अपने ही खेत में मजदूर बनकर रह जाएंगे किसान Farmers will remain as laborers in their own fields

 अपने ही खेत में मजदूर बनकर रह जाएंगे किसान


Farmers will remain as laborers in their own fields

- मंडी बन जाएगा पूरा देश, पर रेट तय करेंगी कॉर्पोरेट कंपनियां

- बड़े कारोबारी सीधे किसानों से उपज खरीद सकेंगे, लेकिन ये यह नहीं बताता कि जिन किसानों के पास मोल-भाव करने की क्षमता नहीं है, वे इसका लाभ कैसे उठाऐंगे? क्या बड़ी और दूर की मंडियों में अनाज ले जाने के पर्याप्त संसाधन किसानों के पास हैं। दूर की मंडियों में जाने से बढऩे वाले खर्च की भरपाई किसान कैसे कर पाएगा। इस मामले में पिछले दिनों विशेषज्ञों के मीडिया में आए बयानों को देखते हैं।

देश में लाए गए तीन नए कृषि विधेयकों (agriculture bill 2020) में सबकुछ अच्छा है तो लाखों किसान इसका विरोध क्यों कर रहे हैं? सबकुछ अच्छा ही है तो किसानों को समझाइश दे रही सरकार के पसीने क्यों छूट रहे हैं? किसानों को क्यों ऐसा लग रहा है कि उनकी जमीनें छिन जाएंगी? क्या वे मालिक से इतर जमीन के किराएदार बनकर रह जाएंगे? उन्हें ऐसा क्यों लग रहा है कि अपनी उपज कॉर्पोरेट से तय दामों पर ही बेचना होगा। इसके सिवाय कोई विकल्प उनके पास नहीं होगा। ऐसे सैकड़ों सवाल उस किसान के दिमाग में कौंध रहे हैं, जिसने कोरोना महामारी के दौर में भी लोगों का पेट भरने का दम रखा। इसी दौर में उसे नए अध्यादेशों के जरिए राहत की बात के नाम पर आफत देने की तैयारी की गई। देश का पेट भरने वाला किसान अज्ञानी नहीं हो सकता, जो अपना भला-बुरा नहीं समझ सके। पिछले दिनों लए गए कृषि विधेयकों (agriculture bill 2020) पर जितनी बात की जाए उतनी कम है। क्योंकि, सबकुछ ठीक है तो फिर सरकार और किसानों में क्यों ठनी हुई है। हालांकि, यह भी माना जा रहा है कि देश की आजादी के बाद खेती में पहला बड़ा बदलाव किया जा रहा है।

केंद्र सरकार तीन इन विधेयकों को कृषि सुधार के लिए अहम बता रही है। किसान संगठन और विपक्ष इसके सख्त खिलाफ हैं। लोकसभा में बिल पास होने के विरोध में एनडीए सरकार के सहयोगी अकाली दल की नेता और केंद्रीय खाद्य संस्करण मंत्री हरसिमरत कौर बादल (Minister Harsimrat kaur) ने पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra modi) ने अपने जन्मदिन पर कहा कि न्यूनतम समर्थन मूल्य और सरकारी खरीद जारी रहेगी। कुछ ताकतें किसानों को भ्रमित करने में लगी हैं, लेकिन इसे किसानों का मुनाफा बढ़ेगा। इसके बावजूद सवाल यह है कि वर्ष 2022 तक किसानों की आमदनी बढ़ाने का वादा करने वाली केंद्र सरकार के इन विधेयकों का विरोध क्यों हो रहा है? किसान को क्यों आशंका है कि सरकार उनकी मंडियों को छीनकर कॉर्पोरेट कंपनियों को देना चाहती है? आपको बता दें कि 17 सितंबर 2020 को लोकसभा में दो बिल कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक, 2020 और कृषक (सशक्तिकरण संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक 2020 पारित हुए, जबकि एक आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक पहले पारित हो चुका है। इसके बाद से ही विरोध होने लगा था। राष्ट्रीय किसान मजदूर महासंघ सहित तमाम किसान संगठन सडक़ों पर उतरने लगे थे।

इन तीनों विधेयकों को समझने के लिए तह में जाना होगा। पहला है, उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अध्यादेश, कृषि उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अध्यादेश, 2020 यह अध्यादेश मंडियों के बाहर की गई कृषि उपज की बिक्री और खरीद पर टैक्स लगाने से राज्य सरकारों को रोकता है। किसानों को लाभकारी मूल्य पर अपनी उपज बेचने की स्वतंत्रता देता है। सरकार का कहना है कि इस बदलाव के जरिए किसानों और व्यापारियों को आजादी मिलेगी, जिससे अच्छे माहौल पैदा होगा और दाम भी बेहतर मिलेंगे। किसान देश में कहीं भी उपज बेच सकेगा। यानी पूरा देश खुली मंडी बन जाएगा। क्योंकि, कृषि उपज विपणन समितियों (एपीएमसी मंडियों) (MSP) के बाहर भी उत्पाद बेचने और खरीदने की व्यवस्था की जाएगी। सरकार एक देश, एक बाजार की बात कर रही है। हालांकि, केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर (Agriculture minister of india) ने लोकसभा (Loksabha news) में दावा किया कि इससे किसान अपनी उपज की कीमत खुद तय कर सकेंगे, लेकिन अब किसानों को आशंका है कि उन्हें आजादी के नाम पर छला जा रहा है। किसान संगठनों का कहना है कि जो कॉर्पोरेट उपज खरीदेगा, जो पैसे देगा, वह किसानों से तय दाम क्यों मानेगा?



आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 में संशोधन : पहले व्यापारी फसलों को किसानों के औने-पौने दामों में खरीदकर उसका भंडारण कर लेते थे और कालाबाजारी करते थे, उसको रोकने के लिए एक कानून बनाया गया था, जिसके तहत व्यापारी एक लिमिट से अधिक भंडारण नहीं कर सकते थे। नए विधेयक आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक, 2020 आवश्यक वस्तुओं की सूची से अनाज, दाल, तिलहन, खाद्य तेल, प्याज और आलू जैसी वस्तुओं को हटाने के लिए लाया गया है। इन वस्तुओं पर राष्ट्रीय आपदा या अकाल जैसी विशेष परिस्थितियों के अलावा स्टॉक की सीमा नहीं लगेगी। इस पर सरकार का मानना है कि अब देश में कृषि उत्पादों को लक्ष्य से कहीं ज्यादा उत्पादित किया जा रहा है। किसानों को कोल्ड स्टोरेज, गोदामों, खाद्य प्रसंस्करण और निवेश की कमी के कारण बेहतर मूल्य नहीं मिल पाता है। इस विधेयक पर किसान संगठनों का कहना है कि किसान तो अपनी जरूरतों और दूसरी फसल की तैयारी के लिए उपज बेच देता है। व्यापारी इसका असीमित स्टॉक करने लगे तो बाजार वे बाजार को मु_ में कर लेंगे। जब चाहेंगे तब कृत्रिम संकट खड़ा कर देंगे। यह भी आशंका है कि जब किसानों को जरूरत होगी, तब जरूरी नहीं कि कॉर्पोरेट कंपनियां उनकी उपज को खरीद ही लें। इसके लिए भी कहीं कोई प्रावधान नहीं है। किसान संगठनों का कहना है कि इससे कॉर्पोरेट कंपनियां अपनी मर्जी से स्टॉक करके कालाबाजारी को बढ़ावा देंगी। इससे महंगाई बेतहाशा बढऩे की आशंका है।

मूल्य आश्वासन पर किसान (संरक्षण एवं सशक्तिकरण) समझौता और कृषि सेवा अध्यादेश : यह कदम फसल की बोवनी से पहले किसान को अपनी फसल को तय मानकों और कीमत के अनुसार बेचने का अनुबंध करने की सुविधा देता है। इस अध्यादेश में कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग की बात है। सरकार की मानें तो इससे किसान का जोखिम कम होगा। दूसरे, खरीदार ढूंढने के लिए कहीं जाना नहीं पड़ेगा। सरकार का तर्क है कि यह अध्यादेश किसानों को शोषण के भय के बिना समानता के आधार पर बड़े खुदरा कारोबारियों, निर्यातकों आदि के साथ जुडऩे में सक्षम बनाएगा। मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर कहते हैं कि इससे बाजार की अनिश्चितता का जोखिम किसानों पर नहीं रहेगा। किसानों की उपज दुनियाभर के बाजारों तक पहुंचेगी। कृषि क्षेत्र में निजी निवेश बढ़ेगी। सरकार के इन तमाम दावों के बावजूद इन विधेयकों का विरोध क्यों हो रहा?

 

- किसानों में मोल-भाव करने की क्षमता नहीं

किसान हितों की बात करने वाले योगेंद्र यादव (yogendra yadav) ने पिछले दिनों मीडिया से कहा कि एपीएमसी मंडियों के साथ कई दिक्कतें हैं। किसान इससे खुश नहीं हैं, लेकिन सरकार की नई व्यवस्था भी ठीक नहीं है। यह अध्यादेश कहता है कि बड़े कारोबारी सीधे किसानों से उपज खरीद सकेंगे, लेकिन ये यह नहीं बताता कि जिन किसानों के पास मोल-भाव करने की क्षमता नहीं है, वे इसका लाभ कैसे उठाऐंगे? यादव ने कहा कि अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के संयोजक वीएम सिंह भी विधेयक की नीतियों को लेकर सवाल करते हैं। वे कहते हैं कि सरकार एक राष्ट्र, एक मार्केट बनाने की बात कर रही है, लेकिन उसे यह नहीं पता कि जो किसान अपने जिले में अपनी फसल नहीं बेच पाता है, वह राज्य या दूसरे जिले में कैसे बेच पाएगा? क्या किसानों के पास इतने साधन हैं जो दूर की मंडियों में उपज बेच सकें। दूर की मंडियों में जाने से क्या उनका खर्च नहीं बढ़ जाएगा। इस अध्यादेश में कहा गया है कि किसान को पैसा तीन कार्य दिवस में दिया जाएगा। किसान का पैसा फंसने पर उसे दूसरे मंडल या प्रांत में बार-बार चक्कर काटने होंगे, लेकिन हकीकत यह है कि दो-तीन एकड़ जमीन वाले किसान के पास लडऩे की ताकत नहीं है। और ही वह इंटरनेट पर अपना सौदा कर सकता है। यही कारण है किसान इसके विरोध में हैं।

 

- सस्ते दाम में फसल बेचना मजबूरी

ख्यातनाम निर्यात नीति विशेषज्ञ और कृषि मामलों के जानकार देविंदर शर्मा (Devinder sharma) का एक बयान पिछले दिनों मीडिया में छाया रहा। उन्होंने कहा कि जिसे सरकार सुधार कह रही है वह अमरीका, यूरोप जैसे कई देशों में पहले से लागू है। इसके बावजूद वहां के किसानों की आय में कमी आई है। अमरीका कृषि विभाग के मुख्य अर्थशास्त्री का कहना है कि 1960 के दशक से किसानों की आय में गिरावट आई है। इन वर्षों में यहां पर अगर खेती बची है तो उसकी वजह बड़े पैमाने पर सब्सिडी के माध्यम से दी गई आर्थिक सहायता है। शर्मा ने यह भी कहा कि बिहार में 2006 से एपीएमसी नहीं है, इसके कारण व्यापारी बिहार से सस्ते दाम पर खाद्यान्न खरीदते हैं और उसी चीज को पंजाब और हरियाणा में एमएसपी पर बेच देते हैं, क्योंकि यहां पर एपीएमसी मंडियों का जाल बिछा हुआ है। यदि सरकार इतना ही किसानों के हित को सोचती है तो उसे एक और अध्यादेश लाना चाहिए जो किसानों को एमएसपी का कानूनी अधिकार दे दे, जो सुनिश्चित करेगा कि एमएसपी के नीचे किसी से खरीद नहीं होगी। इससे किसानों का हौसला बुलंद होगा।

 

- कॉर्पोरेट बिचौलिए कमाएंगे मुनाफा

युवा किसान नेता और राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन मध्यप्रदेश के प्रदेश अध्यक्ष राहुल राज कहते हैं कि इससे मंडी की व्यवस्था ही खत्म हो जाएगी। किसानों को नुकसान होगा और कॉर्पोरेट बिचौलिए (mafiya) मुनाफा कमाएंगे। वन नेशन, वन मार्केट की बात कही जा रही है, लेकिन सच्चाई यह है कि सरकार इसके जरिये कृषि उपज विपणन समितियों के एकाधिकार को खत्म करना चाहती है। इससे व्यापारियों की मनमानी बढ़ेगी, किसानों को उपज की सही कीमत नहीं मिलेगी। मूल्य आश्वासन पर किसान (संरक्षण एवं सशक्तिकरण) समझौता और कृषि सेवा अध्यादेश से कॉर्पोरेट खेती को बढ़ावा मिलेगा।

- बड़ी कंपनियां की कालबाजारी के रास्ते खोल दिए

भारतीय किसान महासंघ के राष्ट्रीय प्रवक्ता अभिमन्यु कोहाड़ का मानना है कि नए अध्यादेश के तहत किसान अपनी ही जमीन पर मजदूर बनकर रह जाएगा। इस अध्यादेश के जरिये केंद्र सरकार खेती का पश्चिमी  मॉडल हमारे किसानों पर थोपना चाहती है, लेकिन सरकार यह भूल जाती है कि हमारे किसानों की तुलना विदेशी किसानों से नहीं हो सकती। हमारे यहां भूमि-जनसंख्या अनुपात पश्चिमी देशों से अलग है और हमारे यहां खेती-किसानी जीवनयापन करने का साधन है। वहीं, पश्चिमी देशों में यह व्यवसाय है। कृषि अध्यादेशों को लेकर किसान विरोध प्रदर्शन भी कर रहे हैं। अभिमन्यु ने कहा कि कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग (contract farming) से किसानों का शोषण होता है। पिछले साल गुजरात में पेप्सिको कंपनी ने किसानों पर कई करोड़ का मुकदमा किया था, जिसे बाद में किसान संगठनों के विरोध के चलते वापस ले लिया। कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग (contract farming) के तहत फसलों की बोवनी बुआई से पहले कंपनियों किसानों का माल एक निश्चित मूल्य पर खरीदने का वादा करती हैं, लेकिन जब  िफसल तैयार हो जाती है तो किसानों को कुछ समय इंतजार करने के लिए कहती हैं। बाद में किसानों के उत्पाद को खराब बताकर रिजेक्ट कर दिया जाता है। कोहाड़ का दावा है कि आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 में संशोधन से बड़ी कंपनियों को लाभ मिलेगा। समझने की बात यह है कि हमारे देश में 85 प्रतिशत लघु किसान हैं। किसानों के पास लंबे समय तक भंडारण की व्यवस्था नहीं होती है। यानी यह अध्यादेश बड़ी कंपनियों द्वारा कृषि उत्पादों की कालाबाजारी के लिए लाया गया है। कंपनियां और सुपर मार्केट अपने बड़े-बड़े गोदामों में कृषि उत्पादों का भंडारण करेंगे। बाद में ऊंचे दामों पर ग्राहकों को बेचेंगे। वे इससे बाजार पर पूरी तरह अपना नियंत्रण रखेंगे। इसमें एक समय के बाद सरकार भी बेसहाय नजर आए तो अतिश्योक्ति नहीं। किसान संगठनों का कहना कि इस बदलाव से कालाबाजारी और बढ़ेगी। जमाखोरी बढ़ेगी। कोहाड़ ने कहा कि 2007 में स्वामीनाथन आयोग (Swaminathan report) की रिपोर्ट आई थी। 2007 से 2014 तक कांग्रेस की सरकार रही, लेकिन सरकार ने कानून लागू नहीं किया। 2014 से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहते थे कि उन्हें प्रधानमंत्री बना दिया जाए, वे लागू कर देंगे, लेकिन उन्होंने ने भी लागू नहीं किया। ऐसे में किसानों के साथ एक विश्वास का संकट सामने गया है। प्रधानमंत्री और कृषि मंत्री बार-बार अपने भाषणों में जिक्र कर रहे है कि एमएसपी जारी रहेगी, तो सरकार क्यों नहीं एमएसपी की बात को विधयेक में जोड़ देती हैं? 2006 में बिहार में एमएसपी मंडियों को खत्म कर दिया गया। उस समय कहा गया था कि निजी क्षेत्र काफी निवेश करेगा, जिससे किसान तरक्की के रास्ते पर बढ़ेगा। प्रधानमंत्री भी अपने भाषण में कह रहे थे कि किसानों की हालत अच्छी है। बिहार के किसानों की मुख्य फसल मक्का है। उसका सरकारी रेट 1850 रुपए क्विंटल है, लेकिन व्यापारी उसे 500-600 रुपए में खरीद रहे हैं। आप बताइए ये तरक्की है या बर्बादी? इसी कारण बिहार का किसान अपनी 5-5 एकड़ की जमीन को छोडकऱ पंजाब, हरियाणा में दूसरे जमीन पर मजदूरी करते हैं।

 

- निजी हाथों को जमाखोरी की इजाजत

मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाश चंद्र सेठी (Prakashchandra sethi news) 1972 में मंडी एक्ट लेकर आए थे। मंडी में औने पौने दामों पर फसल की कीमत तय हो, इसकी व्यवस्था इसमें थी, लेकिन नीति विफल होती गई। भारतीय किसान यूनियन (Bhartiya kisan union) के महा सचिव धर्मेंद्र मलिक कहते हैं कि इससे सरकार के हाथ में खाद्यान नियंत्रण नहीं रहेगा, सबसे बड़ा खतरा यही है। उनका कहना है कि सरकार ने आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 में बदलाव करके निजी हाथों में खाद्यान्न जमा होने की इजाजत दे दी है। अब सरकार का इस पर कोई नियंत्रण नहीं होगा। कोरोना संकट के बीच यह नियंत्रण सरकार के हाथ में इसलिए लोगों को कम से कम अनाज को लेकर दिक्कतों का सामना नहीं करना पड़ा। इससे धीरे-धीरे कृषि से जुड़ी पूरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था चौपट हो जाएगी। निजी व्यापारी सप्लाई चेन को अपने हिसाब से तय करते हैं और मार्केट को चलाते हैं, जिसका सीधा असर ग्राहकों पर पड़ेगा।

 


- बस नाम की रह गई एमएसपी

इस तरह तीनों अध्यादेशों से उपजी तमाम आशंकाओं से किसानों के अंदर रोष है। किसानों में एक डर की स्थिति है, लेकिन  चिंता इस बात है कि सरकार किसानों की बात नहीं सुन रही है। उनका आरोप है कि सरकार मनमानी कर रही है। सरकार कह रही है कि एमएसपी रहेगी, लेकिन एमएसपी के रहने के बावजूद मक्का 750 रुपए क्विंटल बिका जबकि इसका एमएसपी 1,500 रुपए से ऊपर है। इसी तरह मध्यप्रदेश के मालवा में कपास 1200 रुपए क्विंटल बिका, जबकि इसकी एमएसपी 2100 रुपए के आसपास है। जब प्राइवेट प्लेयर्स सीधे किसान के संपर्क में आएंगे, तब किस तरह की स्थिति बनेगी?

 

- तब 70 फीसदी लाभ किसानों को मिलना था

कहा तो यह भी जा रहा है कि भारत में श्वेत दुग्ध क्रांति को मील का पत्थर माना जाता है। विश्व में भारत का दूध उत्पादन के क्षेत्र में नाम भी नहीं था। वर्ष 1965 में जब लाल बहादुर शास्त्री ने खेड़ा गांव में पहली बार कॉपरेटिव बनाकर दुग्ध उत्पादन के लिए पहल की तो इसका मुख्य बिंदु था कि दुग्ध उत्पादन का डेढ़ गुना किसानों को मिले। यानी किसानों को 70 फीसद लाभ मिलना चाहिए। सबको अपने उत्पाद का मूल्य निर्धारित करने का अधिकार है, केवल किसान ही ऐसा है कि जिसका मूल्य सरकार निर्धारित करती है। इसके पीछे का तर्क दिया जाता था कि ये ब्रिटिश के समय से चली रही प्रथा है। अब इसे बदल दिया गया है। इसके बदलने से भी कोई परिवर्तन नहीं होने वाला है क्योंकि, जो समस्या है, वो अब जटिल हो गई है।

 

- कहीं यह कृत्रिम संकट तो नहीं

मध्यप्रदेश मंडी बोर्ड ने किसान सडक़ विकास निधि से 200 करोड़ रुपए पेंशन बांटने का निर्णय किया है, इससे किसानों के वेलफेयर में कटौती हो जाएगी। कहा जा रहा है कि बोर्ड की माली हालत पिछने कुछ सालों से खराब है। वर्तमान में करीब 60 मंडियां घाटे में चल रही हैं। इनमें 6 से 7 माह से कर्मचारियों को वेतन मिल रहा है। इसके साथ ही मप्र मंडी बोर्ड को पेंशनरों को पेंशन देना मुश्किल हो रहा है। मंडियों में जो कमाई हो रही है उससे इनको वेतन, पेंशन देने के लिए पर्याप्त राशि नहीं मिल पा रही है। मप्र मंडी बोर्ड से सरकार को करीब हर साल 1200 करोड़ रुपए कमाई होती है। इससे पांच सौ करोड़ किसान सडक़ निधि में जमा कर दिया जाता है, जिसे सरकार के खाते में जमा कर दिया जाता है। इसी बीच यह भी कहा जा रहा है कि मंडियों का यह आर्थिक संकट सडक़ परिवहन निगम की तरह साजिश तो नहीं है। सडक़ परिवहन निगम को इसी तरह घाटे में बताकर बंद कर दिया गया। कहीं यह कृषि मंडियों को बंद करने की साजिश तो नहीं, जिससे निजी मंडियों को बढ़ावा मिले और वे अपना एकाधिकार कर लें। हालांकि, सरकार का तर्क है कि वह लगातार मंडियां खोलती जा रही है। इनमें पर्याप्त अनाज की आवक होती है और ही व्यापारी आते हैं। इससे खर्च बढ़ता जा रहा है और आय कम होती जा रही है। इससे करीब 60 से 70 मंडियों की हालत खराब है। यहां खर्च के अनुसार आय नहीं होने के कारण दूसरी मंडियों की आय की राशि इन मंडियों के रखरखाव और वेतन भत्तों पर खर्च कर दी जाती है। प्रदेश में मप्र मंडी बोर्ड मुख्यालय के अलावा 259 मंडी, 298 उप केंद्र, 7 आंचलिक कार्यालय है। बोर्ड में करीब 2500 पेंशनर हैं। पांच हजार से अधिक नियमित सहित संविदा कर्मचारी-अधिकारी हैं।

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