अनदेखी से उपजेगी परमाणु त्रासदी
दु निया की तमाम जरूरतों को पूरा करने के लिए ईजाद की गई तकनीकें पर्याप्त सुरक्षा इंतजाम और प्रणाली के बिना अविष्कारकों के लिए भी घातक हो जाती है। इतना ही नहीं कई बार तमाम सुरक्षा इंतजाम धरे के धरे रह जाते हैं और विनाशलीला अपना असर दिखा जाती है। जापान में ऐसा ही हुआ है। परमाणु रिएक्टरों से निकल रही खतरनाक विकिरणें मानकों से एक करोड़ गुना अधिक हो गई हैं। इन हालातों ने परमाणु ऊर्जा पर अंतरराष्ट्रीय सवाल और चिंता उत्पन्न कर दी है। फुकुशिमा में हुए इस हादसे के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भारत में भी परमाणु संयंत्रों की सुरक्षा प्रणाली और तकनीकों की समीक्षा के निर्देश दिए हैं, लेकिन उन रिएक्टरों की बात नहीं की गई, जिन्हें खरीदने का करार संसद को अंधेरे में रखकर 2008 में किया गया है। इससे भी बड़ी भूल यह है कि अमरीका से ऐसे रिएक्टर लेने का करार हुआ है, जिनका परीक्षण अब तक किसी देश में नहीं किया गया। एक और सवाल जो बार-बार दिमाग में कौंधता है कि हमारे सामने तारापुर और रावतभाटा परमाणु संयंत्रों के दुष्परिणाम होने के बावजूद सुरक्षा मानकों की अनदेखी जारी क्यों है। परमाणु रिएक्टरों के खरीदार भारत और विक्रेता अमरीका में भारी साठगांठ और भ्रष्टाचार के बीच यह करार हुए हैं। इस बात की पुष्टि विकिलीक्स की खबरों से भी हुई है। भ्रष्टाचार के मामले में अब तक होते आए खुलासों के बाद यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि भ्रष्टाचारी भी बड़े अविष्कारक हैं, जो कई तरह से अपने रास्ते निकालते रहते हैं।
राजस्थान में चंबल नदी के किनारे 200 मेगावाट क्षमता के परमाणु ऊर्जा संयंत्र की रिपोर्ट में इसके कई घातक परिणाम सामने आए हैं। इसकी स्थापना के 20 साल बाद संपूर्ण क्रांति विद्यालय, बेड़छी सूरत ने आसपास के गांवों में अध्ययन किया। इसके मुताबिक गांवों में जन्मजात विकलांगता के मामले बढ़े हैं। प्रजनन क्षमता प्रभावित होने के कारण निसंतान जोड़ों की संख्या भी बढ़ी है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि हड्डी का कैंसर, मृत और विकलांग नवजात, गर्भपात और प्रथम दिवसीय नवजातों की मौत के मामले बढ़े हैं। जन्म और मृत्ये के आंकड़ों का विश्लेषण बताता है कि इन गांवों में औसत आयु 12 वर्ष तक कम हो गई है। इन 20 वर्षों में बारिश के दिनों में हवा में प्रदूषण सबसे अधिक रहा है। सोचने वाली बात यह है कि 200 मेगावाट वाले परमाणु ऊर्जा संयंत्र के 20 वर्षों में इतने भयानक दुष्परिणाम है, तो मध्यप्रदेश के चुटका मेें लगने वाले 1400 मेगावाट उत्पादन क्षमता वाले और महाराष्ट्र के रत्नागिरी में दुनिया के सबसे बड़े 9000 मेगावाट उत्पादन क्षमता वाले जैतापुर पॉवर प्लांट के कितने दुष्परिणाम होंगे। उस विनाशलीला की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन सरकार को इसकी चिंता नहीं है।
मध्यप्रदेश में जबलपुर के पास चुटका में नर्मदा नदी के किनारे 1400 मेगावाट उत्पादन क्षमता के दो रिएक्टर लगाए जाने हैं। इसकी प्रक्रिया कई वर्षों से चल रही है। चुटका के आसपास के गांवों में मानव जीवन मुश्किल हो गया है। इसकी जद में आने वाले करीब 36 गांवों में ऐसी परिस्थितियां निर्मित कर दी गईं हैं कि ग्रामीण स्वयं गांव छोडक़र चले जाएं। हालांकि ग्रामीणों की चुटका परमाणु संघर्ष समिति वर्षों से इसकी खिलाफत कर रही है। इसमें बड़ी संख्या में महिलाएं भी शामिल हैं। इन परिस्थितियों ने इन गांवों की महिलाओं को भी क्रांतिकारी बना दिया, लेकिन बातों को प्रशासन नहीं सुन रहा है। चुटका में लगने वाले रिएक्टरों में ईंधन के रूप में यूरेनियम का इस्तेमाल किया जाएगा, जिसके कचरे के निष्पादन के इंतजामों की बात आज तक नहीं की गई है। यह कचरा निश्चित ही लाखों लोगों की आस्था से जुड़ी नर्मदा और उसकी सहायक नदियों को तेजी से प्रदूषित करेगा। पर्यावरणविदों का कहना है कि परमाणु कचरे की उम्र 2.5 लाख वर्ष होती है। इसे जमीन में गाड़ दिया जाए तो भी 600 वर्ष तक नष्ट नहीं होता है। हमारे सामने तारापुर परमाणु ऊर्जा संयंत्र से निकला कचरा भी बड़ी समस्या बन गया है। यहां चार दशक से निकल रहे कचरे के ढेर जमा हो गए हैं। अमरीका ने इसे लेने से इनकार कर दिया है। वहीं भारत को इसके पुनर्संस्करण करने से भी इनकार कर दिया गया है। यहां ईंधन से निकली छड़ों और अवशेषों को एक खाड़ी में दबाकर रखा गया है। यह स्थिति जापान की ओर ध्यान खींचती है।
परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के इतने दुष्परिणामों के बावजूद भारत ने राष्ट्रीय सहमति और संसद में विचार किए बिना ही 2008 में 10000 मेगावाट बिजली उत्पादन क्षमता के रिएक्टर खरीदने का करार अमरीका से कर लिया। इसके पहले और बाद में अब तक 45000 करोड़ रुपए के रिएक्टर खरीदने का करार भारत कर चुका है। इनमें ऐसे रिएक्टर शामिल हैं जिनका परीक्षण अब तक किसी देश मेें नहीं किया गया। एरेवा का 1630 मेगावाट के यूरोपियन प्रेसराइज्ड रिएक्टर और जनरल इलेक्ट्रिक हिटाची के 1520 मेगावाट बिजली उत्पादन क्षमता के इकोनॉमिक सिंपलीफाइड बायलिंग वाटर रिएक्टर भी शामिल हैं। इतना ही नहीं अब तक इनका यूएस डिजाइन सर्टिफिकेट भी नहीं है। जापान के फुकुशिमा में जिन रिएक्टरों में परमाणु विकिरणें हो रही हैं, उनके प्रोटोटाइप भारत 1960 में ही खरीद चुका है। इसके बावजूद भारतीय परमाणु प्रमुख ने एरेवा के रिएक्टर को परखने की जरूरत समझी है। लेकिन सवाल यह भी दिमाग में कौंधता है कि यह पहले क्यों नहीं समझा गया। दरअसल, अमरीका और भारत के बीच चल रहे परमाणु करारों में भारी भ्रष्टाचार चल रहा है। जहां मानव और राष्ट्रहित को ताक पर रख दिया गया है। नतीजतन भारत ने बिना किसी खुली निविदा के अमरीका के साथ 45000 हजार करोड़ रुपए के करार किए हैं। इससे भारत की परमाणु सैन्य कार्यक्रम की गोपनीयता भी व्यावसायिक क्षेत्र के हवाले कर दी गई है। ऐसी स्थिति में भी परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड कुछ करने की स्थिति में नहीं है। दरअसल यह बोर्ड परमाणु ऊर्जा विभाग के अधीन काम कर रहा है। जब तक यह पृथक नहीं हो जाता, तब तक इसके दखल की उम्मीद बेमानी है। परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष ए. गोपालकृष्णन की मानें तो प्रधानमंत्री कार्यालय और बिजली उत्पादन वाले व्यापारिक घरानों में साठगांठ बढ़ गई है। सुरक्षा मानकों की अनदेखी भी इसका एक नतीजा है।
परमाणु ऊर्जा के खतरों का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि अमरीका ने अपने यहां 1978 के बाद एक भी नया संयंत्र स्थापित नहीं किया है। अमरीका के सभी 104 परमाणु संयंत्र 30 साल और इससे अधिक पुराने हैं। इधर, भारत में 1987 के बाद पांच बड़ी परमाणु घटनाओं के बावजूद सरकार नहीं चेती और परमाणु संयंत्र स्थापित करने पर आमादा है। विदेशी कंपनियों को बाजारू दर पर बिजली उत्पादन करने की भी कोई बाध्यता भारत की ओर से नहीं है। इनके रिएक्टरों से उत्पन्न होने वाली महंगी बिजली को भारतीय करदाताओं के पैसों से अनुदान दिया जाएगा। इस तरह परमाणु क्षतिपूर्ति विधेयक ने विदेशी आपूर्तिकर्ताओं की जवाबदेही भारतीय करदाताओं के कंधों पर डाल दी है।
- अनिल चौधरी
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