों को किसी भी कीमत पर (हालांकि वे कोई भी कीमत चुकाने की स्थिति में नहीं हैं।) भी पिता नहीं मिल सकते। और उसकी विधवा अब कभी सुहागिन नहीं बन सकती। ये तीनों नरसिंहपुर जिले के गाडरवाड़ा ब्लाक में झांसीघाट में नर्मदा किनारे बनने वाले थर्मल पॉवर प्लांट का दंश झेलने को अभिशप्त हैं। इतना ही नहीं आसपास के कई गांवों के हरिजन आदिवासी और किसान इस मुसीबत का सामना कर रहे हैं। ये अपनी जमीन बचाने चाहते हैं, तो पॉवर प्लांट निर्माता कंपनी के अफसर और सरकारी मुलाजिम इनकी जमीन अधिग्रहित कर इन्हें भूमिहीन करने पर आमादा हैं। इसके लिए कई हथकंडे अपना रहे हैं।

गिरन आदिवासी की मौत इस सदमे में हो गई कि पॉवर प्लांट के लिए उसकी जमीन किसी भी तरह और किसी भी कीमत पर ले ली जाएगी। उस दिन मैसर्स टुडे एनर्जी के अफसरों ने गिरन से उसके घर के सामने ही कहा कि उसकी जमीन पॉवर प्लांट की जद में है। थोड़ी सी जमीन में दो बेटियों की जिम्मेदारी और दो जून की रोटी की जुगाड़ करने वाले गिरन को भूमिहीन हो जाने की खबर ही असहनीय हो चली और अफसरों के सामने ही चंद मिनटों में ही उसने सदमे से दम तोड़ दिया। कंपनी के अफसरों ने मामला बिगड़ता देख परिजनों को मुआवजे का लालच दिया और लाश को घर में रखवाया। जबकि, दूसरे दिन इन अफसरों ने गिरन की मौत हृदयघात से होना करार दिया। गिरन का पोस्टमार्टम भी महज 15 मिनटों में कर दिया गया। उसके माटी संस्कार के लिए भी एक कौड़ी तक कंपनी या सरकार से नहीं दी गई। यह तो एक आदिवासी की मौत है। यहां जमीन की खरीद-फरोख्त का काम जिस ढंग से चल रहा है, उससे ऐसे कई गिरन की मौत होने की आशंका है।
हरिजन आदिवासी और किसानों की जमीन अधिग्रहित करने का गोरखधंधा जमकर चल रहा है। गांव कोटवारों पर दबाव बनाया जा रहा है कि वे भूस्वामियों को राजी करें। इस वक्त दलालों की बड़ी जमात कई पीढिय़ों के लिए धन जुगाडऩे में जुटी है, जो आदिवासियों को दारू पिलाकर या बहलाफुसलाकर जमीन बेचने के लिए तैयार कर रहे हैं। इसके बाद कंपनी को दोगुनी कीमत पर रजिस्ट्री करा रहे हैं। इस प्लांट के लिए 1100 एकड़ जमीन की जरूरत है, जिसमें से 700 एकड़ जमीन सरकारी है। इसमें से करीब 450 एकड़ जमीन पर हरिजन आदिवासियों का पट्टा है। इसके अधिग्रहण में वनाधिकार कानून 2005 आड़े आ रहा है, इसलिए कंपनी और सरकारी मुलाजिम कई हथकंडे अपना रहे हैं। कुछ मामले ऐसे भी सामने आए हैं, जिनमें मृतकों के नाम रजिस्ट्री करा दी गई।

सवाल तो यह भी दिमाग में बार-बार कौंधता है कि जिन हरिजन आदिवासियों के वनाधिकार दावों का निपटारा अभी तक नहीं हुआ, उनकी जमीन पर यह पॉवर प्लांट बनाने की अनुमति पर्यावरण मंत्रालय ने कैसे दे दी। अब इनकी जमीन की रजिस्ट्री रातोरात कराई जा रही है। कुछ माह पूर्व दलालों ने करीब 74 आदिवासियों को तीन बसों में भरकर जिला मुख्यालय नरसिंहपुर लाकर रैली निकाली। इस दौरान इन्हें दारू पिलाइ गई। जब रैली कलेक्ट्रेट पहुंची, तब जबरन ही इनकी स्वीकृति मानकर कलेक्टर ने जमीन बेचने की अनुमति दे दी। जबकि, आदिवासी पंचायतों की जमीन बेचने के लिए पंचायत की आमसभा का फैसला जरूरी होता है। यहां उसे भी नजरअंदाज कर दिया गया। क्योंकि, पंचायत तो इससे इनकार कर चुकी है और कंपनी के अफसरों और सरकारी मुलाजिमों ने दूसरी सील बनवाकर फर्जी प्रस्ताव इस बात का तैयार कर लिया। हरिजन आदिवासियों को बंद कमरे में बैठाकर रजिस्ट्री कराई गई। इस कारनामे को रातोरात अंजाम दिया गया। वहीं बसों में भी रजिस्ट्री की गई। कंपनी के अफसरों ने यहां भी खेल कर दिखाया। जिस जमीन पर फसल लहलहा रही थी, जिसे देखकर कास्तकार का मन आलोडऩा भर रहा था, उसे बंजर दर्शाया गया। यहां किसी भी तरह के पेड़-पौधे नहीं होने की जिक्र भी किया गया और इस पर आदिवासियों से अंगूठा और दस्तखत कराए गए। इस तरह फसल के मुआवजे और पेड़ों की कटाई का सवाल हमेशा के लिए खत्म हो गया। जो भी हो यहां के 74 आदिवासी एक झटके में भूमिहीन हो गए। जब इस दारू से उबरने पर इनको होश आएगा कि वे भूमिहीन हो गए हैं, तब इस बात की आशंका है कि कई लोग गिरन के पास चले जाएं।

पर्यावरण मंत्रालय पर एक और सवाल उठता है कि हमारे सामने सारणी स्थित सतपुड़ा बिजली घर के दुष्परिणाम आ चुके हैं। यहां से निकलने वाली राख से तवा नदी का पानी मीलों दूर तक प्रदूषित हो चुका है। उसकी गहराई प्रभावित हुई है। आज मवेशी भी इसका पानी नहीं पी रहे हैं। इसमें नहाने से त्वचा संबंधी रोग हो रहे हैं। और अब यहां से निकलने वाली राख के निस्तारण के लिए हजारों पेड़ों को काटा जा रहा है। इतनी बड़ी पर्यावरणीय कीमत चुकाने के बावजूद झांसीघाट में नर्मदा किनारे थर्मल कोल पॉवर प्लांट की अनुमति क्यों दे दी। यहां सतपुड़ा के जंगलों और लाखों लोगों की श्रद्धा से जुड़ी नर्मदा का क्या होगा। इसमें अमेरिका से वह कोयला आयात किया जाएगा, जो वहां ग्लोबल वार्मिंग के चलते प्रतिबंधित कर दिया गया है। कंपनी का कहना है कि झांसीघाट में 1200 मेगावॉट क्षमता वाले प्लांट के लिए 12 सौ टन कोयला प्रतिघंटे लगेगा। इससे प्रतिघंटे तीन सौ टन राख निकलेगी। जबकि, वैज्ञानिक तथ्य यह है कि कोयले में 40 प्रतिशत राख होती है। इस हिसाब से यहां करीब 500 टन राख प्रतिघंटा निकलेगी। इसका निस्तारण सतपुड़ा के जंगल और नर्मदा घाटी में किया जाएगा। नर्मदा का जल प्रदूषित होना तय है। इतना ही नहीं पर्यावरणविदों के मुताबिक जबलपुर के भेड़ाघाट के संगमरमर की सुंदरता पर भी खतरा है। इस प्लांट की जद में आने वाले गांव सलारी के किसान पुहुपसिंह ने बताया कि उनकी 35 एकड़ जमीन पर संकट मंडरा रहा है। कंपनी किसी भी कीमत पर इसे लेने को तैयार है। वहीं इतनी ही जमीन किसी दूसरे स्थान पर खरीदकर देने का भी वादा कर रही है। दरअसल, पुहुपसिंह इस प्लांट के विरोध में लामबंद किसानों के साथ हैं। इसलिए, उन्हें चुप बैठने के लिए भी अलग से कीमत दिए जाने का प्रस्ताव आ चुका है। पुहुपसिंह ने बताया कि कंपनी के एक इंजीनियर ने उन्हें यह कहकर जमीन छोडऩे की सलाह दी की प्लांट लगने के 5-7 साल बाद इस पर राख की मोटी परत जमा हो जाएगी। फिर यहां कोई फसल नहीं होगी। मीलों दूर तक जंगल नष्ट हो जाएगा। इसके साथ ही कई दुष्परिणाम पुहुप को बताए गए।

इतने दुष्परिणामों के बावजूद हमारी सरकारें पॉवर प्लांट लगाने की अनुमति देकर गदगदायमान हैं। जबकि, प्रदेश सरकार को तो इसके उत्पादन का मात्र 35 फीसदी बिजली मिलेगी। इसमें लाइन लॉस भी शामिल है। इसके बावजूद इतने बड़े पैमाने पर जल, जन, जानवर, जंगल और जमीन दाव पर लगाना कितनी बुद्धिमत्तापूर्ण कहा जा सकता है। या इसके पीछे कोई और प्रलोभन है। जो भी हो सरकार का स्वर्णिम मध्यप्रदेश और नदियों की सफाई का अभियान तो थोथा साबित होगा। क्योंकि, नर्मदा का वजूद संकट में है और जंगलों से खदेड़े जाने वाले लोग शहरों की ओर भागेंगे, जिससे शहरी गरीबों की संख्या में बढ़ोतरी तय है। फिर 2012 तक प्रदेश झुग्गीमुक्त नहीं हो सकेगा। सरकारों को गैर परम्परागत ऊर्जा स्रोतों की ओर भी ध्यान देने चाहिए।
अंश बाबा, स्वतंत्र पत्रकार हैं

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