पापा तुम भी आ जाओ न. .. .

पापा आज तो फादर्स डे है। लाखों बेटियां अपने माता-पिता की गोद में इठला रही होंगी। उनकी तमाम मांगे कम से कम आज तो पूरी की जा रही होंगी। और मैं... मैं क्या बताऊं? जब मैं ट्रेन में अकेली थी, तब से मेरा नाम और पहचान खो गई। अब मुझे मेरे नाम से कोई नहीं पुकारता। पापा, भला हो उस सफाई वाली आंटी को जिसने मुझे पुलिस अंकल तक पहुंचाया। मुझे याद है, अमरकंटक एक्सप्रेस की बोगी नंबर एस-3 का बर्थ नंबर 67, जहां मैं यह सोच रही थी कि कोई अपना आएगा और मुझे ले जाएगा। लेकिन । . .कहानी कुछ और ही बन बैठी?


उस वक्त मैं काफी डरी सहमी भी थी। पापा यह सच है न दरिन्दों और हबसियों की आंखों में उम्र, मासूमियत और अपरिपक्वता नापने का कोई पैमाना नहीं होता है। हां पापा मैंने अपनी अब तक की उम्र में ऐसा कई बार सुना है। फिर यह बताओ न कि रेलवे स्टेशन पर किस तरह के लोग नहीं होते हैं। बस उस दिन मेरी लज्जा तो बच गई, लेकिन मैं जिस प्रक्रिया से चैरिटी होम तक पहुंची उसमें भी भटकाव था। अरे पापा! मुझे भोपाल की मातृछाया, एसओएस बालग्राम और कुछ और गैस सरकारी संस्थाओं ने लेने से इनकार कर दिया। मैं विक्षिप्त और विकलांग हूं न इसलिए। अच्छा पापा सच बताओ, मुझे इसीलिए टे्रन में छोड़ा था न?


पापा मैं भोपाल में मदर टेरेसा चैरिटी होम में हूं। मां से कहना बहुत कमजोर हो गई हूं। जब से अलग हुई, तब से कुछ खा नहीं रही हूं न। कभी-कभार दूध पी लेती हूं। लेकिन इससे सेहत नहीं बनती। सेहत के लिए तो आप लोगों का प्यार, स्पर्श भी जरूरी है न। पापा मुझे यहां आने तक कई जगह लज्जा आई। अरे हां, बच्चों के लिए काम करने का दंभ भरने वाली चाइल्ड लाइन ने भी मुझे नकार दिया। सभी ने बचकाना तर्क देकर किनारा किया है। फिर भी एक अखबार के जरिये मेरी आवाज बाल अधिकार संरक्षण आयोग तक पहुंची। पता है पापा आयोग ने संज्ञान लिया और मुझे देखने फादर्स डे के ठीक एक दिन पहले चैरिटी होम पहुंचा। मुझे बहुत खुशी हुई।


पापा किसी को लज्जा आए न आए मैं तो लजा गई। अरे मुझे रविवार को भी बाल कल्याण समिति के सामने पेश किया जा सकता था, लेकिन चाइल्ड लाइन ने ऐसी सलाह जीआरपी वाले अंकल को नहीं दी। भला हो पुलिस अंकल का उन्होंने अस्पताल में जांच तो कराई। फिर एक बार बाल कल्याण समिति के अध्यक्ष ने भी यही कहा कि कल रविवार था, समिति तो सोमवार और गुरुवार को बैठती है। कैसे पेश करते? अरे पापा उन्हें समझाना पड़ा कि यह समिति तो 24 घंटे कार्य करने के लिए बाध्य है। तब उन अंकल ने स्वीकार किया।


पापा चाइल्ड लाइन ने कहा कि हम तीन साल से कम के बच्चों को नहीं लेते हैं। जबकि ऐसी कोई गाइड लाइन ही नहीं है। फिर मुझे क्यों छोड़ा। कारण शायद आपके छोडऩे का भी यही था कि मैं विक्षिप्त और . . . हूं। और यह भी कहा कि मातृछाया और एसओएस बालग्राम चाइल्ड लाइन से बच्चे नहीं लेते हैं। पापा यह तो सरासर झूठ था। वो तो कहीं से भी आए बच्चे लेते हैं। मैं तो इस झूठ पर लज्जा के मारे भी कुछ नहीं बोल सकी। पापा अब न वो आयोग ने संज्ञान लिया, मुझ तक चलकर आया। पापा तुम भी आ जाओ न. .. .

Comments

  1. लगता है इस गलाकाट प्रतियोगिता के युग में भी आपकी संवेदनाएं जिन्दा हैं! साधुवाद!
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    जिन्दा लोगों की तलाश! मर्जी आपकी, आग्रह हमारा!!

    काले अंग्रेजों के विरुद्ध जारी संघर्ष को आगे बढाने के लिये, यह टिप्पणी प्रदर्शित होती रहे, आपका इतना सहयोग मिल सके तो भी कम नहीं होगा।
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    उक्त शीर्षक पढकर अटपटा जरूर लग रहा होगा, लेकिन सच में इस देश को कुछ जिन्दा लोगों की तलाश है। सागर की तलाश में हम सिर्फ सिर्फ बूंद मात्र हैं, लेकिन सागर बूंद को नकार नहीं सकता। बूंद के बिना सागर को कोई फर्क नहीं पडता हो, लेकिन बूंद का सागर के बिना कोई अस्तित्व नहीं है।

    आग्रह है कि बूंद से सागर में मिलन की दुरूह राह में आप सहित प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति का सहयोग जरूरी है। यदि यह टिप्पणी प्रदर्शित होगी तो निश्चय ही विचार की यात्रा में आप भी सारथी बन जायेंगे।

    हम ऐसे कुछ जिन्दा लोगों की तलाश में हैं, जिनके दिल में भगत सिंह जैसा जज्बा तो हो, लेकिन इस जज्बे की आग से अपने आपको जलने से बचाने की समझ भी हो, क्योंकि जोश में भगत सिंह ने यही नासमझी की थी। जिसका दुःख आने वाली पीढियों को सदैव सताता रहेगा। गौरे अंग्रेजों के खिलाफ भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस, असफाकउल्लाह खाँ, चन्द्र शेखर आजाद जैसे असंख्य आजादी के दीवानों की भांति अलख जगाने वाले समर्पित और जिन्दादिल लोगों की आज के काले अंग्रेजों के आतंक के खिलाफ बुद्धिमतापूर्ण तरीके से लडने हेतु तलाश है।

    इस देश में कानून का संरक्षण प्राप्त गुण्डों का राज कायम हो चुका है। सरकार द्वारा देश का विकास एवं उत्थान करने व जवाबदेह प्रशासनिक ढांचा खडा करने के लिये, हमसे हजारों तरीकों से टेक्स वूसला जाता है, लेकिन राजनेताओं के साथ-साथ अफसरशाही ने इस देश को खोखला और लोकतन्त्र को पंगु बना दिया गया है।

    अफसर, जिन्हें संविधान में लोक सेवक (जनता के नौकर) कहा गया है, हकीकत में जनता के स्वामी बन बैठे हैं। सरकारी धन को डकारना और जनता पर अत्याचार करना इन्होंने कानूनी अधिकार समझ लिया है। कुछ स्वार्थी लोग इनका साथ देकर देश की अस्सी प्रतिशत जनता का कदम-कदम पर शोषण एवं तिरस्कार कर रहे हैं।

    अतः हमें समझना होगा कि आज देश में भूख, चोरी, डकैती, मिलावट, जासूसी, नक्सलवाद, कालाबाजारी, मंहगाई आदि जो कुछ भी गैर-कानूनी ताण्डव हो रहा है, उसका सबसे बडा कारण है, भ्रष्ट एवं बेलगाम अफसरशाही द्वारा सत्ता का मनमाना दुरुपयोग करके भी कानून के शिकंजे बच निकलना।

    शहीद-ए-आजम भगत सिंह के आदर्शों को सामने रखकर 1993 में स्थापित-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)-के 17 राज्यों में सेवारत 4300 से अधिक रजिस्टर्ड आजीवन सदस्यों की ओर से दूसरा सवाल-

    सरकारी कुर्सी पर बैठकर, भेदभाव, मनमानी, भ्रष्टाचार, अत्याचार, शोषण और गैर-कानूनी काम करने वाले लोक सेवकों को भारतीय दण्ड विधानों के तहत कठोर सजा नहीं मिलने के कारण आम व्यक्ति की प्रगति में रुकावट एवं देश की एकता, शान्ति, सम्प्रभुता और धर्म-निरपेक्षता को लगातार खतरा पैदा हो रहा है! हम हमारे इन नौकरों (लोक सेवकों) को यों हीं कब तक सहते रहेंगे?

    जो भी व्यक्ति स्वेच्छा से इस जनान्दोलन से जुडना चाहें, उसका स्वागत है और निःशुल्क सदस्यता फार्म प्राप्ति हेतु लिखें :-
    डॉ. पुरुषोत्तम मीणा, राष्ट्रीय अध्यक्ष
    भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)
    राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यालय
    7, तँवर कॉलोनी, खातीपुरा रोड, जयपुर-302006 (राजस्थान)
    फोन : 0141-2222225 (सायं : 7 से 8) मो. 098285-02666
    E-mail : dr.purushottammeena@yahoo.in

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  2. आपका ब्लॉग देखा......... बहुत अच्छा लगा.... मेरी कामना है की आपके शब्दों को नित नए अर्थ मिलें और आप सृजन की नयी नयी ऊंचाइयां छुए. कभी समय निकाल कर मेरे ब्लॉग पर आयें.....

    http://www.hindi-nikash.blogspot.com

    सादर-
    आनंदकृष्ण, जबलपुर......

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  3. हिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाई
    कृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें और अपनी बहुमूल्य टिप्पणियां देनें का कष्ट करें

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