आत्मनिर्भर बनने की अपील कर रहे बिन पैंदी के लोटे Bye election, MP bye election news, BJP NEWS, Congress NEWS, Madhyapradesh NEWS, Hindi NEWS
आत्मनिर्भर बनने की अपील करने वाले कितने आत्मनिर्भर
अअपपीदो साल पहले हुए विधानसभा चुनाव (Bye election) में जो नेता और कार्यकर्ता जिस किसी का पोस्टर लगाकर जिंदाबाद के नारे लगा रहे थे, अब वे उनके पोस्टर फाडक़र मुर्दाबाद के नारे लगा रहे हैं। और, पिछले चुनाव में जिनके पोस्टर फाडक़र मुर्दाबाद के पाने लगा रहे थे, अब उनके पोस्टर (Poster) लगाकर जिंदाबाद के नारे लगा रहे हैं। इतना बड़ा बदलाव सिर्फ नेता में ही हो सकता है। गले का पट्टा बदलते ही नेताजी का जमीन बदल गया। वोटर भयंकर असमंजस की स्थिति में हैं।
मध्यप्रदेश के विधानसभा उपचुनाव (Madhya pradesh assembly bye election) कई मायनों में रोचक हैं, लेकिन सबसे ज्यादा रोचक दल-बदलुओं के मैदान में होने से है। वे फिर जनता के बीच जा रहे हैं। खुद पर भरोसा कराने के लिए मतदाताओं (Voter in MP) के सामने नतमस्तक हैं। हालांकि, यह मतदाता पर निर्भर करता है कि वह पिछली बार किए गए भरोसे पर कितना कायम रहती है, जब उसने प्रदेश में तख्ता पलट के लिए इनको चुना था, लेकिन ये महज 15 महीने में ही बिक गए। ये खुद आत्मनिर्भर नहीं हो सके। शायद इस बात से किसी को गुरेज नहीं होगा कि सौदेबाजी 8-10 महीने बाद ही शुरू हो गई होगी। चूंकि, जमीर बेचने का मामला था तो सौदा पक्का होने में पांच-छह महीने तो लगे ही होंगे। बहरहाल, इससे भी बड़ी मार्के की बात यह है कि जो सत्तारूढ़ दल (सरकार भी) (BJP) जनता से आत्मनिर्भर बनने की अपील कर रहा है, वह खुद आत्मनिर्भर नहीं है। वह बिके हुए नेताओं के दम पर उपचुनाव लड़ रहा है। वे जनता को आज भी लायक-नालायक और नंगे-भूखे के मुद्दे पर भटका रहे हैं। जनता के काम और हित की बात या कहें कि उनके मुद्दे गायब हैं। चुनावी सभाओं में एक-दूसरे दलों के कपड़े उतारे जा रहे हैं। स्मरण रहे, उपचुनाव की वोटिंग तीन नवंबर को होगी। 10 नवंबर को नतीजे आएंगे।
सत्ता बचाने और वापस पाने की इस लड़ाई में भाजपा के 28 में से 25 उम्मीदवार वे हैं, जो कांग्रेस का हाथ छोडक़र आए हैं। ऐसे में यह सवाल लाजिमी है कि क्या भाजपा आत्मनिर्भर है? मजे की बात है, भाजपा के कई उम्मीदवार चुनावी सभा में खुले मंच से कह रहे हैं कि वे बिके हैं। हालांकि, इसके पीछे उनका तर्क होता है कि जनता कि काम और क्षेत्र के विकास के लिए बिके हैं। कांग्रेस सरकार (Congress) में उनकी सुनवाई और काम नहीं होते थे। इस तरह नेताजी स्वयं स्वीकार रहे हैं कि वे बिके हैं। इनमें से कुछ नेता तो अपने जमीर की मिली कीमत में से कुछ रुपए चुनावी सभाओं में बांटते हुए वीडियो में कैद भी हो चुके हैं। हालांकि, इस बात की गारंटी वे अब भी नहीं दे पा रहे कि अब नहीं बिकेंगे। फैसला जनता को करना है। जनता को यह भी देखना होगा कि प्रदेश राजनीति की मंडी नहीं बन जाए, जहां हर दिन नेताओं के रेट तय होते रहें। वैसे एक बात साफ है, एक बार जो दाम मिल चुके हैं, इससे ज्यादा अब शायद न मिलें। यही वजह है कि महज दो साल पहले हुए विधानसभा चुनाव में जो नेता और कार्यकर्ता जिस किसी का पोस्टर लगाकर जिंदाबाद के नारे लगा रहे थे, अब वे उनके पोस्टर फाडक़र मुर्दाबाद के नारे लगा रहे हैं। और, पिछले चुनाव में जिनके पोस्टर फाडक़र मुर्दाबाद के पाने लगा रहे थे, अब उनके पोस्टर लगाकर जिंदाबाद के नारे लगा रहे हैं। इतना बड़ा बदलाव सिर्फ नेता में ही हो सकता है। वोटर भयंकर असमंजस की स्थिति में हैं।
उपचुनाव क्षेत्र के मतदाता को यह भी विचार करने का वक्त है कि वे इन नेताओं को वोट क्यों दें? उनके पास नोटा का विकल्प भी है, क्योंकि इनको 15 महीने पहले भी चुना था। तब चुनाव पर जनता के करोड़ों रुपए खर्च हुए थे। शायद उस चुनाव खर्च के हिसाब से इन नेताओं ने अपने क्षेत्र में काम भी नहीं किए होंगे। इसका दोष (victim) वे तत्कालीन सरकार पर मढ़ते हैं। सवाल तो यह भी है कि बिकने और नई सरकार में मंत्री बनने के बाद इन नेताओं ने अपने क्षेत्र में शिला गाडऩे और दावे-वादों के अलावा और क्या किया है? वोटर को यह भी मंथन करना चाहिए कि क्या ये नेता अब कभी बिकेंगे नहीं? जबकि, इनमें से कुछ को तो दो-तीन से अधिक सियासी दलों में रहने का अनुभव है।
मध्यप्रदेश में जो हालात उपजे हैं, उन्हें सियासी के साथ ही लोकतांत्रिक संकट कहना गलत नहीं होगा। जनता के चुने हुए नेताओं को खरीदना और किसी सरकार को गिरा देना लोकतांत्रिक नहीं हो सकता। इसे स्वस्थ राजनीति भी नहीं कहा जा सकता। इसमें कथित खरीदार से ज्यादा दोषी कथित बिकने वाले हैं। क्योंकि, उन्हें जनता ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत चुनकर विधानसभा भेजा था। वे अपने क्षेत्र की लाखों जनता का चेहरा बनकर राजनीति आए और सदन की सीढिय़ां चढ़े थे।
मध्यप्रदेश का यह उपचुनाव सबसे खास है इसलिए भी है क्योंकि पिछले 16 साल में एक साथ 28 सीटों पर उपचुनाव पहली बार हो रहे हैं। जबकि, इन 16 सालों में महज 30 सीटों पर चुनाव हुए हैं। अभी मध्यप्रदेश विधानसभा की 230 में से भाजपा के पास 107 हैं। कांग्रेस के पास 88 सीटें हैं। बहुजन समाज पार्टी (BSP) के पास दो और एक सीट समाजवादी पार्टी के पास है। चार निर्दलीय विधायक हैं। प्रदेश में बहुमत का आंकड़ा 116 का है। उपचुनाव ग्वालियर-चंबल अंचल (Gwalior-chambal) की मुरैना, मेहगांव, ग्वालियर पूर्व, ग्वालियर, डबरा, बमौरी, अशोक नगर, अम्बाह, पौहारी, भांडेर, सुमावली, करेरा, मुंगावली, गोहद , दिमनी और जौरा सीट पर होना है। इसी तरह मालवा-निमाड़ (Malva nimad) में सुवासरा, मान्धाता, सांवेर, आगर, बदनावर, हाटपिपल्या और नेपानगर में उपचुनाव है। वहीं, सांची, मलहरा, अनूपपुर, ब्यावरा और सुरखी में भी उपुचनाव होंगे। जौरा, आगर और ब्यावरा में विधायकों के असामयिक निधन के कारण उपचुनाव है। बाकी 25 उपचुनाव दल-बदल का नतीजा है।
विधानसभा उपचुनाव में बसपा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ग्वालियर-चंबल में दलित मतदाताओं में बसपा की काफी पकड़ है। पार्टी ने अपने उम्मीदवार भी उतार दिए हैं। ऐसे में भाजपा-कांग्रेस दोनों के लिए मुश्किल खड़ी कर सकती है। यानी बसपा को गेम चेंजर माना जा सकता हैं।
दलबदलू उम्मीदवारों के सामने उनके मौजूदा दल के पुराने कार्यकर्ता और पदाधिकारियों से भी खतरा कम नहीं है। ये वे कार्यकर्ता और पदाधिकारी हैं, जो लंबे समय से दी बिछाते आ रहे हैं। ऐसे में कोई दलबदलू उनके हक का टिकट लेकर चुनाव मैदान में होगा तो वे कैसे पचा पाएंगे। इसके लिए तालमेल बैठाने भाजपा संगठन ने काफी मेहनत की है, लेकिन इसका परिणाम अब भी भविष्य के गर्भ में छिपा है। इनमें से कई नाराज तो दल बदल चुके हैं। दूसरा मजेदार पहलू यह है कि कई सीटों पर इन दलबदलुओं के सामने वे उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं, जो पिछली बार इनके निकट प्रतिद्वंद्वी थे। ऐसे में कर्री टक्कर होना तय है। अब प्रदेश की तस्वीर एकदम अलग है।

सामयिक और सारगर्भित
ReplyDeleteबाबा ने परिस्थितियों का जबरदस्त आकलन किया है बीजेपी के लिए मुश्किल तो है
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