ईमान बेच रहे हुक्मरान

ईमान बेच रहे हुक्मरान एमपी गजब है। शुचिता और सुशासन का बोलबाला है। जी नहीं, अब हमें यह चश्मा उतार फेंकना चाहिए। दरअसल, यहां कथित भ्रष्ट हुक्मरानों का बोलबाला है, जिनसे 'कोई भी गुंडा-बदमाश या दादा बाहर नहीं है। 'वे स्वयं बड़े दंभ के साथ इसका खुलासा भी करते हैं। शासन की मंशा को कलंकित करने वाले कारिंदों की राजधानी में यह स्थिति है तो दूसरे शहरों और कस्बों में कैसी होगी? इनकी जमीन, मकान हड़पने, अवैध कार्यों के लिए बंधी बांधने जैसी करतूतें किसी भू-माफिया से कम नहीं हैं। पिछले दिनों राजधानी में सामने आए दो मामलों में कुछ-कुछ ऐसा ही हुआ। पहली कलंक कथा है, भोपाल नगर निगम अपर आयुक्त की। अव्वल तो यह कि ये हुक्मरान साम-दाम-दण्ड सभी का इस्तेमाल बखूबी जानते हैं, इसके लिए उनके पिछलग्गुओं की लंबी जमात है। इसमें कुछ सरकारी कारिंदे मीडिएटर हैं। इन मामलों में एक बात और साफ हुई कि लेन-देन का टेबल के नीचे वाला तरीका पुराना हो चुका है। अब शहर की सड़कों पर अलग-अलग जगह लक्जरी कारों और सरकारी बंगलों में लेन-देन होता है। शासन-प्रशासन तंत्र की छवि को मटियामेट करने वाले इन सप्रमाण खुलासों से जनता अचंभित है, लेकिन जिम्मेदार अफसर और नेता कुंभकर्णी नींद से जागे नहीं। अफसर चेते न मंत्रियों का खून खौला। इससे भी शर्मनाक स्थिति विपक्ष की है, जो इस गंभीर मुद्दे पर भी हरकत में नहीं आया। इस बात से शायद किसी को गुरेज न हो कि यह मौन, सत्ताधारियों से विपक्ष की मिलीभगत का द्योतक है। वरना चुप्पी की वजह और क्या है? एक सशक्त विपक्ष प्रदेश सरकार और 'शहरी सरकार' दोनों को कठघरे में ला खड़ा करता। कुछ समय पहले एक दूसरी 'कहानी' में प्रतिबंधित तम्बाकूयुक्त गुटखे की खेप से कमाई करने वाले भोपाल जीआरपी थाना प्रभारी की करतूतों का पर्दाफाश हुआ था, जिसमें प्रशासन ने उसे महज लाइन अटैच ही किया, लेकिन नगर निगम अपर आयुक्त के मामले में सबके आंख-कान बंद हैं। एक बात और, लोकायुक्त पुलिस ने इन्हीं दिनों भोपाल में एक क्लर्क और उज्जैन में आईएफएस अधिकारी के यहां अकूत संपदा उजागर की। यहां एक बड़ा सवाल यह उठता है कि अधिकारियों के भ्रष्टाचार और संपदा जुटाने के रास्तों की पोल खुलने के बावजूद इनके यहां छापे क्यों नहीं मारे गए? यदि शासन शुचिता की बात ईमानदारी से करता है, तो जिनकी पोल खुलती है, उनकी पड़ताल जरूर करनी चाहिए। जरूरत है भ्रष्टाचार की जड़ों में मठा डालने की। होना तो यह भी चाहिए कि शासनतंत्र की आंखों का काम कर रहे मीडिया की रिपोर्ट को आधार बनाकर इन अफसरों के सेवाकाल और सम्पत्ति का आकलन किया जाए। यह भी पड़ताल का विषय है कि इन अफसरों ने जो फर्जीवाड़े किए होंगे, उनसे और कितने लोग जुड़े हैं? प्रशासन इनका पर्दाफाश करता है तो 'एमपी गजब है' स्वीकारने के साथ ही वह खुद की पीठ थपथपाने का वास्तविक हकदार होगा। - अनिल चौधरी

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