कचरे में जिंदगी की तलाश
रुपए से दवाएं खरीद सकते हैं, सेहत नहीं। यह बात लगभग सभी जानते हैं। इसके बावजूद देश-प्रदेश में लाखों लोग रोजी-रोटी के जुगाड़ में ऐसे काम कर रहे हैं, जिनका हासिल शरीर को बीमारियों का घर बनाना है। शहरों में असंगठित क्षेत्रों में काम कर रहे लोग और कचरा बीनने वालों की यही दास्तान है। इतना ही नहीं, इनमें से करीब 80 फीसदी लोग एक वक्त का भोजन ही खा पाते हैं। ये प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से शहरों की सफाई कर रहे हैं, लेकिन इनकी सेहत के लिए कोई सरकारी प्रावधान नहीं है। भारत की 2006 की पर्यावरण नीति में इनकी सराहना जरूर की गई है। भारत में ठोस कचरा प्रबंधन को लेकर प्रावधान हैं, लेकिन इन पर अमल नहीं होता है। कचरा उठाने का काम नगरीय निकाय करते हैं। इसके बावजूद बड़ी मात्रा में बचने वाला कचरा गरीब बस्तियों के लोग उठाते हैं।
एक अध्ययन के मुताबिक ठोस कचरे का संग्रहण घरों, दुकानों, उद्योगों आदि में होता है। लोग इसे कचरा बीनने वालों को व्यवस्थित ढंग से दे सकते हैं। भारत ठोस कचरे से उपजे संकट का सामना कर रहा है। इस राष्ट्रीय संकट से निपटने के लिए व्यापक तैयारी ओर जागरुकता की जरूरत है। हमारे यहां कचरा बीनने वालों को सुरक्षा मुहैया नहीं है। दिल्ली, सिंगापुर जैसे कुछ बड़े शहरों में इनकी पढ़ाई और स्वास्थ्य के क्षेत्र में कुछ संस्थाएं काम कर रही हैं। दरअसल सभी तरह के कचरे के सीधे संपर्क में रहने के कारण इनके शरीर को ज्यादा खतरा रहता है। धूल, धुआं, गंदगी, कांच, लोहा, टिन आदि के सीधे संपर्क में रहने से कई बार जख्म हो जाते हैं। इसके बावजूद इनकी चिकित्सा सामान्य है। और कई बार ये सरकारी अस्पतालों में भी नकार दिए जाते हैं। दिल्ली में हुई विकिरण की घटना से पूरे देश को सबक लेना चाहिए। ऐसा ही वाक्या भोपाल में 2008 में हआ था, जब एक कबाड़ी ने मंडीदीप से खरीदी गई केमिकल की ड्रमों को नाले में खारी कर दिया था। आसपास के लोगों की नींद और चौन छिन गया था।
इन घटनाओं और मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए कार्बनिक, अकार्बनिक और पुनर्शोधित कचरे को अलग-अलग करने की व्यवस्था होना चाहिए। कचरा प्रबंधन के सरकारी प्रावधानों पर अमल नहीं होता है तो इसके लिए सामाजिक, तकनीकि, सांस्थानिक और वित्तीय मुद्दे जिम्मेदार हैं। अकेले भोपाल में प्रतिदिन 550 मीट्रिक टन कचरा निकलता है। नगर निगम का अमला इसमें से करीब 450 मीट्रिक टन कचरा ही उठा पाता है। बाकी 100 मीट्रिक टन झुग्गी बस्तियों के लोग उठाते हैं। यदि ये एक सप्ताह काम बंद कर दें तो शहर में कई मीट्रिक टन कचरा जमा हो जाएगा। इतना ही नहीं अस्पतालों का कचरा भी लापरवाहीपूर्ण तरीके से फेंक दिया जाता है, जिसके संपर्क में ये लोग आ जाते हैं। नियमों के मुताबिक 50 से अधिक बिस्तरों वाले अस्पताल के पास अपना भष्मीकरण यंत्र होना चाहिए, लेकिन भोपाल में यह व्यवस्था किसी भी अस्पताल में नहीं है। हमीदिया अस्पताल में थी, लेकिन यह अभी ठप है। एक निजी भष्मीकरण यंत्र है, लेकिन यहां कितने अस्पताल कचरा पहुंचाते होंगे, यह अलग पड़ताल का विषय है। चूंकि यह संयंत्र लगाना और इसका रखरखाव करना काफी खर्चीला है, इसलिए इसे लगाना सभी अस्पतालों के वश में नहीं है।
प्रति व्यक्ति कचरा उत्सर्जन और मशीनों या संयंत्रों की क्षमता का निर्धारण आधुनिक सभ्यता के सामने नाकाफी है। आधुनिक सभ्यता की जरूरतों, बाजार, पैक बंद सामग्री आदि के हिसाब से इसके पुनर्मूल्यांकन की जरूरत है। इसके कचरा प्रबंधन, संसाधन प्रबंधन और कचरा बीनने वालों की सेहत के दृष्टिकोण से भी देखने की जरूरत है। मोक्टम (मिश्र) में गधे से दो घंटे गाड़ी खिंचवाई जाती है और उसे अस्पतालों में वीआईपी ट्रीटमेंट दिया जाता है। कुछ देशों में कचरा बीनने वालों को स्पेशल आवास दिए गए हैं। वहीं भारत में लोग सबसे अधिक गंदी बस्तियों में रहते हैं। इनकी सेहत को हमेशा नकारा जाता रहा है। ज्यादातर लोग एक वक्त का भोजन ही घरों में कर पाते हैं। अभी जिस कुपोषण का मुद्दा सुर्खियों में है, उसमें बड़ी आबादी शहरी गरीबों की है।
नगरीय निकाय कचरा बीनने वालों को दस्ताने, वाहन, संयंत्र आदि उपलब्ध कराए। इनका स्वास्थ्य बीमा अनिवार्य रूप से किया जाए। इनकी शिक्षा, प्रशिक्षण, लाइसेंस आदि अनिवार्य कर दिए जाएं। कुल कचरे का 18 प्रतिशत पुनर्शोधित करने के योग्य होता है, इसकी व्यवस्था कचरा बीनने वालों की बीच की जाए। उसका उपयोगी हिस्सा बेचने की अनुमति भी हो। इससे शहरी गरीबों के उत्थान के साथ ही शहरों की सेहत भी सुधरेगी।
अंश बाबा
एक अध्ययन के मुताबिक ठोस कचरे का संग्रहण घरों, दुकानों, उद्योगों आदि में होता है। लोग इसे कचरा बीनने वालों को व्यवस्थित ढंग से दे सकते हैं। भारत ठोस कचरे से उपजे संकट का सामना कर रहा है। इस राष्ट्रीय संकट से निपटने के लिए व्यापक तैयारी ओर जागरुकता की जरूरत है। हमारे यहां कचरा बीनने वालों को सुरक्षा मुहैया नहीं है। दिल्ली, सिंगापुर जैसे कुछ बड़े शहरों में इनकी पढ़ाई और स्वास्थ्य के क्षेत्र में कुछ संस्थाएं काम कर रही हैं। दरअसल सभी तरह के कचरे के सीधे संपर्क में रहने के कारण इनके शरीर को ज्यादा खतरा रहता है। धूल, धुआं, गंदगी, कांच, लोहा, टिन आदि के सीधे संपर्क में रहने से कई बार जख्म हो जाते हैं। इसके बावजूद इनकी चिकित्सा सामान्य है। और कई बार ये सरकारी अस्पतालों में भी नकार दिए जाते हैं। दिल्ली में हुई विकिरण की घटना से पूरे देश को सबक लेना चाहिए। ऐसा ही वाक्या भोपाल में 2008 में हआ था, जब एक कबाड़ी ने मंडीदीप से खरीदी गई केमिकल की ड्रमों को नाले में खारी कर दिया था। आसपास के लोगों की नींद और चौन छिन गया था।
इन घटनाओं और मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए कार्बनिक, अकार्बनिक और पुनर्शोधित कचरे को अलग-अलग करने की व्यवस्था होना चाहिए। कचरा प्रबंधन के सरकारी प्रावधानों पर अमल नहीं होता है तो इसके लिए सामाजिक, तकनीकि, सांस्थानिक और वित्तीय मुद्दे जिम्मेदार हैं। अकेले भोपाल में प्रतिदिन 550 मीट्रिक टन कचरा निकलता है। नगर निगम का अमला इसमें से करीब 450 मीट्रिक टन कचरा ही उठा पाता है। बाकी 100 मीट्रिक टन झुग्गी बस्तियों के लोग उठाते हैं। यदि ये एक सप्ताह काम बंद कर दें तो शहर में कई मीट्रिक टन कचरा जमा हो जाएगा। इतना ही नहीं अस्पतालों का कचरा भी लापरवाहीपूर्ण तरीके से फेंक दिया जाता है, जिसके संपर्क में ये लोग आ जाते हैं। नियमों के मुताबिक 50 से अधिक बिस्तरों वाले अस्पताल के पास अपना भष्मीकरण यंत्र होना चाहिए, लेकिन भोपाल में यह व्यवस्था किसी भी अस्पताल में नहीं है। हमीदिया अस्पताल में थी, लेकिन यह अभी ठप है। एक निजी भष्मीकरण यंत्र है, लेकिन यहां कितने अस्पताल कचरा पहुंचाते होंगे, यह अलग पड़ताल का विषय है। चूंकि यह संयंत्र लगाना और इसका रखरखाव करना काफी खर्चीला है, इसलिए इसे लगाना सभी अस्पतालों के वश में नहीं है।
प्रति व्यक्ति कचरा उत्सर्जन और मशीनों या संयंत्रों की क्षमता का निर्धारण आधुनिक सभ्यता के सामने नाकाफी है। आधुनिक सभ्यता की जरूरतों, बाजार, पैक बंद सामग्री आदि के हिसाब से इसके पुनर्मूल्यांकन की जरूरत है। इसके कचरा प्रबंधन, संसाधन प्रबंधन और कचरा बीनने वालों की सेहत के दृष्टिकोण से भी देखने की जरूरत है। मोक्टम (मिश्र) में गधे से दो घंटे गाड़ी खिंचवाई जाती है और उसे अस्पतालों में वीआईपी ट्रीटमेंट दिया जाता है। कुछ देशों में कचरा बीनने वालों को स्पेशल आवास दिए गए हैं। वहीं भारत में लोग सबसे अधिक गंदी बस्तियों में रहते हैं। इनकी सेहत को हमेशा नकारा जाता रहा है। ज्यादातर लोग एक वक्त का भोजन ही घरों में कर पाते हैं। अभी जिस कुपोषण का मुद्दा सुर्खियों में है, उसमें बड़ी आबादी शहरी गरीबों की है।
नगरीय निकाय कचरा बीनने वालों को दस्ताने, वाहन, संयंत्र आदि उपलब्ध कराए। इनका स्वास्थ्य बीमा अनिवार्य रूप से किया जाए। इनकी शिक्षा, प्रशिक्षण, लाइसेंस आदि अनिवार्य कर दिए जाएं। कुल कचरे का 18 प्रतिशत पुनर्शोधित करने के योग्य होता है, इसकी व्यवस्था कचरा बीनने वालों की बीच की जाए। उसका उपयोगी हिस्सा बेचने की अनुमति भी हो। इससे शहरी गरीबों के उत्थान के साथ ही शहरों की सेहत भी सुधरेगी।
अंश बाबा
adbhut............aapkee is kshamata ka parichay pana ek behad sukhad anubhootee hai......keep it up
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