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रिटेल में एफडीआई का भयानक खेल

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एम जे अकबर रिटेल क्षेत्र को प्रत्यक्ष विदेशी निवेशकों के लिए खोलने का मसला अगर आर्थिक सुधार के चले आ रहे एजेंडे का महज हिस्सा भर होता, तो इस पर फ़ैसला कम से कम दो साल पहले हो गया होता. आज से साढ़े सात साल पहले कामकाज संभालने के समय ही मनमोहन सिंह सरकार इसके पक्ष में थी. लेकिन उनके प्रयासों को वाम दलों ने सफ़ल नहीं होने दिया, जिनके समर्थन के बगैर अपने पहले कार्यकाल में वे लोकसभा में बहुमत नहीं बनाए रख पाते. यह बात समझ में आने वाली है. कोई भी समझदार सरकार बहुराष्ट्रीय कंपनियों के फ़ायदे के लिए अपने भविष्य को दावं पर नहीं लगायेगी. लेकिन 2009 के आम चुनावों ने लोकसभा के अंकगणित को नाटकीय तौर पर बदल कर रख दिया. इसके साथ ही नीतिगत बदलाव के रास्तों पर बढ़ने की मनमोहन सरकार की क्षमता भी बढ़ गयी. इसके बावजूद रिटेल क्षेत्र में विदेशी निवेश के मसले पर फ़ैसला लेना सरकार के लिए आसान नहीं था. वाम मोर्चे के पराजय के बावजूद रिटेल को लेकर हर पक्ष एक सुर से इसका विरोध करता रहा है. कैबिनेट में सरकार का विरोध करने वाला कोई नहीं, लेकिन ऐसी स्थिति लोकसभा में नहीं है. सत्ताधा...

जहरीली हो जाएगी नर्मदा

मध्यप्रदेश की जीवनरेखा नर्मदा अगले 10-12 सालों में जहरीली हो जाएगी। अमरकंटक से खंभात की खाड़ी तक करीब 18 थर्मल पावर प्लांट लगाने की तैयारी है। जबलपुर से होशंगाबाद तक पांच पावर प्लांट को सरकारों ने मंजूरी दे दी है। इनमें सिवनी जिले के चुटका गांव में बनने वाला प्रदेश का पहला परमाणु बिजली घर भी शामिल है। यह बरगी बांध के कैचमेंट एरिया में है। परमाणु ऊर्जा का मुख्य केंद्र रहा अमेरिका अब परमाणु कचरे का निस्पादन नहीं कर पा रहा है। इसके बावजूद भारत में इन परियोजनाओं से निकलने वाले परमाणु कचरे की निस्पादन की बात सरकारें नहीं कर रही हैं। इन परियोजनाओं के लिए नर्मदा का पानी देने का करार हुआ है। नरसिंहपुर के पास लगने वाले पावर प्लांट की जद में आने वाली जमीन एशिया की सर्वोत्तम दलहन उत्पादक है। कोल पावर प्लांट के दुष्परिणामों का अंदाजा सारणी के आसपास जंगल और तवा नदी के नष्ट होने से लगाया जा सकता है। इतने भयंकर परिणामों के बावजूद ‘नर्मदा समग्र’ अभियान वाली हमारी सरकार नर्मदा जल में जहर घोलने की तैयारी क्यों कर रही है। दो हजार हैक्टेयर में बनने वाले चुटका परमाणु पावर प्लांट की जद में 36 गांव आएंगे। इ...

अनदेखी से उपजेगी परमाणु त्रासदी

दु निया की तमाम जरूरतों को पूरा करने के लिए ईजाद की गई तकनीकें पर्याप्त सुरक्षा इंतजाम और प्रणाली के बिना अविष्कारकों के लिए भी घातक हो जाती है। इतना ही नहीं कई बार तमाम सुरक्षा इंतजाम धरे के धरे रह जाते हैं और विनाशलीला अपना असर दिखा जाती है। जापान में ऐसा ही हुआ है। परमाणु रिएक्टरों से निकल रही खतरनाक विकिरणें मानकों से एक करोड़ गुना अधिक हो गई हैं। इन हालातों ने परमाणु ऊर्जा पर अंतरराष्ट्रीय सवाल और चिंता उत्पन्न कर दी है। फुकुशिमा में हुए इस हादसे के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भारत में भी परमाणु संयंत्रों की सुरक्षा प्रणाली और तकनीकों की समीक्षा के निर्देश दिए हैं, लेकिन उन रिएक्टरों की बात नहीं की गई, जिन्हें खरीदने का करार संसद को अंधेरे में रखकर 2008 में किया गया है। इससे भी बड़ी भूल यह है कि अमरीका से ऐसे रिएक्टर लेने का करार हुआ है, जिनका परीक्षण अब तक किसी देश में नहीं किया गया। एक और सवाल जो बार-बार दिमाग में कौंधता है कि हमारे सामने तारापुर और रावतभाटा परमाणु संयंत्रों के दुष्परिणाम होने के बावजूद सुरक्षा मानकों की अनदेखी जारी क्यों है। परमाणु रिएक्टरों के खरीदार भारत...