कफन ओढ़े कोने में बैठी नैतिकता

शराब कारोबार के सामने नैतिकता का कफन ओढ़े कोने में दुबकी है। शहर के लिए यह एक बेहद डरावना और चिंतनीय वक्त है, जो चमगादड़ की तरह पूरी व्यवस्था के बीच उल्टा लटका हुआ है। इसे समझने के लिए कबीर की उलटबांसियां भी कम हैं। किसी वादे को पूरा कर उसका सियासी फायदा लेने की मंशा में ऐसे काले कारोबार से आंखें मूंद लेना ठीक नहीं। सुधार के वादे-दावे और बहस-मुबाहिसों के कोलाहल में एक ध्वनि भी खोई हुई है। यह ध्वनि एक आर्तनाद है, एक मर्मांतक पुकार है। यह आर्तनाद और पुकार उनकी है, जो अपनी आंखों में बच्चों के उज्ज्वल भविष्य का सपना संजोए हैं। अपना पेट काटकर उन्हें पढऩे नजरों से दूर भेज रहे हैं। जिस दिन उन्हें बच्चों के गलत कदम का भान होगा, वे गुस्से से भरे-चढ़े अपने ही नथुनों से खुद के जलते खून की गंध हर पल महसूसने को अभिशप्त महसूस करेंगे।
मैं अपने शहर होशंगाबाद की बात कर रहा हूं.....
मध्यप्रदेश की जीवनरेखा नर्मदा नदी के किनारे पांच किलोमीटर दूर तक शराब बिक्री पर रोक लगाकर पिछली भाजपा सरकार ने वाहवाही लूटी। ये कदम निश्चित ही वाहवाही लायक है, लेकिन पुलिस और प्रशासन की ढील के कारण ये सफल नहीं हो सका। इसके भयंकर दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं। इनके व्यापक रूप धरने पर समाज और व्यवस्था के लिए बड़ा खतरा पैदा होने वाला है। कम से कम होशंगाबाद शहर के संदर्भ तो यह बात सौ टका सच है, जहां किशोरवय और युवा शहर के अंदर शराब का काला कारोबार कर रहे हैं। जरूरत एक मोबाइल कॉल की है और जो चाहिए, जितनी चाहिए शराब हाजिर हो जाएगी। ये शहर पहले ऐसा नहीं था। इससे होशंगाबाद के अलावा आसपास के उन कस्बों और शहरों के किशोर और युवा भी शामिल हो चुके हैं, जिन्हें अभिभावकों ने पढऩे भेजा है। अभिभावकों की आंखों में आज भी बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के सपने तैर रहे होंगे, लेकिन बच्चों के कदम गलत धंधे में पड़ चुके हैं। जिस दिन अभिभावकों को इसका पता चलेगा, उस दिन सपनों भरी आंखों का पथरा जाना तय मानिए। इस शहर में शराब की दुकानें थीं, लेकिन इसके काले कारोबार में नई पीढ़ी इस तरह लिप्त नहीं थी।

पिछले दिनों अरसे बाद होशंगाबाद जाना हुआ। मित्रों से मिलकर बहुत खुशी हुई। मैं उनकी खुशी मुझसे ज्यादा महसूस कर रहा था। बैठे तो बातें चल पड़ीं। एक वरिष्ठ साहित्यकार मित्र से चर्चा के दौरान जो खुलासा हुआ, उससे मैं दंग था। आज तक स्तब्ध हूं। चिंतित भी। आखिर मेरे शहर को ये किसकी नजर लगी। बात की शुरुआत मैंने की। कहा- अब तो शहर और अधिक शांत होना चाहिए? शराब दुकानें शहर से बाहर हैं। इस पर मेरी बांईं ओर बैठे एक मित्र ने कहा, भाई बहुत बुरी स्थिति है। सुनकर चौक जाओगे। शहर के अंदर से दो दुकानें हटी हैं, तो शहर की कई कॉलोनियों में शराब बिकने लगी है। बाहर से पढऩे आए किशोर और युवा ब्लैक में शराब बेंच रहे हैं। होशंगाबाद-इटारसी मार्ग पर शराब दुकान है। शाम होते ही ब्लैक वाले सक्रिय हो जाते हैं। वहां से ऑटो में बोतलें भरकर लाते हैं और उन छात्रों के कमरों और निजी हॉस्टलों में खाली कर देते हैं, जो इस काले कारोबार में शामिल हैं। फिर वे ग्राहकों को उपलब्ध कराते हैं। कभी भी, कहीं भी पहुंचा देते हैं। इस काम में उन्हें अभी मजा आ रहा है। क्योंकि, बिना मेहनत के इनकम हो रही है। घर से पैसा आता है सो अलग। फिर ऐश करने भोपाल तक जाते हैं। वे पढऩे में कम, शराब बेचने और मौज-मस्ती पर ज्यादा फोकस कर रहे हैं।
मित्र की बात सुनकर मैं कुछ बोल ही नहीं पा रहा था, क्योंकि मैं तो पहले से और अच्छा शहर होने की उम्मीद से उनके बीच बैठा था। वो बिना रुके पूरा नेटवर्क और बच्चों की स्थिति बता रहा था। मैंने एक सवाल किया- क्या पुलिस प्रशासन को इसकी खबर नहीं? बस, फिर दूसरा एपिसोड शुरू हुआ। वो बोला- भाई, ऐसा कैसे हो सकता है? सब मिलीभगत है। ऐसे कारोबार पुलिस प्रशासन से कैसे छिपे रह सकते हैं। जानते सब हैं, बस आंखें बंद कर लेते हैं। पैसा किसे बुरा लगता है। अरे, इससे तो ऑटो वालों का धंधा भी बढ़ गया है। उन्हें सवारी और लोडिंग दोनों ज्यादा मिल रहे हैं। मैं उसके आरोपों पर अब तक विश्वास नहीं कर पा रहा हूं। काश, उसकी उक्त तमाम बातें गलत हों। मेरे शहर को किसी की नजर न लगे। यह सब सुनकर मेरे साहित्यकार मित्र भी स्तब्ध हैं। शहर की व्यवस्था और नई पीढ़ी को खोखला कर रहे इस कारोबार के बारे में सुनकर वे बहुत विचलित दिखे।
- अनिल चौधरी


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