शहरी गरीबी की आंकड़ेबाजी और आवास
शहरों की आधी से अधिक आबादी बिना किसी आवास सुविधा के निवास कर रही है। ये लोग भवन निर्माण से लेकर घरों और होटलों में झाड़ू पोछे तक का काम करते हैं। विभिन्न क्षेत्रों में इनकी मेहनत अहम स्थान है। इसके बावजूद प्रदेश सरकार की आवास नीति में इनके लिए स्पष्ट प्रावधान नहीं है। नतीजतन भोपाल, इंदौर और जबलपुर जैसे बड़े शहरों की 56 फीसदी आबादी बिना किसी आवास सुरक्षा के बसर कर रही है। हालांकि सरकारिया आंकड़े हकीकत से कोसों दूर और भ्रमित करने वाले हैं। वहीं सरकार ने इनके आवास संबंधी जो प्रावधान किए हैं, उनमें स्वयं को बड़ी चतुराई से अलग कर लिया है। अब तक की आवास नीतियों में इनके लिए स्थान कम होता गया और शहरी गरीब बढ़ते गए।गरीबों के कार्यों का अवलोकन किया जाए तो यह साफ हो जाएगा कि ये एक दिन काम बंद रखें, तो शहर की रफ्तार थम जाए। बाकी 40 फीसदी आबादी के सुबह से शाम तक के कई कार्य समय पर नहीं हो सकेंगे, तो कुई पूरी तरह ठप हो जाएंगे। इसके बावजूद उनके पास सुरक्षित आवास नहीं है। शहरों के विकास की जरूरत इन्हें गांवों से खींचकर लाती है। एक समय के बाद शहर की अधिक मुनाफा और विकास की चाह इन्हें बेघर कर देती है। वहीं सरकार और नगरीय निकाय अपनी जिम्मेदारी से बचते हैं। मसलन आवास मौजूदा आवास नीति के मुताबिक नगर निगम सीमा में कॉलोनी विकसित करने की अनुमति तभी दी जा सकती है, जब कॉलोनाइजर 15 प्रतिशत भूखण्ड गरीब तबके को दे। वहीं कॉलोनाइजर के पक्ष में यह प्रावधान भी किया गया है कि वह चाहे तो इन भूखण्डों के बजाय 100 रुपए वर्गमीटर के हिसाब से आश्रय निधि में रकम जमा कर सकता है। वहीं प्रशासन इस पूरे मामले में निगरानीकर्ता की भूमिका निभाएगा। यदि इस तरह भूखण्ड दे दिए जाते तो 25-30 फीसदी गरीबों के पास आवास की व्यवस्था होती।सरकार ने शहरी गरीबों को हर स्तर पर दगा दिया है। सरकार के आंकड़ों के मुताबिक भोपाल में 1।26 लाख लोग गंदी बस्तियों में रहते हैं। इनके पास कोई आवास सुरक्षा नहीं है। 435 झुग्गी बस्तियों में रहते हैं। वहीं ऑक्सफेम के 2006 में किए गए एक अध्ययन की रिपोर्ट इनका खंडन करती है। इसके मुताबिक भोपाल में 543 झुग्गी बस्तियां हैं, जिनमें 10.62 लाख लोग रहते हैं। यह भोपाल की कुल आबादी का 60 फीसदी है। अब यह संख्या और बढ़ गई होगी। क्योंकि, शहरी गरीबों की जनसंख्या वृद्धि दर शहरी आबादी से करीब दो फीसदी अधिक है। दूसरी ओर सरकार के ही आंकड़े यह भी कहते हैं कि 50 हजार से ज्यादा जनसंख्या वाले 43 शहरों में 24.30 लाख लोग गंदी बस्तियों में रहते हैं। यानी इनके पास आवास सुरक्षा नहीं है। आवास नीति 2007 के मुताबिक शहरी गरीबों के लिए सात लाख आवासों की कमी है। वहीं जमीन हकीकत इससे कोसों दूर है। दरअसल सरकार के आंकड़े शहरी गरीबों की सही आबादी ही नहीं बता रहे हैं, तो आवास की कमी भी कम ही बताएंगे। सच तो यह है कि भोपाल, जबलपुर और इंदौर में ही 24.47 लाख लोग झुग्गियों में रहते हैं, जो इनकी कुल आबादी का 56 प्रतिशत है। एक अनुमान के मुताबिक इतनी बड़ी आबादी का जनसंख्या घनत्व बाकी आबादी से करीब तीन-चार गुना है।इस पूरी आंकड़ेबाजी के पीछे सरकार की मंशा शहरों को झुग्गीमुक्त करने की है। यह मंशा फलीभूत करने के लिए राजीव आवास योजना ऐसी पहली गृह योजना है, जो झुग्गीवासियों को संपत्ति का अधिकार देती है। इसके आधार पर 2017 तक देश को झुग्गीमुक्त करने का लक्ष्य है। वहीं जेएनएनयूआरएम के तहत भी शहरी गरीबों को मकान बनाकर दिए जा रहे हैं। मजे की बात है, जिन लोगों ने बकरी और गाय आदि पाल रखे हैं, उन्हें फ्लैट में रखा जाएगा। फिर उनके पशुओं का क्या होगा? यह साफ नहीं है। पानी उन्हें भूतल से ढोना होगा। फिर ऐसा क्या है, जो इन्हें पक्के मकान देने की जरूरत पड़ी। दरअसल पीपीपी के तहत बनाए जाने वाले इन बहुमंजिला मकानों के बनने से झुग्गियों की बाकी खाली जमीन का सौदा बिल्डरों से करने में सरकार को आसानी होगी। वहीं गरीबों को आवास देने के नाम पर उनके मूल आवास और छीन लिए जाएंगे। उनकी तमाम जरूरतें एक कमरे में पूरी करनी होगी। खैर! सवाल तो यह भी दिमाग में बार-बार कौंधता है कि जिन झुग्गीवासियों के लिए पक्के मकान बनाए जा रहे हैं, उनमें उनका श्रम क्यों नहीं लगाया जा रहा। यदि इतनी ही कल्याणकारी योजना है, तो इन्हें मजदूरी देकर एक और कल्याणक कार्य किया जा सकता था। सरकार को गृह निर्माण के लिए झुग्गी बस्तियों को शामिल करना था। इससे उन्हें रोजगार भी मिलता और कम लागत के मकान खड़े हो जाते। बहरहाल कॉलोनियों में 15 प्रतिशत भूखण्ड गरीबों को देने की चतुराईपूर्ण व्यवस्था पर गौर किया जाए।आवास नीति 1995 में व्यवस्था तो यह भी थी कि कोई कॉलोनाइजर यदि 15 प्रतिशत भूखण्ड नहीं दे, तो इसके एक चौथाई भाग पर गरीबों का आवासीय भवन बनाकर दे दे। यह प्रावधान जब कॉलोनाइजरों को नागवार गुजरा तो बात मुकदमों तक पहुंच गई। अंतत: यह तय हुआ कि 15 प्रतिशत भूमि का प्रावधान रखा जाए। वहीं यदि कोई कॉलोनाइजर चाहे तो इसके बादले 100 रुपए वर्गमीटर के हिसाब से आश्रय निधि में रकम जमा करा सकता है। यह लचीलापन भूमाफिया को लाभ पहुंचाने के लिए किया गया। कुछ अपवादों को छोड़कर यह जमीन सरकार ने गरीबों को अब तक नहीं दी है।
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