हाथरस; वोटों के टुकड़े की सियासत gang rape news

 हाथरस; वोटों के टुकड़े की सियासत gang rape victim hathras case

उत्तर प्रदेश के हाथरस (hathras case) में दलित युवती के साथ सामूहिक दुष्कर्म (gang rape) के बाद रीढ़ की हड्डी तोडऩे और जुबान काटने की घटना ने समूची व्यवस्था और समाज को कठघरे में खड़ा कर दिया। मीडिया भी इससे अछूता नहीं है। अचानक पत्रकारिता का चोला पहनकर सड़कों और खेतों के रास्ते चीखने वाले चैनलकर्मी अब लगभग गायब है। उनकी जगह दूसरे चेहरे नजर आ रहे हैं। मुदï्दा भी दूसरी दिशा में जा चुका है। हालांकि, अतिश्योक्ति तो इस बात में भी नहीं है कि मुद्दा दूसरी दिशा में कर दिया गया है। जो लोग पीडि़ता के लिए आवाज उठा रहे थे, वे दंगे की साजिश रचने वाले कहे जा रहे हैं। रातोरात वेबसाइट बन जाए और उस पर तमाम निर्देश एक बड़े जनसमूह में सर्कुलेट हो जाएं, यह भी संदेश पैदा करता है। इस बीच पीडि़ता के परिवार और उसके पूरे गांव को लगभग कैद में रखा जाता है। संदेह तब और गहरा जाता है, जब पीडि़ता के परिवार ने जांच से इनकार कर दिया। अब पूरी पटकथा  उत्तर प्रदेश सरकार के खिलाफ साम्प्रदायिक दंगे भड़काने, उसके लिए फंडिंग करने और प्रदेश में माहौल खराब करने की लिखी जा चुकी है। तो क्या एक दलित युवती के साथ ऐसा जघन्य अपराध सरकार की छवि बिगाडऩे की साजिश है? कहीं यह समूचे प्रदेश में और जिन दूसरे राज्यों में विधानसभा चुनाव और उपचुनाव (bye election in mp) होना है, वहां के वोटों को टुकड़ों में बांटने की सियासत तो नहीं? धर्म और जाति का जहर फैलाकर कांग्रेस (congress news), सपा और बसपा (bsp) के वोटों का बांट देने की साजिश तो नहीं? (election in bihar)



बहरहाल, मार्के की बात यह भी है कि विरोध के स्वर अपने-पराए देखकर मौन और मुखर हो रहे हैं। यह घटना पश्चिम बंगाल या केरल में होती तो शायद तमाम सियासी दल सड़कों पर विरोध कर रहे होते। केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा भी संभवत: इससे पीछे नहीं रहती।  कांग्रेस भी विरोध कर रही होती, लेकिन राजस्थान में एक बालिका से दुष्कर्म की घटना पर कांग्रेस अपना पराया देखती है। भाजपा विरोध में उतर आती है। उत्तर प्रदेश में भाजपा मौन है। कांग्रेस मुखरता से सड़कों पर है। जब देश की बेटी एक समान है तो फिर विरोध का नजरिया अलग-अलग क्यों है? फिर उत्तर प्रदेश के मामले में भाजपा लगभग तीन दिन तक पूरे मामले में मौन क्यों रहती है? इसके बाद जो नया खुलासा होता है, उसमें पीडि़ता की पीड़ा पूरी तरह गायब है। जांच से इनकार करने वाले उसके परिवार को सुरक्षा मुहैया करा दी गई है। बहरहाल, यह सुरक्षा कम, निगरानी ज्यादा मालूम पड़ती है। क्योंकि, घटना के बाद पीडि़ता के पिता ने बयान दिया था कि दबंगों ने उन पर पहले भी जुल्म किए हैं। इन्हीं लोगों (gang rape victim hathras case) ने उसके पिता की उंगलियां काट दी थीं। इसके बाद अचानक वह जांच से कैसे इनकार कर सकता है? 


(यक्ष प्रश्न - जब सबकुछ ठीक था, लड़की के साथ कोई बुरी घटना नहीं हुई थी, तो उसके शव को रातोरात क्यों जला दिया गया? शव उसके परिजनों को क्यों नहीं सौंपा गया?  इतनी जल्दबाजी क्यों की गई? मीडिया को दूर क्यों रखा गया? गांव के तमाम रास्ते क्यों बंद कर दिए गए?)

बात दलितों पर अत्याचार की भी है। दलितों के लिए न्याय मांगने विरोध प्रदर्शन की भी है। मामला अदालत तक चला जाता है। पक्ष-विपक्ष के तमाम संदेशनशील लोगों की प्रतिक्रियाएं भी आती हैं, लेकिन इस सवाल की तह में कोई नहीं जाता कि दलितों पर अत्याचार होते क्यों हैं? इसका जवाब संभवत: दलित स्वयं भी नहीं जानना चाहते। वे विरोध कर न्याय मांगने में ज्यादा भरोसा करने लगे हैं। बजाए इसके कि ऐसी व्यवस्था को ध्वस्त करना चाहिए, जिसमें जुल्म हो रहे हों। क्या हाथरस में विरोध प्रदर्शन के बाद उत्तर प्रदेश या देश के दूसरे हिस्सों में बेटियों से सामूहिक दुष्कर्म नहीं हुआ? हमारे सामने रोजाना आ रहे अखबार गवाह हैं, यह सिलसिला थम नहीं रहा है। 

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