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Showing posts from June, 2010

तुम राग पुराना लिखना।

बादल, बिजली, चांद ओ तारे, तुम हर जगह दिखना, अमलताश के पत्तों पर फिर तुम गीत पुराना लिखना। जितना भी हो प्रेम हो निश्छल रगों में दौड़े वो फिर हर पल एक ही हों हम न हो दल-दल अदाओं पर दिल जाए मचल रात, चांदनी, खुशबू, चंदन, कुंदन, तुम हर जगह दिखना, गुलमोहर की पंखुडिय़ों पर फिर गीत सुहाना लिखना। आकर फिर तुम मुझे दे दो बल शाम सुहानी कर उड़ाके आँचल आज की हो चिंता न याद रहे कल कर दे मुझको तू ऐसा पागल कल -कल करती मचलती नदी सी उन्मुक्त तुम दिखना, उछलती लहरों से रेत पर फिर तुम राग दिवाना लिखना। दिनभर भागूं तुझको ढूंढू जैसे कोई हिरणी पागल शाम सुहानी कर दे अब तू फिर कहता हूं मत करना छल सितार, संतूर, घुंघरू, मांदल, तुम सभी के स्वर में बसना, फूल पलाश की पंखुडिय़ों पर फिर तुम राग पुराना लिखना।

tamanna

वो आज भी बैठी होगी निशब्द रेत के ढेर की मानिंद मै आज भी आज भी उछलता हुआ समंदर हूँ गहरे उतर जाऊंगा .......

पापा तुम भी आ जाओ न. .. .

पापा आज तो फादर्स डे है। लाखों बेटियां अपने माता-पिता की गोद में इठला रही होंगी। उनकी तमाम मांगे कम से कम आज तो पूरी की जा रही होंगी। और मैं... मैं क्या बताऊं? जब मैं ट्रेन में अकेली थी, तब से मेरा नाम और पहचान खो गई। अब मुझे मेरे नाम से कोई नहीं पुकारता। पापा, भला हो उस सफाई वाली आंटी को जिसने मुझे पुलिस अंकल तक पहुंचाया। मुझे याद है, अमरकंटक एक्सप्रेस की बोगी नंबर एस-3 का बर्थ नंबर 67, जहां मैं यह सोच रही थी कि कोई अपना आएगा और मुझे ले जाएगा। लेकिन । . .कहानी कुछ और ही बन बैठी? उस वक्त मैं काफी डरी सहमी भी थी। पापा यह सच है न दरिन्दों और हबसियों की आंखों में उम्र, मासूमियत और अपरिपक्वता नापने का कोई पैमाना नहीं होता है। हां पापा मैंने अपनी अब तक की उम्र में ऐसा कई बार सुना है। फिर यह बताओ न कि रेलवे स्टेशन पर किस तरह के लोग नहीं होते हैं। बस उस दिन मेरी लज्जा तो बच गई, लेकिन मैं जिस प्रक्रिया से चैरिटी होम तक पहुंची उसमें भी भटकाव था। अरे पापा! मुझे भोपाल की मातृछाया, एसओएस बालग्राम और कुछ और गैस सरकारी संस्थाओं ने लेने से इनकार कर दिया। मैं विक्षिप्त और विकलांग हूं न इसलिए। अच्छा ...